Darakht

सूखा दरख़्त 

हर किसी के लिए, 
एक मियाद तय है, 
जिसके दरमियाँ सब होता है, 
किसी बाग में, 
आज एक दरख्त सूख गया, 
हलांकि अब भी, 
उस पर चिड़ियों का घोसला है, 
शायद उसके हरा होने की उम्मीद, 
अब भी कहीं जिंदा है, 
मगर इस दुनियादारी से बेवाकिफ, 
इन आसमानी फरिश्तों को, 
कौन समझाए? 
अपनी उम्र पार करने के बाद, 
भला कौन ठहरता है? 
किसी बगीचे में, 
पौधे की कदर तभी तक है, 
जब तक वह हरा है, 
उसके सूखते ही, 
उसको उसकी जगह से, 
रुखसत करने की, 
तैयारी होने लगती है 
ऐसे ही उस पर, 
कुल्हाड़ियां पड़ने लगी, 
बेजान सूखा दरख्त, 
आहिस्ता-आहिस्ता बिखरने लगा, 
वह किसका दरख्त है, 
अब यह सवाल कोई नहीं पूछता, 
क्योंकि सूखी लकड़ियां, 
किस पेड़ की हैं, 
इस बात से कोई मतलब नहीं है, 
बस उन्हें ठीक से जलना चाहिए, 
जबकि हर दरख़्त की, 
एक जैसी दास्तान है, 
वह अपने लिए, 
कभी कुछ नहीं रखता, 
देते रहना उसकी फितरत है, 
सूख जाने के बाद भी 
वह किसी चूल्हे में 
जलता है, 
भूख मिटाने का काम, 
इस तरह भी होता है, 
वह अक्सर, 
किसी घर की रखवाली, 
दरवाजा बनकर करता है 
©️rajhansraju
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(2)

कुछ बात तो है

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मै यूँ ही नहीं हूँ, 
जो हर बार उठ खड़ा होता हूँ
कुछ बात हममें जरूर है,
जो बढ़के एक दूसरे को थाम लेता हूँ।
जब आग लगती है बस्ती में,
तो मै भी डरता हूँ,
अपनों की फिक्र में,
हर वक्त रहता हूँ,
ऐसे में सिर्फ,
घर की छप्प़र नजर आती है
दूर उठती चिंगारी,
एक दूसरे के भरोसे को
अजमती है,
कभी-कभी य़कीं करने पर
डर भी लगता है,
मगर वह शख्स,
"हूबहू"
मेरे जैसा है।
वैसे हमारे पास वो ताकत नहीं है,
कि हम हवाओं का रुख बदल दें,
और गंगा यहीं से बहने लगे,
बस इतना जानता हूँ,
हार नहीं मानता हूँ,
घास फूस की एक छत फिर ड़ालूँगा,
क्यों कि मेरे जैसों की तादात कम नहीं है,
और चिंगारियों से उनका वास्ता भी नहीं है,
हाँ! ए सच है,
आग से लड़ना हमें नहीं आता,
पर! शायद! 
उन लोगों को पता नहीं है,
हमें बुझाने की तरकीब मालुम है,
बस एक दूसरे के साथ खड़े है,
और छोटे-छोटे बरतनों में
कुछ भर रखा है।
हमारे सभी घर एक जैसे हैं,
और पानी में फर्क नहीं है।
जब सभी घरों से,
ए बूँद-बूँद कर रिसती है,
तब दरिया बनने में, देर कहाँ लगती है,
फिर उठता हूँ, जुड़ जाता हूँ
नए पत्तों के साथ, हरा-भरा हो जाता हूँ,
मै कटता हूँ, मै जलता हूँ
हाँ! ए सच है ??
न जाने कितनी बार मरता हूँ,
पर हर बार ए रिसता पानी,
मुझको मिल जाता है,
जो अमृत बनकर आता है,
उसकी कुछ बूँदो से,
फिर जिंदा हो जाता हूँ।
हर बार ऐसे ही,
"मै"
एक नया पेड़ बन जाता हूँ।
Rajhansraju
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(3)

बसंत

********

सरसो के फूल, 
अपने हिस्से का उल्लास, 
हर तरफ भरने लगे, 
उनको मालूम है, 
बसंत का मौसम है, 
पीला चटख रंग, 
उन्हें ही तो भरना है, 
हर एक पौधे ने, 
अपनी डाली पर, 
फूलों का गुलदस्ता, 
सजा रखा है, 
जिसमें अनगिनत फूल, 
मुस्करा रहे हैं, 
इसी तरह बूढ़ा दरख्त, 
जाड़े की अलसाई से जागा है, 
पुराने पत्तों को झाड़ा है, 
पतझड़ का मौसम, 
तभी तो आया है, 
वह अकेला फिजा में, 
बसंत जीने लगा है, 
जश्न के मौसम की खुमारी है, 
बूढ़ा आम, 
बौराने लगा है, 
बसंत की आहट, 
हर तरफ से आ रही, 
इंद्रधनुष के रंग, 
आसमान छोड़कर, 
जमीन पर बिखर रहे हैं, 
हर पौधा, 
कुछ नया सा लगता है, 
अपने बसंत के लिए, 
एकदम खिला सा दिखता है, 
सूरज की गर्मी में, 
एक अजीब सी नरमी है, 
बसंत वह भी जी रहा है, 
इसके बाद उसे.. 
बिना कुछ कहे, 
सिर्फ़ जलना है, 
और तपते रहना है। 
आँख थोड़ी देर से खुली, 
ओस की बूँद काफ़ी देर तक, 
हमारे इंतजार में ठहरी रही, 
मैं बेपरवाह नंगे पांव, 
उसके पास से गुजर गया, 
सरसों के फूल मेरे हर तरफ, 
खिलखिलाने लगे, 
धीरे-धीरे, 
ओस की बूँद 
मुझसे लिपटने लगी
बसंत का पीला रंग, 
हर तरफ रचने लगा, 
मैं न जाने कब? 
इंद्रधनुष बन गया 
©️rajhansraju
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(4)
*****
मुझे बहना है 
******

कोई कुछ भी कहे
वह अपना रास्ता नहीं भूलता
हालांकि काफी दिनों बाद लौटा
रास्ते में तमाम
तब्दीलियां हो चुकी हैं
ईंट-पत्थरों के
बड़े-बड़े मकान बन गये हैं
चमचमाती सड़कें
हर तरफ नजर आ रही है
पर यह क्या
उसे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता
आज भी अपना रास्ता
पूरी तरह याद है
वह जैसे चला करता था
एकदम झूम कर
वैसे ही अपने पुराने
रास्ते से निकलता है
उसके साथ रास्ते में
जो भी मिलता है
उसे भी अपनी आगोश में
लेता चला जाता है
सफर अकेले करना
थोड़ा मुश्किल होता है
शायद इसीलिए
वह अपने साथ 
रास्ते में जो भी मिलता है
उसका हाथ थाम लेता है।
पानी कभी रास्ता भूलता नहीं है
उसे कौन रोक सकता है
जिसे मालूम है
उसे कैसे बहना है
किस तरफ सफर तय करना है
इंसान ने भी फितरत नहीं छोड़ी
उसके बिना इजाजत
न जाने उसकी राह में
क्या क्या बनाते रहे
अपने काम को
भव्य आलीशान कहने लगा
जबकि पानी का इससे
कोई वास्ता नहीं है
सबको यह मालूम है
वह अपने रास्ते से
कोई समझौता नहीं करता
वह अब भी वैसे ही बहता है
उसकी पहचान
निरंतर बहते रहना है
वह भला कितनी देर तक
ठहर सकता है
उसे तो अपने रास्ते
चलना है
उसकी मंजिल तो समुंदर है
जो नदियों से होकर गुजरता है
रास्ते में जो भी मिला
अपने साथ लेकर चलता है
उससे शिकायत करने का
कोई मतलब नहीं है
हमें उसका रास्ता
खाली रखना है
©️Rajhansraju 

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Comments

  1. शहर का आदमी हूँ,
    लोगों से अपनी बात कहता हूँ,
    सुनने वालों को दास्तनें बहुत भाती हैं,
    सब यही कहते हैं
    मैं कहानियां,
    बहुत अच्छी कहता हूँ..

    ReplyDelete

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