Posts

Showing posts with the label यथार्थ

The Book

Image
किताब ******** आज भी कुछ गूँजता है  रह-रह कर कहीं  बेचैन हो उठता है  बेवजह ही  सही  सब कुछ  उसके लिए नया है  क्योंकि अब तक  कहीं कुछ देखा ही नहीं  कैद है अपनी हदों में  और दूसरों की सरहदें तय करता है आदमी ऐसा ही है  जिसने पट्टी बांध रखी है  वही आगे-आगे चलता है।  लोगों को भी उसी पर यकीन है  जो कुछ देखता नहीं।।  वह कैसे कह दे उसे सच  से नहीं  हसीन पर्दे से प्यार है,  जो उसके लिए जरूरी है  जिसमें वह खुद को छुपा लेता है।  दिन रात उसी की फिक्र में रहता है  जिसके बचे रहने की मियाद बहुत कम है  उसकी रंगत भी एक जैसी नहीं रहनी,  चाहत उसे नए पर्दे की  हरदम रहती है।  अब उसके साथ कुछ यूँ  होने लगा है।   सामने वाले,  रंगीन पर्दे से  परेशान रहने लगा है।  ©️RajhansRaju ***************************** (2) परदा ********* कब तक बनेगा चेहरा? जब रोशनी दूर हो आँखो से, ...

Rahnuma

Image
रहनुमा  ********* क्या कहें और किसे दोष दें,  जिन्हें मंजर बदलना है,  वो अब भी सोए हैं,  उन्हें यकीन है,  कोई रहनुमा आएगा,  यह सोचकर  वो अपनी चादर खींच लेते है,  हालांकि..  वो पूरे जिस्म को ढकती नहीं,  पैरों को सीने से लगाकर,  खुद को समेट लेते हैं,  खुदा ऐसे बंदो के लिए,  करता भी क्या?  जिनके अक्ल पर पर्दा हो,  जिस्म जैसे,  उसी टूटी खाट का हिस्सा हो,  वर्षों से कुछ और उसने देखा नहीं,  रोशनी का सामना भला कैसे करेगा,  जो एक पुरानी मैली  सी चादर,  हटा सकता नहीं,  जिसमें लगे पैबंद की गिनती,  करना अब आसान नहीं है,  छेद इतने हैं कि उसका,  अपना कोई वजूद है,  यह भी लगता नहीं,  शायद!  कमाल उस खटिया में है,  जिसने अपने धागों में,  कोई उम्मीद बांध रखी है।  मै उस आदमी के पास से,  आँख बंद करके गुजर जाता हूँ,  मै क्यों कह दूँ रहनुमा हूँ तेरा,  खुद को तेरे हवाले...