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save democracy

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बदलते भारत को  समझने में  क्यों चूक रहा है  हमारा बौद्धिक वर्ग? जनमत, चुनावी वास्तविकता और वैचारिक जड़ता के बीच उलझा भारतीय विमर्श भारत को समझना केवल उसके समाचारों को पढ़ लेने, चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण कर लेने या कुछ स्थापित राजनीतिक सिद्धांतों के आधार पर समाज की व्याख्या कर देने भर का काम नहीं है। भारत एक ऐसा देश है जिसकी सामाजिक संरचना अत्यंत जटिल है। यहां भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति, सांस्कृतिक परंपराओं और राजनीतिक विचारधाराओं की अनेक परतें एक साथ सक्रिय रहती हैं। इन सबके बीच एक भारतीय होने का बोध भी है, जो अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग रूपों में प्रकट होता है। यही कारण है कि भारत को समझने के लिए केवल आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं, केवल विचारधारा पर्याप्त नहीं है और केवल सड़कों पर दिखाई देने वाली भीड़ भी पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समाज के भीतर चल रही उन प्रक्रियाओं को समझना आवश्यक है, जो कभी सार्वजनिक रूप से दिखाई देती हैं और कभी लंबे समय तक अदृश्य बनी रहती हैं। दुर्भाग्य से, हमारे सार्वजनिक विमर्श का एक बड़ा हिस्सा आज भी ऐसे स्थापित विचारों और व्याख्याओं ...

Ghost voter

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 The Ghost voter हाय रे तानाशाही! मुर्दों से भी छीन लिया मतदान का अधिकार! 😍😍 Voter List के शुद्धिकरण से कुछ मोदी हेटरों के राजनीतिक जीवन में ऐसा भूचाल आया है कि अब उन्हें लोकतंत्र का भविष्य ही अंधकारमय दिखाई देने लगा है। वर्षों से चुनाव जीतकर सत्ता में आने की उम्मीद लगाए बैठे इन महापुरुषों को अब लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था ही संदिग्ध लगने लगी है। लगता है, चुनाव के रास्ते सत्ता तक पहुँचने की उम्मीद कमजोर पड़ते ही कुछ लोगों ने सीधे लोकतंत्र के पोस्टमार्टम की तैयारी कर ली है और जब-जब चेतना का कोई दौरा पड़ता है, बस एक ही आवाज गूँजती है— तानाशाह! तानाशाह! तानाशाही नहीं चलेगी! अब जरा इनकी पीड़ा की गहराई समझिए... सरकारी स्कूल चाहिए, सरकारी कॉलेज चाहिए, विश्वविद्यालय चाहिए, अस्पताल चाहिए, राशन चाहिए और सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करने की पूरी आजादी भी चाहिए। प्रेस वार्ता करने की सुविधा भी चाहिए और अपनी बात को वायरल करवाने के लिए मीडिया का सहयोग भी चाहिए। मीडिया वाले भी पूरी तत्परता से लगे हैं। आखिर उनके भी धंधे का सवाल है। किसी की राजनीतिक दुकान चल रही है, तो किसी की टीआरपी की दुकान! इन मह...