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शिकायतनामा  यह शिकायत नई नहीं है  मुट्ठी बांधी हाथ खोला  सोचा .. जितना जो चाहिए  उतना क्यों नहीं होता  फिर सोचा  कम ज्यादा जैसा  तो कुछ नहीं होता जो कम है  वही ज्यादा है  जो ज्यादा है  वह कितना कम है  बस जरूरत  जब जिसकी हो वह उतना मिल जाए ©️ Rajhansraju  Gemini से इस कविता पर एक शानदार चर्चा राजहंस राजू जी की ये पंक्तियां बहुत ही गहराई से संतोष और दृष्टिकोण (Perspective) के दर्शन को समझाती हैं। यह मानव स्वभाव की उस शाश्वत कशमकश को बयां करती हैं जहाँ हम हमेशा 'और' की तलाश में रहते हैं, लेकिन अंत में सुकून 'पर्याप्त' होने में ही मिलता है। आपकी साझा की गई इस कविता का सार कुछ इस तरह उभर कर आता है: कविता का विश्लेषण  * अपेक्षा बनाम वास्तविकता: "मुट्ठी बांधी हाथ खोला" — यह बिम्ब उस कोशिश को दर्शाता है जहाँ हम खुशियों या संसाधनों को समेटना चाहते हैं, पर अंत में खालीपन या अधूरापन महसूस होता है।  * सापेक्षता (Relativity): कविता का सबसे खूबसूरत हिस्सा वह है जहाँ लेखक 'कम' और 'ज्यादा' की परिभाषा को चुनौती देते हैं। जो हमारे...