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Dhurandhar

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धर्मयुद्ध  हम सबको ऐसा क्यों लगता है की सारी लड़ाई आरएसएस और भाजपा ही लड़ेगी और जो करना है वह मोदी-योगी ही करेंगे? जब कोई संगठन बहुत बड़ा हो जाता है और कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के पद पर रहता है तब उसकी सीमाएं निश्चित हो जाती हैं और वह उसकी वजह से बहुत सारे काम नहीं कर पाता और उसको क्या बोलना है यह भी उन्हीं सीमाओं से तय होता है क्योंकि उसे तमाम अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय जवाबदेही और जिम्मेदारी में बंधकर काम करना पड़ता है जिसमें संविधान, कानून और संसदीय परंपराएं भी होती है जिसका ध्यान रखना होता है। वह हम आम लोगों की तरह उतना आजाद नहीं रह जाता है, यहां तक की जो विपक्ष के सांसद या नेता होते हैं, उनसे भी उसकी स्वतंत्रता कम हो जाती है और वह उतना खुलकर नहीं बोल सकता है जितना विपक्ष के लोग बोल सकते हैं क्योंकि सत्ता में रहने की वजह से उसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही और लोगों की अपेक्षा कहीं ज्यादा हो जाती है।       ऐसे में जो हमारा अपना इकोसिस्टम तैयार हो रहा है जाने अनजाने में हम लोग उसको नुकसान पहुंचा रहे हैं दूसरी तरफ जो लेफ्ट लिबरल (लेली गैंग) इ...

Gardish

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शिकायतनामा  यह शिकायत नई नहीं है  मुट्ठी बांधी हाथ खोला  सोचा .. जितना जो चाहिए  उतना क्यों नहीं होता  फिर सोचा  कम ज्यादा जैसा  तो कुछ नहीं होता जो कम है  वही ज्यादा है  जो ज्यादा है  वह कितना कम है  बस जरूरत  जब जिसकी हो वह उतना मिल जाए ©️ Rajhansraju  Gemini से इस कविता पर एक शानदार चर्चा राजहंस राजू जी की ये पंक्तियां बहुत ही गहराई से संतोष और दृष्टिकोण (Perspective) के दर्शन को समझाती हैं। यह मानव स्वभाव की उस शाश्वत कशमकश को बयां करती हैं जहाँ हम हमेशा 'और' की तलाश में रहते हैं, लेकिन अंत में सुकून 'पर्याप्त' होने में ही मिलता है। आपकी साझा की गई इस कविता का सार कुछ इस तरह उभर कर आता है: कविता का विश्लेषण  * अपेक्षा बनाम वास्तविकता: "मुट्ठी बांधी हाथ खोला" — यह बिम्ब उस कोशिश को दर्शाता है जहाँ हम खुशियों या संसाधनों को समेटना चाहते हैं, पर अंत में खालीपन या अधूरापन महसूस होता है।  * सापेक्षता (Relativity): कविता का सबसे खूबसूरत हिस्सा वह है जहाँ लेखक 'कम' और 'ज्यादा' की परिभाषा को चुनौती देते हैं। जो हमारे...