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यात्री

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न कोई ठहरता है, न मुड़ कर देखता है,
तूँ कौन है,
कैसा है?
किसी को फर्क,  कहाँ पड़ता है,
सब अच्छे से चल रहा,
और हम भी चल रहे,
रास्तों और मंजिलों को,
किसी की परवाह नहीं है,
वो सबके लिए एक जैसी हैं,
अब देखते हैं कौन?
किन रास्तों से होकर, मंजिल तक पहुँचता है,
या फिर,
जिसे मंजिल समझता है,
वह सिर्फ पड़ाव है,
rajhansraju

अच्छा! चलते हैं

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बहुत दिनों से,  कहीं चलने का जिक्र हो रहा था,
पर ए आदत बड़ी अजीब है,
कदम कहीं और पड़ते ही नहीं,
बस उन्हीं जाने पहचाने,
रास्ते और लोगों के बीच,
कैसे भी करके पहुँच जाते हैं,
वहीं पैरों का थम जाना,
तमाम चलने वालों को,
गौर से देखा,
तो यही पता चलता है,
सबने अपनी ठहरने की,
एक जगह बना रखी है,
यहाँ से वह कहीं भी जाए,
मगर लौटकर यहीं आता है,
ऐसे ही उसे,
हर एक चीज भाने लगी है,
जिससे उसका कोई ताल्लुक नहीं है,
वह उसे भी ढूँढता है,
जिसे नापसंद करता है,
उसी की कमी क्यों खटकती है?
वो जानता है,
यह उसके लिए अच्छा नहीं है,
बेचारा! क्या करे?
आदत से लाचार है,
तभी उसने देखा,
वो गली में पड़ा बेकार पत्थर,
आज नजर नहीं आ रहा,
कौन ले गया?
कहीं किसी की,
जागीर तो नहीं बन गया,
हालाँकि!
उससे सिर्फ ठोकर लगती थी,
पर! क्या करे?
आदमी है,
जो बड़ा अजीब है,
इसकी भी,
आदत पड़ गयी। अच्छा चलो कोशिश करते हैं,
एक नयी चप्पल,
और एकदम अलग तरह का,
जूता लेते हैं,
जिसे पुराने रास्ते का अंदाजा न हो,
जिसको घिसने,  ठोकर खाने का,
तजुर्बा भी न हो,
निकलने का वक्त,
रोज जैसा न हो,
फिर देखते हैं,
अपनी फितरत,
हम कुछ बदलते हैं कि नहीं,

कुछ मीठा हो जाए

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उसके पास, 
खाने और पकाने,
दोनों का सामान नहीं था, कई दिनों से, कुछ नहीं खाया था, जैसे तैसे सब जिंदा हैं, आज चेहरों पर, कुछ चमक दिखी, काफी दिनों बाद, कुछ बनाने की तैयारी हो रही थी, उसने कैसे करके,  कुछ रोटियां बनायी,
हाँ! कहीं से थोड़ा सा,
कुछ मिल गया था,
शायद कुछ खराब था,
खैर! ताजा तो नहीं था,
मगर उससे रोटी बन सकती थी,
सबने थोड़ा-थोड़ा खाया,
कुछ पेट की,  और कुछ मन की,
भूख मिटाई। जो थोड़ी अच्छी बन पड़ी थी,
उन्हें बच्चों ने खायी,
जो सबसे खराब,
ज्यादातर कच्ची थी,
जिसने बनाया,
उसने चुपचाप खाया,
और किसी ने,
न कुछ देखा,
न कुछ पूँछा?
उसके हिस्से में,
सच में रोटी थी?
शायद कुछ बचा था,
या फिर पूरा बरतन खाली था,
और सबका मन रखने को,
मैंने खाया जी भरके, उसका यह,
झूठ-मूठ का कहना था, खैर! किसी और ने, यह बात नहीं जानी। अक्सर ऐसा होता है,
खुद के खाने की जल्दी में,
भूल जाते हैं हम,
वो खाना जो परस रहा,
या फिर जिसकी
उंगली में थोड़ी सी भी,  आँच लगी होगी,
उसकी खातिर,
थोड़ा ठहरें, देखें,पूँछे,
मै जो खा रहा,
क्या वो,
सबके हिस्से आ रहा,
अगर कुछ कम है तो आओ,
सब में कूछ कम करते हैं,
ऐसे हर थाली सज जाएगी,
जो भी होगा,
थोड़ा…

मुझे डर नहीं लगता

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वैसे, कहता तो यही हूँ,
मै डरता नहीं हूँ,
ए सच है कि झूठ,
मैं क्यों कहूँ,
रहने देते हैं,
एक पर्दा,
हमारे दरमिया,
सच-झूठ का फैसला,
छोड़ देते हैं,
इस जिद से,
पता नहीं कौन?
रुसवा हो,
यही सोचकर,
फिर कह रहा हूँ,
मै डरता ....
rajhansraju

संगम पर

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कुछ पल,  ठहर कर देखा,
वह अब भी वैसे ही,
बाँह फैलाए,
अपने दामन में भरने को,
धीरे-धीरे बढ़ रही,
मै मूरख भागा डरके,
समझ न पाया,
उसके मन को,
ऐसे ही भाग रहा,
न जाने कब से?
जबकि उसकी बाँहे,
तो गंगा-यमुना हैं,
जो निरंतर बाँध रही,
हम सबको।
rajhansraju

पथिक

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जो हरदम भरा रहता था,
वो खाली है एकदम,
जिससे धार बहा करती थी,
वो चुप है क्यों?
अब भी लोग गुजरते हैं,
जब पास इसके होकर,
एक नजर देख लेते हैं,
घड़ा है निश्चय ही,
इसमें भरा होगा जल,
कुछ खिन्न भाव से लौट गए,
कहा नहीं एक भी शब्द,
पथिक हैं,
बस चलते जाना है,
पर!
कहीं भी खाली घट,
देखकर अच्छा नहीं लगता है,
खुद को बोझ समझता है,
वो राही तब,
जब किसी शहर से गुजरता है,
चलते-चलते शायद,
थोड़ा सा थक जाता है,
करने को आराम कुछ पल,
तनिक ठहर जाता है,
प्यास बुझाने को तब वह,
आसपास नजर दौडाता है,
पानी से भरा घड़ा,
घर की याद दिलाता है,
यहाँ भी उसके खातिर,
जैसे कोई इंतजार में बैठा है,
ए शहर भी अपना लेगा,
उसको यही लगता है,
पर कहाँ हुआ ऐसा कुछ,
घड़ा तो पूरा खाली है,
सबको यहाँ जल्दी है,
पानी भरने की,
कहाँ किसी को फुर्सत है,
जबकि सब प्यासे हैं,
दूर शहर में आए हैं,
आते-जाते जिसको देखो,
सब उसके जैसे हैं,
हर घर खुद का लगता है,
वैसे ही दरवाजा भी खुलता है,
फिर लौट कर वापस कोई जाता है,
जिसको होना था चौखट पर,
जब वह नहीं होता है,
ऐसे ही अपना कोई,
इंतजार करता है,
कब आओगे,
जल्दी आना,
रास्ते में कुछ खा-पी लेना,
थोड़ा …

रोटी का बाजार

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शहर अपने को, 
कूछ यूँ बयाॅ करता है,
बाजार सब चला रहा,
यही लगता है,
यहाँ रोटियाँ खूब बिकती है,
जो भूखे हैं,
वही दुकानों में काम करते हैं,
मगर जब ए बँटती है,
सबसे छोटा टुकड़ा,
इन्हीं को मिलता है। वो न जाने खुद पर,
या किसी और पर,
अब भी हँस रही है
हाँ! वह चिथडों में लिपटी,
रोटी बना रही है,
हर रोटी की अपनी कीमत है,
बस मुट्ठी में,
सिक्कों की जरूरत है,
यहाँ सबके हिसाब से,
रोटियाँ बनती हैं,
जैसी चाहत हो 
वैसे ही रूप, रंग, आकार रखती हैं।
अरे हाँ! वहाँ मक्खन से,
सरोबार रोटियाँ रहती हैं,
जो थोड़ी भारी जेबों को मिलती है।  यहाँ कुछ टेढ़ी-मेढ़ी मोटी होती हैं
पर इनमें स्वाद बहुत है,
ए हरदम भूखे, प्यासे, मेहनतकश,
लोगों के हाथ लगती हैं,
फिर जो लोग इस रोटी को,
अपनी मेहनत से हासिल करते हैं,
असल में स्वाद वाली,
तो सिर्फ,  उन्हीं को मिलता है।
rajhansraju