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Ghost voter

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 The Ghost voter हाय रे तानाशाही! मुर्दों से भी छीन लिया मतदान का अधिकार! 😍😍 Voter List के शुद्धिकरण से कुछ मोदी हेटरों के राजनीतिक जीवन में ऐसा भूचाल आया है कि अब उन्हें लोकतंत्र का भविष्य ही अंधकारमय दिखाई देने लगा है। वर्षों से चुनाव जीतकर सत्ता में आने की उम्मीद लगाए बैठे इन महापुरुषों को अब लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था ही संदिग्ध लगने लगी है। लगता है, चुनाव के रास्ते सत्ता तक पहुँचने की उम्मीद कमजोर पड़ते ही कुछ लोगों ने सीधे लोकतंत्र के पोस्टमार्टम की तैयारी कर ली है। और जब-जब चेतना का कोई दौरा पड़ता है, बस एक ही आवाज गूँजती है— तानाशाह! तानाशाह! तानाशाही नहीं चलेगी! अब जरा इनकी पीड़ा की गहराई समझिए। सरकारी स्कूल चाहिए, सरकारी कॉलेज चाहिए, विश्वविद्यालय चाहिए, अस्पताल चाहिए, राशन चाहिए और सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करने की पूरी आजादी भी चाहिए। प्रेस वार्ता करने की सुविधा भी चाहिए और अपनी बात को वायरल करवाने के लिए मीडिया का सहयोग भी चाहिए। मीडिया वाले भी पूरी तत्परता से लगे हैं। आखिर उनके भी धंधे का सवाल है। किसी की राजनीतिक दुकान चल रही है, तो किसी की टीआरपी की दुकान! इन महा...

Vote Chori

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  हिंदू बूथ बनाम मुस्लिम बूथ चुनाव आयोग भाजपा का है और EVM भी हैक है! अच्छा, एक बात बताइए... अगर यह सब सच है, तो मुस्लिम बहुल बूथों पर भाजपा क्यों नहीं जीतती? उन जातीय समूहों के बूथों पर भी भाजपा क्यों नहीं जीत पाती, जहाँ बहुसंख्यक मतदाता भाजपा, मोदी, योगी और संघ की राजनीति के विरोधी हैं?   क्या इसका मतलब यह है कि ऐसे बूथों पर EVM हैक नहीं होती? और भाजपा उन्हीं बूथों पर जीतती है, जहाँ उसके समर्थक मतदाता बहुसंख्यक हैं        यानी वे मतदाता, जो खुद को राष्ट्रवादी, हिंदुत्ववादी, संघ समर्थक या मोदी-योगी के कट्टर समर्थक मानते हैं? चलिए, फिलहाल आपकी इस दलील को सही मान लेते हैं अब जरा यह भी सोचिए कि हिंदू बहुल बूथों की संख्या तो मुस्लिम बहुल बूथों से कहीं अधिक होगी। फिर चुनावी नतीजों को समझने के लिए इस सामाजिक और राजनीतिक गणित पर बात क्यों नहीं होनी चाहिए? दरअसल, यह सवाल बंगाल और असम के चुनावी विमर्श से भी निकला, जहाँ हिमंत बिस्व सरमा और शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के बयानों में मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन के बिना भी हिंदू वोटों के सहारे चुनाव ज...