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उस पार चलें

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बाढ़ का समय है,  बरसात..  कुछ देर पहले आयी थी,  उसने आसमान को धुल दिया,  अब वह एकदम,   साफ नजर आने लगा है।  नाव ने उस पार,   जाने से मना कर दिया,  इस तरफ के किनारे से मिले,  कितना दिन हो गया था,  अक्सर पानी होता ही नहीं,  बिना पानी वाली,   नदी के किनारे सिमट जाते हैं,   और तब मुझे लेकर,   कोई उस पार नहीं जाता।  अच्छा है कुछ ठहर कर..  आज मै चलूँ..
फिर जी भरके,  उस पार के किनारे से,   इस पार की बात करूँ

सब ठीक है

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खैरियत से  यूँ ही चलते रहिए,  ए जिंदगी का सफर,  एक बहता हुआ दरिया है,  कभी कुछ कम,  कहीं पानी,  बहुत..  गहरा,  है.. इसका एहसास,  उन किनारों  से होता है,  जिसने,  सब कुछ,  थामके,  रखा है।

सैलाब

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समंदर का कतरा,  जो बादलों को गढ़ता है, अपनी मर्जी से, जाने कहाँ-कहाँ बरसता है, आँख से जब चेहरे की ढलान पर बहता है, उसमें नमक का स्वाद, अब भी बना रहता है, वजह सिर्फ़ इतनी सी है जो हर नदी, समुंदर की तरफ बहती है। पानी को अपना रास्ता पता है,  उसे बांधने रोकने की, तमाम कोशिशें, नाकाम होती हैं, वह ढूंढ लेती है, रास्ता.. उन दरारों से, जिस पर किसी की नजर नहीं होती, आँख के कोने से, एक लकीर,   लम्बी होती चली जाती है, बिना किसी आवाज के, वह खुद को मानो, आजाद कर लेती है। लोगों को यही लगता है,  ए जो रिस रहा है, उसके रिसने में कोई हर्ज नहीं है, जबकि दूसरी तरफ, दरिया में सैलाब रुका पड़ा है, और बांध की दीवार, अब दरकने लगी है, उसके लिए सैलाब, एक तरफ, रोक कर रखना, अब संभव नहीं है, ए पानी की लकीरें, उसके टूटने की निशानी हैं, और बाँध के बूढ़े, कमजोर होने की याद दिलाती है। जबकि कभी चालाकी,  कभी नासमझी में, नदी के रास्ते को हमने रोका है, जैसे आँख डब डबा आई हो, और चुपके से, आँसू पोंछ लेते हों, पर! इनका काम तो बहना है आखिर रोककर.. थामकर.. सैलाब का हमें क्या करना? जब…

पिंजरा

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अपने घर में,  परिंदा देखकर,  खुश होते हैं,  उसकी आवाज में,  आवाज मिला देते हैं,  ए भी अच्छा है,  जबान नहीं समझते,  वो दिन-रात अपने घर,  आसमान की बातें करता है,  तुमसे मोहब्बत नहीं है,  ए भी कहता रहता है,  हर बार उसके कहने का,  कुछ और मतलब गढ़ लेते हो,  जबकि उसकी ख्वाहिश,  सिर्फ़ इतनी है,  वह....  इस पिंजरे से आजाद,  होना चाहता है..

सच्चाई

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तेरी आवाज से लगा,  तुझमें सच्चाई है,  पर!  तूँ जब करीब आया,  तेरे हाथ में,  किसी का..  झंडा था..
सिर्फ लब हिल रहे थे,
उसमें आवाज नहीं थी,
तूँ तो एक बुत निकला,
जिसमें जान नहीं है,
जो डोर से बंधा है,
सारी हरकतें,
किसी और की,
महज एक उंगली,
से होती है,
अच्छा हुआ,
तुझे,
करीब से देख लिया,
तूँ जिंदा नहीं है,
ए पता चल गया।

शून्य

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मै शून्य से बना हूँ,  शून्य बन जाऊँगा,  अनंत के दामन में,  विलीन हो जाऊँगा,  ये शून्य की यात्रा है,  जो शून्य ही रहता है,  अनंत का विस्तार,  शून्य ही गढ़ता है,  मै शून्य हूँ सदा,  शून्य ही रहता हूँ  Rajhans Raju

ए भी एजेंडा है

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ए कहने की आदत,  बड़ी अजीब है,  कोई सुनता नहीं,  तब भी कहता रहता है,  आज ऐसा हुआ,  वह शहर के एकदम,  करीब वाले गाँव से,  गुजर रहा था।  लोगों को देखकर,  कुछ आगे बढ़ा,  फिर कुछ सोचकर ठहर गया,  लौटकर आया,  ढ़ेर सारी,  बिन मांगी सीख देने लगा,  जबकि वहाँ कोई भूखा था,  किसी के तन पर,  पूरा कपड़ा नहीं था।  शायद!  वह कोई समाजवादी था,  किसी मार्क्स की बात कर रहा था,  अरे! नहीं वो धर्म धुरंधर है,  ईश्वर को बचाने को कह रहा है,  नजदीक गया तो लगा नास्तिक  है,  लोगों से उनका भगवान् छीन रहा है,  कुछ देर में उसने सब कह दिया,  थक कर जोर-जोर सांस लेने लगा,  किसी ने बिना कुछ पूछे,  एक गिलास पानी,  उसकी तरफ बढ़ा दिया,  पता चला उसे हर चीज़ से चिढ़ है,  वह बहुत नाराज है,  उसे देश, समाज की बड़ी फिक्र है,  अब जाकर उसका एजेंडा पता चला,  उसे भी चुनाव लड़ना है,  वह फला पार्टी का सदस्य है,  जिसका नारा कट्टर उदारवाद है,  जिसमें समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है,  उसकी पहली शर्त यही है,  सिर्फ वह बोलेगा,  किसी और को कुछ कहने की,  इजाजत नहीं है,  तो जो इस खांचे में फिट होते हों,  चुपचाप झंडा लेकर चल देते हों,  जिन्हें क…