Man
मन ऐ मन, तू क्यूँ खुद से ही लड़ता रहे, जज़्बातों की उलझन में पड़ता रहे छोड़ दे सब कुछ अब उसी के सहारे, काहे हर बात पर आहें भरता रहे जब उसने कुछ सोच ही रखा है तेरे लिए, फिर तकदीर से क्यों ड़रता रहे? तेरा तो काम ही है बस चलते जाना, राह में किसी से लड़कर क्या पाएगा? डगर बड़ी लंबी है, मुकाम दूर सही, दो घड़ी ठहर कर, फिर कदम बढ़ाता रहे जो मिल गए रास्ते में, वो अपने बन गए, जहाँ साँस ली जरा सी, वो ठिकाने बन गए रुकना लिखा न था, सो कारवाँ बढ़ता रहा, उम्र के पहिये यूँ ही, खामोशी से चलते रहे लड़ना चाहा भी तो किससे लड़ते, रुकना जब मुमकिन नहीं, तो बस यूंँ ही चलते रहे ©️ Rajhans Raju 🌹🌹🌹🌹🌹 यह कविता मूलतः मनुष्य के अपने ही मन से संवाद, नियति को स्वीकार करने, जीवन की लंबी यात्रा में संघर्षों को छोड़कर आगे बढ़ते रहने और राह में मिले संबंधों को अपना बना लेने की कविता है। इसमें कवि ने जीवन को एक ऐसे कारवाँ के रूप में देखा है, जिसका रुकना संभव नहीं—इसलिए शिकायत और संघर्ष से अधिक सार्थक है कि मनुष्य थोड़ी देर...