save democracy
बदलते भारत को समझने में क्यों चूक रहा है हमारा बौद्धिक वर्ग? जनमत, चुनावी वास्तविकता और वैचारिक जड़ता के बीच उलझा भारतीय विमर्श भारत को समझना केवल उसके समाचारों को पढ़ लेने, चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण कर लेने या कुछ स्थापित राजनीतिक सिद्धांतों के आधार पर समाज की व्याख्या कर देने भर का काम नहीं है। भारत एक ऐसा देश है जिसकी सामाजिक संरचना अत्यंत जटिल है। यहां भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति, सांस्कृतिक परंपराओं और राजनीतिक विचारधाराओं की अनेक परतें एक साथ सक्रिय रहती हैं। इन सबके बीच एक भारतीय होने का बोध भी है, जो अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग रूपों में प्रकट होता है। यही कारण है कि भारत को समझने के लिए केवल आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं, केवल विचारधारा पर्याप्त नहीं है और केवल सड़कों पर दिखाई देने वाली भीड़ भी पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समाज के भीतर चल रही उन प्रक्रियाओं को समझना आवश्यक है, जो कभी सार्वजनिक रूप से दिखाई देती हैं और कभी लंबे समय तक अदृश्य बनी रहती हैं। दुर्भाग्य से, हमारे सार्वजनिक विमर्श का एक बड़ा हिस्सा आज भी ऐसे स्थापित विचारों और व्याख्याओं ...