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मेरे ख्या़ल से

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बहुत कुछ कहने, सुनने कि ख़्वाइश़, 
सभी को है,
पर कहाँ?
किससे और क्यों कहें?
यह सोचकर अक्सर,
चुप रह जाते हैं,
जबकि अंदर,
रह रहकर कुछ गूँजता है,
जबकि बाहर न जाने,
कब से?
मौन पसरा है,
सबको सब,
नजर कहाँ आता है?
कभी गौर से सुनना,
चुप रहकर कोई,
क्या कह जाता है?
फिर ए लफ़्ज़ जो बिखरे हैं,
वो खा़मोशी की निशानी,
तो बिलकुल भी नहीं है,
चलो कुछ,
"यूँ"
बात करते हैं,
सिर्फ़,
बिखरे हुए,
अल्फा़जों की हुनर देखते हैं,
rajhansraju

जरा गौर करना

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चुप रहने कि कोशिश नाकाम रहती है, क्या करे वो जो देखता है,
सुनता है, महसूस करता है,
वह नारा बनता भी है,
लगाता भी है,
और परेशान रहता है
अपनी पहचान के खातिर,
फिर देखता है,
अपने जैसे तमाम चेहरे,
जो भीड़ में निकले हैं,
क्या सिर्फ खो जाने को ?
वो देखो? कौन है?
उस जगह पर,
कुछ बाँध रहा है?
या समेट रहा है खुद को,
सबके बीच में,
सबसे जुदा नजर आता है वो,
ए सच,
सिर्फ तुझको मालूम है,
कौन है वो?
हाँ ! जरा गौर कर,
तूँ जिससे कुछ कह रहा,
और जो तूँ सुन रहा है,
देख तेरे आसपास,
तेरे सिवा,
कोई नहीं है..
rajhansraju

ताला बंद है

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एक दरवाजा,  जो शदियो से नहीं खुला,
उसके बारे में,
तमाम कहानियाँ कही जाती है,
कुछ लोग बताते है,
ए दरवाजा किसी महल में,
जाकर खुलता है,
हलाँकि उसके पीछे,
कोई इमारत,
तो नजर नहीं आती,
बस!
एक छोटी सी दीवार है,
जिसमें ए दरवाजा है,
उसमें एक बड़ा सा ताला लगा है,
यहाँ के लोग,
जो कहानी कहते हैं,
उसमें किसी राजा का जिक्र आता है,
जो बड़ा बेरहम था,
पर!
उसकी एक कमजोरी थी,
वह हर खूबसूरत चीज,
सदा के लिए,
अपने पास रखना चाहता था,
इसके लिए,
उसने,
शानदार कैदखाने बनवाए,
उनके दरवाजों पर,
रत्न जडित ताले लगवाए,
उसे खुद के अक्श से भी,
बेशुमार मुहब्बत थी,
एक कमरे में तो
सिर्फ!
आइना था, जहाँ राजा खुद को देखता था,
और पहले जैसी शक्ल,
तलाशता रहता,
उसकी बदनसीबी
तब शुरू हुई जब,
आइने में, 
हर दिन,
कोई और आदमी,
नजर आने लगा,
जिसका जिक्र,
वह किसी से नहीं करता,
राजा जो ठहरा?
लोग हंसेगे?
कमरे में तो सिर्फ आइना है,
वह चुपचाप,
खुद को ढूंढने की नाकाम,
कोशिश करता रहा,
अकेले में आइना देखता रहा,
धीरे-धीरे उसने,
सबको आजाद कर दिया,
बस यही एक ताला,
जो अब तक बंद है
जिसकी चाभी,
उससे,
न जाने कहाँ?
गुम हो गयी,
कहते है…

अपना-अपना दुःख

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सोचता हूँ क्या कहूँ? लड़खड़ाते कदम अच्छे हैं,
या फिर लड़खड़ाती आवाज,
कुछ भी हो?
अच्छा नहीं लगता,
नींद का यूँ खो जाना।
शायद! कभी-कभी,
किसी को अलविदा कहना,
बड़ा मुश्किल होता है,
वो भी जिसके साथ इतना वक्त गुजारा,
उसने भी तो भरपूर साथ निभाया,
फिर उसके लिए,
चंद रातें जाग लेना,
बुरा तो नहीं है,
हो सकता है,
उसको आखरी बार,
जी भर कर देखने की चाहत हो,
अब एक दूसरे को,
आखरी अलविदा कहना है। वो दुःख जो उसका अपना है, जिसकी चादर ओढ़े है,
उसी से एक सुकून है,
जिसको कसके थामा है,
कम से कम वो उसका अपना है,
हलाँकि साँस उसकी चलती नहीं,
धड़कन सुनाई देती नहीं,
पर गरदन जिसने पकड़ा है,
वह कहता उसको अपना है,
छोड़कर उसको चल न दे,
यूँ ही जिंदा छोड़ दे,
ए भी उसके लिए,
अच्छा नहीं है,
जिंदगी से डरता है,
खुद का सामना,
कहाँ करता है?
कहीं आँख पूरी खुल गयी,
या नींद उसको आ गयी,
कुछ और सपने आ गए,
या सच थोड़ा सा दिख गया,
तब पुराना दुःख कहाँ रह पाएगा,
बिना उसके,
पास क्या रह जाएगा? जबकि, एक कच्ची डोर ही काफी है,
जिसे थामकर,
दरिया नहीं,
समंदर,
पार कर जाएगा,
फिर पार बैठा
उस दुःख पर,
मुस्कराएगा,
जो अब भी वहीं ठहरा है,
जो …

यात्री

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न कोई ठहरता है, न मुड़ कर देखता है,
तूँ कौन है,
कैसा है?
किसी को फर्क,  कहाँ पड़ता है,
सब अच्छे से चल रहा,
और हम भी चल रहे,
रास्तों और मंजिलों को,
किसी की परवाह नहीं है,
वो सबके लिए एक जैसी हैं,
अब देखते हैं कौन?
किन रास्तों से होकर, मंजिल तक पहुँचता है,
या फिर,
जिसे मंजिल समझता है,
वह सिर्फ पड़ाव है,
rajhansraju

अच्छा! चलते हैं

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बहुत दिनों से,  कहीं चलने का जिक्र हो रहा था,
पर ए आदत बड़ी अजीब है,
कदम कहीं और पड़ते ही नहीं,
बस उन्हीं जाने पहचाने,
रास्ते और लोगों के बीच,
कैसे भी करके पहुँच जाते हैं,
वहीं पैरों का थम जाना,
तमाम चलने वालों को,
गौर से देखा,
तो यही पता चलता है,
सबने अपनी ठहरने की,
एक जगह बना रखी है,
यहाँ से वह कहीं भी जाए,
मगर लौटकर यहीं आता है,
ऐसे ही उसे,
हर एक चीज भाने लगी है,
जिससे उसका कोई ताल्लुक नहीं है,
वह उसे भी ढूँढता है,
जिसे नापसंद करता है,
उसी की कमी क्यों खटकती है?
वो जानता है,
यह उसके लिए अच्छा नहीं है,
बेचारा! क्या करे?
आदत से लाचार है,
तभी उसने देखा,
वो गली में पड़ा बेकार पत्थर,
आज नजर नहीं आ रहा,
कौन ले गया?
कहीं किसी की,
जागीर तो नहीं बन गया,
हालाँकि!
उससे सिर्फ ठोकर लगती थी,
पर! क्या करे?
आदमी है,
जो बड़ा अजीब है,
इसकी भी,
आदत पड़ गयी। अच्छा चलो कोशिश करते हैं,
एक नयी चप्पल,
और एकदम अलग तरह का,
जूता लेते हैं,
जिसे पुराने रास्ते का अंदाजा न हो,
जिसको घिसने,  ठोकर खाने का,
तजुर्बा भी न हो,
निकलने का वक्त,
रोज जैसा न हो,
फिर देखते हैं,
अपनी फितरत,
हम कुछ बदलते हैं कि नहीं,

कुछ मीठा हो जाए

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उसके पास, 
खाने और पकाने,
दोनों का सामान नहीं था, कई दिनों से, कुछ नहीं खाया था, जैसे तैसे सब जिंदा हैं, आज चेहरों पर, कुछ चमक दिखी, काफी दिनों बाद, कुछ बनाने की तैयारी हो रही थी, उसने कैसे करके,  कुछ रोटियां बनायी,
हाँ! कहीं से थोड़ा सा,
कुछ मिल गया था,
शायद कुछ खराब था,
खैर! ताजा तो नहीं था,
मगर उससे रोटी बन सकती थी,
सबने थोड़ा-थोड़ा खाया,
कुछ पेट की,  और कुछ मन की,
भूख मिटाई। जो थोड़ी अच्छी बन पड़ी थी,
उन्हें बच्चों ने खायी,
जो सबसे खराब,
ज्यादातर कच्ची थी,
जिसने बनाया,
उसने चुपचाप खाया,
और किसी ने,
न कुछ देखा,
न कुछ पूँछा?
उसके हिस्से में,
सच में रोटी थी?
शायद कुछ बचा था,
या फिर पूरा बरतन खाली था,
और सबका मन रखने को,
मैंने खाया जी भरके, उसका यह,
झूठ-मूठ का कहना था, खैर! किसी और ने, यह बात नहीं जानी। अक्सर ऐसा होता है,
खुद के खाने की जल्दी में,
भूल जाते हैं हम,
वो खाना जो परस रहा,
या फिर जिसकी
उंगली में थोड़ी सी भी,  आँच लगी होगी,
उसकी खातिर,
थोड़ा ठहरें, देखें,पूँछे,
मै जो खा रहा,
क्या वो,
सबके हिस्से आ रहा,
अगर कुछ कम है तो आओ,
सब में कूछ कम करते हैं,
ऐसे हर थाली सज जाएगी,
जो भी होगा,
थोड़ा…