chauraha
चौराहे पर ठहरा हुआ कब से यहीं ठहरा हुआ हूँ, जहाँ से कई रास्ते गुजरते हैं, हर रास्ता अलग-अलग दिश में है न जाने किसे कहांँ तक ले जाएगा तुम किधर गए होगे, यह समझ नहीं पा रहा हूँ, इसलिए थक कर यहीं ठहर गया हूँ कुछ लोग इसे चौराहा कहते हैं वह जगह जहाँ से हर तरफ जाया जा सकता है लेकिन जब किसी की तलाश हो, तो यह तय करना कितना मुश्किल होता है आखिर अब किस तरफ चला जाए कहीं ऐसा न हो मैं तुम्हारी तलाश में निकलूँ और किसी ऐसे रास्ते पर चला जाऊँ जहाँ तुम कभी आए ही न हो इसीलिए अब यहीं ठहर गया हूँ, इस उम्मीद में कि शायद तुम खुद लौटकर आओ, और तुम्हें भटकना न पड़े। अगर मुझसे मिलने की तुम्हारे मन में कोई ख्वाहिश हो, तो तुम भी किसी चौराहे पर आकर यूँ ही अटक न जाना। बस, इसीलिए यहीं ठहरा हुआ हूँ तुम्हारे इंतज़ार में ©️ Rajhans Raju 🌹🌹🌹🌹🌹 यह कविता “चौराहे पर ठहरा हुआ” मूलतः किसी व्यक्ति के इंतज़ार की कविता होते हुए भी उससे कहीं अधिक गहरी है। इसमें प्रेम, प्रतीक्षा, असमंजस, थकान, तलाश, दूरी और उम्मीद —इन सभी भावों को “चौराहे” के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया गया है। कवि ...