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निकम्मा😀😀

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यूँ खुश होकर,  तालियाँ मत बजाओ,
यहाँ सवाल खुद को, 
पाने और खोने का है,
दर्द ए है कि खुद के मरने का, 
मातम भला कैसे मनाए?
जबकि अब भी,
गरदन बहुत कसके दबी है,
मुँह टेढ़ा हो गया है,
और जीभ ऐंठ गयी है,
सिर्फ एक ही कमी है
मरने वाली feeling नहीं दिखती,
कमबख्त शक्ल ही ऐसी है,
लगता है हँस रहा,
वैसे ही जैसे बिना चेहरे वाले,
कंकाल होते हैं,
जो चेहरों पर हंसते है,
वो न तो अपना,
न तो दूसरों का चेहरा देखते हैं,
अब उन्हें ए मालूम है,
असल में जो है,
उसमें आँख नहीं है,
और चेहरों में कोई फर्क नहीं है,
अब वह चेहरे के साथ भी हंसता है
हश्र चेहरे का,
उसने, जबसे जाना,
उसके चेहरे पर,  अनायास हंसी रहने लगी,
उसके यूँ हँसते रहने पर,
उस पर बेहया होने का इलजाम,
लगता है,
कैसा निकम्मा है,
देखो,
अब भी,
कैसे हँस रहा है। 😁😁😁😁😁
rajhansraju

धागों का इंद्रधनुष

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धागों का, टूटना और छूटना,
कभी चटक जाना
कभी छटक जाना
फिर उन्हें समेट लेना
पूरा धागा बना लेना
उसका एक सिरा,
कभी कसके पकड़ लेना, किसी गाँठ का पड़ जाना, किसी वजह से कुछ उलझ जाना, ऐसे में एक दूसरे को, थोड़ा वक्त देना,
बस! किसी उंगली से थाम लेना,
ए उम्मीद की डोर,
जो अब भी बंधी है,
उसके किसी उंगली में,  हो सकता है, सिर्फ फॅसी हो,  जबकि दूसरा सिरा,
अब भी मेरी तरफ है,
तो इसकी वजह यही है,
ए डोर अब भी कायम है।
वैसे भी जो कच्ची मिट्टी,
कच्चे धागे से बना हैं,
उनके कुछ भी बनने का सिलसिला,
कभी खत्म नहीं होता,
उसे तो सिर्फ वो कुम्हार, 
वो जुलाहा चाहिए, 
जो उसे गढ़ दे,
और रंगो से ऐसे रंग दे, बस यूँ ही,
हर बार नया हो जाए,
शायद! इसी इंतजार में,
वह एक सिरे पर,
बिना रंग, बिना धागे के,
खाली हाथ बैठा रहा।
जबकि दूसरे सिरे पर,
आज उसके हाथ में,
इंद्रधनुष है,
हालाँकि,  उसे इस बात की उम्मीद नहीं थी, कोई रंग आकर उसे छू लेगा, वह आज सतरंगी हो जाएगा,
पर ए भी सच है!
सुबह अपनी कलाई पर,
उसने "छः रंग"
खुद ही बाँधे थे, बस एक की कमी थी। rajhansraju

बे-चेहरा

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हलाँकि,
उसे यही लगता है,
उसने मुझे,
ऐसो आराम का हर सामान दिया है,
मुझे महफूज रखने की सारी व्यवस्था की है,
और लोगों से,
मुझे समझने का दावा करता है,
ए लिबास और दीवार,
मेरे लिए तो है,
देखो कितनी खूबसूरत है,
ए जंजीर सोने की है,
इसमें हसीन पत्थर जड़े हैं,
सब कुछ बहुत कीमती है,
मुझको सर से पाँव तक,
हर तरह की रंगीन बेडियों से जकड़ा है,
जिसे कभी कोई लिबास, जेवर,
या कुछ और कह देता है,
उसका दावा अब भी यही है,
वह,
मेरे सहूलियत,
मेरे हक की बात करता है,
ए और है कि उसने कभी,
मेरी आवाज नहीं सुनी,
मुझे सिर्फ बुत समझते रहे,
और मै,  बिना किसी पहचान के,
हरदम बेचेहरा रही,
rajhansraju

खोटे सिक्के- बाजार में

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मेरी जरूरत का हर सामान
बाजार में मिलता है,
दुकानों में क्या कुछ नहीं है,
इंसानी शक्लों की पूरी तह लगी है,
खरीदने, बेचने और बिकने वाले,
हर जगह,
जैसे एक ही आदमी हो,
कौन, किस तरफ, क्या है?
कुछ भी समझना,
बहुत मुश्किल है।
तभी अलग शक्ल लिए,
कुछ लोग,
दुकान की चौखट पर आए,
अपने खास होने का,
एक अजीब सा उलझा हुआ,
कुछ?  यकीन जैसा लगा? जैसे खुद को थोड़ा बहुत पहचानते हों,
पर यह क्या?
दुकान का दरवाजा खुलते ही,
उसकी चमक ने सबको,
अपनी आगोश में ले लिया,
ऐसे ही, जो भी यहाँ आया,
अपनी सूरत खोता रहा,
जिसकी पहली शर्त यह है,
इसकी कीमत,
उसे खुद ही चुकाना है,
असली काम?  जिनके जेब में सिक्के है,
उन्हें दुकान तक लाना है।
जबकि, अब भी उसे अपनी जरूरत का,
ठीक से अंदाजा नही है,
बस वह खरीद सकता है,
इसलिए खरीदता रहता है।
ऐसे में कभी-कभी लगता है,
शायद!  वो ज्यादा खुश नसीब हैं,
जो बाजार से,
अक्सर?
खाली हाथ लौट आते हैं,
या तो उनको ए बाजार
समझ नहीं आता,
या फिर एकदम कड़के हैं,
मतलब इनकी जेबें खाली हैं,
जिसमें शायद!
इनकी पूरी मर्जी नहीं है,
पर ऐसे ही,
कुछ अपनी सूरत के साथ,
बचे रह जाते हैं।
शायद! थोड़े जिद्दी हैं, 
या फिर…

बेनाम, लावारिस, .... कत्ल?

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चर्चा तो यहाँ भी है कत्ल का
जो कि नया नहीं है
हलांकि ए कत्ल किसने किया?
इसका कोई चश्मदीद नहीं है,
उसको किसी और ने मारा
या फिर वह खुद ही कातिल था
ए किसी को पता नहीं है।
सच ए है कि
वो जिंदा नहीं है,
यकीनन कत्ल तो हुआ है।
इसमें कोई शक नही है,
ऐसे ही मुर्दों के मिलने का सिलसिला
न जाने कब से चलता रहा।
ए बिना नाम
बिना पहचान के लोग।
अरे! नहीं!
ए पूरा सच नहीं है
इनका भी घर है
बस थोड़ा सा ढूँढना है
न जाने कितनो का
अब भी कोई पता नहीं है
कैसे किस हाल में होंगे
पर! अक्सर गुमनाम, लावारिस, बेजान
जो किसी को नहीं मिलते
यूँ ही धीरे-धीरे गुम हो जाते हैं
उन्हें न तो श्मशान मिलता है
और न ही कब्रिस्तान,
उनके जाने की
किसी को खबर नहीं होती,
कोई मातम भला कैसे होगा?
वो जिस घर का शख्स है,
इससे अनजान,
उसके इंतजार में रहता है,
यह उम्मीद अच्छी है कि बुरी,
क्या कहें?
पर! उसके होने का भरोसा
सब में,
बहुत कुछ जिंदा रखता है।
आज बहुत कुछ टूटा,
घर के हर शख्स में
कुछ खाली सा हो गया।
क्या जरूरत थी
जो उसके जाने के वर्षों बाद
किसी लावारिस के शिनाख्त की,
उसके घर वालों की,
वो जो लौटने की
उम्मीद थी
अब,
सदा के लि…

शब्द जो हमने गढ़े हैं

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जो स्वाभाविक है
उसे ही तो होना है
ए खुद का अल्फाज बनकर,
किसी कागज पर बिखर जाना,
कुछ ऐसा ही है।
जहाँ अलग से कोई प्रयास नहीं होता,
ए जो,
कुछ खाली खाली सा है
उसी में खुद को
भर देता है।
किसी के वक्त का,
एक कतरा नहीं लेता,
वह तो सिर्फ खाली लम्हों को,
खामोशी से,
न जाने कौन सी,
जुबान दे जाता है।
जो उसके परतों की ही खोलते हैं,
सब कुछ बयाॅ करके भी,
न जाने कैसे?
उन परतो को भी बनाए रखते हैं।
ए कुछ सुबह की नींद जैसी है,
जब वह जाग कर भी,
बिस्तर नहीं छोड़ पाता,
सुबह को इंकार करने की चाहत तो है,
मगर ए सूरज बहुत हठी है,
भोर होते ही,
सबसे आँख मिलाता है,
जो काले शब्द पूरी रात,
हमने गढे,
हर एक का मतलब,
बताता है।
ए शब्दों का अजब खेल है,
इसे चुपचाप खेलना है,
पर! सूरज ने उंगली पकड़ कर
जो समझाया,
वो किसी से नहीं कहना है,
और शब्दों को यूँ ही मजे से,
गढ़ते रहना, 
यह तो नशा-ए-लुत्फ है
जिसको पाने के लिए,
न तो कुछ देना है,
और कहीं जाना भी नहीं,
बस दौर-ए-जिंदिगानी की तमाम,
परीक्षाओं को हँसकर बिता देना है,
जो महज,
आगे बढ़ने का फलसफा है,
ए तो चंद शब्दों में,
खुद को दर्ज करने का तरीका है,
जो कभी किसी …

इच्छाधारी

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इच्छाधारी नाग-नागिन की कहानियाँ,
तो हम सबने सुनी है,
जिसमें वो कोई भी रूप धारण कर लेते,
बचपन!
अगर गाँव में बीता हो तो,
सिनेमा वाला दृश्य, 
हर जगह मौजूद होता है,
बस कल्पना को,
डर वाली कहानियों के रंग से भरना है,
ऐसे ही साँप से डरने पूजने,
और मौका मिलते ही,
मार देने का,
अजब व्यवहार करते रहे,
इसमें किसी के लिए कुछ भी गलत नहीं,
हर आदमी अपनी आस्था और कहानी गढ़ता है,
पर साँप का जहर?
बड़ा अजीब है,
जो उसकी पहचान है
इंसान उसी से डरता है,
इसी डर से,
तमाम विषहीन साँपो,
की जान खतरे में पड़ जाती है,
क्यों कि हमको पता नहीं चलता,
किसमे जहर नहीं है,
अक्सर इस अफरा तफरी में,
बिना जहर वालों की जान चली जाती है,
उनका सांप होना,
उनके लिए सजा बन जाती है।
खैर! अब तो शहर का जमाना है
पर साँप के होने पर संदेह नहीं करना,
आस-पास हमारे,
अब सिर्फ,
इच्छाधारी रहते हैं,
जो हर वक्त रंग बदलते हैं,
हमारे ही आस्तीनों में रहते हैं,
जो खुद बीन बजाता है,
दूध पूरा पी जाता है।
उन सीधे साधे साँपो को,
नाहक बदनाम करता है,
जो बिना कान का,
जिसमें विष भी नहीं है,
सारा इल्जाम उस पर लग जाता है,
जबकी उस तक बीन की आवाज,
ज…