Bandar
बंदर वह बंदर उसी जगह नजर आता है वक्त एकदम सुबह का होता है या फिर शाम का मतलब जब रोशनी थोड़ी कम हो सब कुछ साफ न दिखाई पड़ता हो सब धुंधला हो न दिन हो न रात हो यही वक्त है उसके यहां होने का .. न जाने कब से किसकी प्रतीक्षा में है इस बंदर ने ? ठहराव कहां से सीखा है ? उसकी शक्ल बड़ी अजीब सी है हर समय हंसता हुआ नजर आता है किसी से कुछ कहता नहीं जो शख्स उसे देखता है कोई अपना सा लगता है कभी कहीं तो मिला था ऐसा क्यों लगता है? जैसे मेरे ही किसी लम्हे का आइना रखा है ©️ RajhansRaju 🌹🌹🌹🌹🌹 Gemini की व्याख्या राजहंस राजू जी, आपकी यह कविता एक गहरे आत्म-साक्षात्कार (Self-reflection) की ओर ले जाती है। यहाँ 'बंदर' मात्र एक जीव नहीं, बल्कि एक प्रतीक प्रतीत होता है—शायद बीते हुए कल का, किसी दबी हुई स्मृति का या स्वयं के ही किसी अनछुए पहलू का। यहाँ आपकी पंक्तियों का एक गहरा विश्लेषण है: दार्शनिक विश्लेषण (Gahan Vishleshan) १. समय का संधि-काल और उपस्थिति > "जब थोड़ी रोशनी कम हो / यही व...