Alvida

अलविदा
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स्मृतियों में वह, 
इस तरह बरकरार रहता है, 
हर वक्त साथ में है, 
यही तो लगता है, 
यह आने-जाने का सिलसिला, 
यूँ ही चलता रहता है, 
भीतर जो ठहर गया है, 
अपना सा लगता है, 
वह जो दूर जाता दिखाई देता है, 
कुछ और नहीं है, 
रोशनी का सफर है, 
जो परछाई को, 
छोटा-बड़ा कर देता है, 
जबकि बड़े होते आकार, 
देखकर वह हंसता है, 
दोनों हाथ उठाकर,
कुछ और बड़ा हो जाता है, 
फिर दोपहर, 
रोज की तरह, 
उसे कदमों में ला देता है, 
खुद को इस तरह, 
एक जगह में सिमटा देखकर, 
मुस्करा देता है, 
तभी अपने अंदर मौजूद, 
कुछ सुनने लग जाता है, 
फिर कैसे अलविदा कह दे, 
वह अब भी यहीं मौजूद है, 
कोई, कहीं आता-जाता नहीं है।
बुलंदी पर पहुँचने की ख्वाहिश में, 
क्या कुछ करता रहता है, 
लम्बे सफर पर, 
बिना ठौर के चलता रहता है, 
उसके जैसा बनने की, 
हसरत लिए, 
सब चल पड़े हैं, 
जबकि सबसे ऊपर, 
वह एकदम अकेला है, 
उसके पास तन्हाइयों के सिवा, 
कुछ भी तो नहीं है, 
ऐसे में किसी अकेले को, 
पूरा आसमान मिल जाये, 
तो क्या होगा?
नि:संदेह, 
औरों के लिये, 
सारा मंजर बहुत हसीन होगा,
मगर वह शख़्स,
इस आसमान का क्या करेगा, 
किसके लिए कहाँ रखेगा, 
वह तो ऊँचाई पर अकेला है,
लोग अब भी यही कह रहे हैं, 
वह बहुत बड़ा आदमी है, 
उसके हर तरफ रोशनी, 
कुछ इस तरह आ रही है, 
अपनी परछाई, 
ठीक से नहीं बन पा रही है, 
तन्हाई की किससे चर्चा करे, 
अपना साया भी, 
नजर आता नहीं है..
rajhansraju
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हम फिर मिलेंगे 

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(2)
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हमने तो सच को, 
पैमानों में तय कर रखा है, 
कब उसे कितना मानना है,
एकदम स्वादानुसार,
शायद! नमक जैसा, 
अपनी-अपनी मर्जी से, 
तय करते हैं,
किसको, कितना चाहिए, 
या फिर वैसे ही जैसे, 
कोई ऐसा सामान हो,
जो बड़ी मुश्किल से, 
कभी-कभी बिकता हो,
जबकि सब जानते हैं 
यह कितना जरूरी है,
पर! बाजार को,
इसकी आदत, 
नहीं है
©️Rajhansraju 

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(३)
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हम आपको सलाम करते हैं
इस जज़्बे से ही
सबकी हिम्मत कायम है
मेरे फरिश्ते
हर जगह मौजूद हैं
जो मेरे लिये
जमीन आसमान
एक कर देते है

©️Rajhansraju 

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(४)

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ये गुनहगार भी बहुत खुब है
अपने गुनाह को भी
बड़ी मासूमियत से ढक लेता है
हाथ में हर वक्त
गुनाह का कबूलनामा है
और अपनों से ही
सजा की मांग करता रहता है
जब कि वो तो एक अर्से से
उसके दिदार में बैठे हैं
उन्हें तो वह उनका
मसीहा लगता है
©️Rajhansraju 

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