फुटपाथी

देखो धरती आसमान से, 
कैसे मिलाती है क्षितिज पे ।
जैसे कोई बिछड़ा बच्चा ढूंढें, 
माँ की गोद को,
फुटपाथ पर भी होते हैं बच्चे, 
बिना माँ बाप के।
अकेले लड़ते भूख और समाज से ।
एक रूठा बच्चा, 
पास नहीं कोई ,आस नहीं कोई ।
कब तक चलेगा बिना सहारे, 
मरे बचपन के साथ ,
हाथ में उठाए बचपन का बोझ ।
कोई नहीं पूंछता उसका नाम ,
हर कोई कहता है रामू या छोटू ।
नाम की जरूरत ही नहीं पड़ी उसे ,
सब अपने हिसाब से, 
रख देते हैं उसका नाम ।
उसे भी नहीं मालूम ,
किसी ने कभी रखा हो, 
उसका कोई नाम ।
कभी कप - प्लेट धोता ,
किसी घर में, 
पोछा लगाता मिल जाता है ,
यह रामू या छोटू पेट भरने को चंद टुकडे ,
साथ में दो -चार थप्पड़,
रोने की भी चाहत कहाँ रह जाती है ।
कोई आंसू नहीं पोंछता यहाँ ,
हर कोई देता है, एक भद्दा सा नाम ।
फिर भी वह हँसता है, 
जवाब देता है , हर नाम पर ।
आधी रोटी से भी भर जाता है, 
उसका पेट ,
क्योंकि गालियाँ, थप्पड़, 
आज काफी थे ।
वह फिर हँसता है, बेबस लोगों पर ,
जो खुद और समाज से हारे हैं ।
अपना गुस्सा और रौब, 
उस पर जता रहें हैं ।
उसे नहीं मालूम, 
जीवन के और भी अर्थ हैं ,
जिसे वह नहीं जानता ।
वह तो इतनी जल्दी, 
बड़ा हो गया कि चंद दिनों में ही ,
दुनिया से हारे लोगों को जान गया ।
वह हँसता है, खिलखिलाता है ,
उसे माँ की कमी नहीं खलती ।
क्योंकि वह किसी माँ को नहीं जानता ।
फेंक दिया गया था, सड़क किनारे,
किसी कूड़ेदान में ।
उसी के जैसे किसी ने उसे उठाया था ,
रोते -रोते कब चलना सीखा,
नहीं मालूम ।
कोई अंगुली उसने नहीं पकड़ी ,
भूख ने ही उसे सब सिखाया ,
चोरी करना छीन के खाना ।
वह माँ नहीं,
मालकिन को जानता है ,
जो हमेशा डाटती है,
कभी-कभी मारती है ।
वह फूटपाथ पर ही,
लड़ता और बढ़ता है ,
सड़क किनारे रोटियां,
गलियां पर्याप्त, 
मिल जाती हैं ।
इतने से ही खुश हो लेता है,
जरूरंते कितनी सीमित ।
एक दिन और जिन्दा रहा, 
चलो फिर, खुश हो लिया ।
भूख तक सब कुछ सीमित,
सड़क छाप, आवारा ,
कुछ भी कह लो,
कोई फर्क नहीं ।
मस्त अपनी धुन में खोया,
न कुछ पाने की ख्वाइश,
न कुछ खोने का डर।
बस ! एक दिन और एक रात कटी ,
जिंदगी यूँ ही चलती रही ।
इसके बाद भी वह हँसता है,
मुस्कराता है ।
जब भी वह अकेला होता है ,
क्षितिज के पास पहुँच जाता है ।
यही धरती,यही आसमां देते हैं,
उसको ताकत ,
आगे बढ़ने की ।
एक मुस्कराहट ,एक एहसास ,
खुद के होने का ।।

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