sharaabi

नशेड़ी 

 वह भरपूर नशे में 

ऐसी जगह बैठा था 

जहां शरीफ लोग नहीं आते-जाते 

कम से कम उसे 

अच्छी जगह तो नहीं कहते 

हालांकि वहां भीड़ कम नहीं होती 

यह कहें कि हर समय रौनक 

ऐसी ही जगह पर रहती है

ज्यादातर लोग 

मुंह छुपा कर आते हैं

अपनों से छिप छिपाकर आते हैं 

या फिर ऐसे लोगों के साथ आते हैं 

जो एकदम उनके जैसे होते हैं 

उसकी हांँ में हांँ मिलाते हैं 

सबके हाथों में प्याले हैं 

यहां कुछ भी कम नहीं है 

हर चीज की अपनी कीमत है 

बस कुछ भी मुफ्त नहीं है 



छोटे छोटे बदबूदार कमरे 

उनमें एक बेतरतीब बिस्तर 

यहां रिश्तों की कोई पहचान नहीं है

सिर्फ एक ही रिश्ता है 

जिसकी भी 

खास कद्र नहीं है

तुम कौन हो?

इससे कोई मतलब नहीं 

बस कुछ देर तक 

फिर कौन कहां किसे पता 

अगले ग्राहक का इंतजार 

दलालों के बीच बंटते 

पैसे का खेल 

बोली लगती रही 

बिकने वाले अनजान रहे 

धीरे धीरे अपने हश्र तक पहुंचते रहे 

किसी ने उनकी सुध नहीं ली 

जब तक शरीर स्वस्थ है 

जेब में पैसा है 

तब तक सब ठीक है 

इस जगह के मायने ही यही है 

खनक अच्छे से आनी चाहिए 

नहीं तो आप किसी काम के नहीं है 



उसने हाथ में प्याला उठाकर पूछा 

बताओ मेरी गलती क्या है 

मैंने क्या गलत किया है 

मैं इतना दुखी हूंँ इतना परेशान हूंँ 

तो भला शराब क्यों न पीता रहूंँ 

यहां दूसरे भी जो ऐसे ही नशे में हैं 

उन्हें भी ऐसे ही 

अपने वजूद का एहसास हुआ 

मैं ऐसा क्यों ना करूं 

मुझे यह दुनिया रास नहीं आती 

उसके साथ वालों ने 

हांँ हमें हांँ मिलाई 

उसको लगा वह एकदम सही है 

अपने सही होने की तमाम दुहाई देता रहा 

वहां मौजूद सभी लोग 

इसी तरह की बातें कर रहे थे 

ऐसी जगह पर 

ऐसी ही बातें सही होती हैं 

कोई गलत नहीं होता 

नशेड़ियों की भी अपनी दुनिया है 

इसी तरह अपराधियों 

और न जाने 

किस-किस तरह के गोश्त 

खाने वाले जानवरों की भी 

अपनी एक पूरी दुनिया है 

जहां उनके हिसाब से 

सब कुछ सही है 

उनके लिए सही के पैमाने 

वही तय करते है 

पर कहानी तो कुछ और थी 

घर में सब कुछ था 

रहने खाने के लिए 

जैसे भी हो 

जिंदगी बसर हो सकती थी 

वैसा ही सब कुछ था 

ठीक-ठाक था 

शिकायत के साथ भी 

किसी तरह सब चल रहा था 



कितना अच्छा हो 

कुछ लोग कुछ न करें 

बस जितना है उतने में रहे 

अच्छा तो होगा कुछ बेहतर कर ले 

पर जो है उसको बर्बाद करना 

कहां तक ठीक है 

खैर अक्ल पर पत्थर पड़ना 

इसे ही कहते हैं 

जब पड़ जाता है 

तब सही गलत का फर्क नहीं रह जाता 



वह जब भी घर से निकला 

जेब उसकी खाली नहीं थी 

जो भी जेब में था 

उसने नहीं कमाया था 

कोई काम कोई जिम्मेदारी 

उसके सर माथे नहीं थी 

घर में कोई बीमार था 

या फिर बहुत जरूरी काम था 

पर उसे इस बात का 

तनिक भी एहसास नहीं था 

उसकी अपनी कुछ बेहद निजी ज़रूरतें थी 

इसके आगे उसके लिए कुछ नहीं था 

अपना खाना हमेशा याद रहता था 

आवारागर्दी जिसे कहते हैं 

उसमें कोई कमी नहीं थी 

दवाई के लिए पैसे लिए 

उसने पैसा एकदम सही जगह लगाया 

पर वह अस्पताल नहीं था 

ऐसा ही होता है 

सही जगह का चुनाव 

अपना-अपना होता है 



उसके बाद भी उसे यही शिकायत थी  

कम पैसे मिले उसे और चाहिए 

इसलिए वह उधार करके आया है 

इसमें भला उसकी क्या गलती है 

उसे किसी के साथ ठेके पर जाना था 

चला गया तो क्या हो गया 

एक दो महिला मित्र भी है 

जो उसी की तरह समझदार हैं

जो अपने और उसके सच से वाकिफ हैं 

फिर भी अनजान हैं

क्योंकि उसके पास 

अब भी पैसे हैं

उसने फिर कहा 

जमाना तो ऐसा ही है 

वह सही है 

बाकी लोगों को ही समझ नहीं है 

वह संभाल सकता है काबिल है 

यह कहते हुए भी लड़खड़ा रहा है 

कुछ बोलने के लिए भी 

उसे शराब चाहिए 

अब खाना भी हज़म नहीं होता 

यह लत इस हद तक बढ़ गई है 

वह कौन है 

इसका एहसास नहीं होता 

अब भी यही कह रहा है 

उसमें हर चीज है 

सब लोग तो ऐसे ही हैं 

वह सही है 

उसे कुछ गलत नहीं लगता 

वह जिन लोगों से मिलता है 

जो उसके बहुत खास हैं 

वहां ऐसा ही है 

जहां इन चीजों के लिए 

बहुत संभावना है 

कोई दिक्कत नहीं है 

सब ऐसे ही होते हैं 

मैं अकेला थोड़े हूंँ 

उसके तर्क बड़े भारी थे 

उसे सारा काम 

जो उसे बीमार कर रहा था 

सही ही लगता है 

सही गलत का कोई एहसास नहीं 

आज भी क्या सही क्या गलत है 

इससे उसे 

कोई खास मतलब नहीं है 

बस उसे यही लगता है  

वह सही है 



अच्छा ठीक है 

आगे क्या कहा जाए 

जिंदगी तो चलती ही रहती है 

जब तक चल सकती है 

सही गलत होने के भी 

भला क्या कोई मायने होते हैं ?

अपने-अपने तर्क अपनी-अपनी बात हैं 

तमाम लोग 

जिस तरह के लोगों के बीच रहते हैं 

धीरे-धीरे वही लोग 

सही लगने लग जाते है 

तमाम अपराधी न जाने 

कितने गंदे काम करते हैं 

उन्हें भी वह काम सही ही लगते हैं 

कैसे भी पैसा कमाना चोरी दलाली

जैसे काम करना बुरा लगता 

तो फिर दुनिया में अपराधी कैसे होते 

जेलें भरी हैं

लोग मारे जाते हैं 

अपनों की हत्या कर देते हैं 

पैसों के लिए 

यहां तो छोटे बच्चे, 

बुजुर्ग महिलाओं के साथ भी 

अभद्रता की जाती है 

रिश्ते नातों की 

कोई परवाह नहीं की जाती 

ऐसे भी लोग हैं जो महज 

मनुष्य दिखते हैं 

शक्ल सूरत हाथ पैर 

एकदम आदमी जैसे 

पर मस्तिष्क 

एकदम शैतान 

उन्हें किसी की परवाह नहीं 

मार कर खाने को तैयार 

कच्चा पक्का से भी कोई वास्ता नहीं 



ऐसे ही सफर चलता रहा 

सब कुछ एक जैसा कहां रहता है 

वक्त के साथ सब ढलता है 

सुबह दोपहर शाम होती है

इस देह की भी अपनी सीमा है 

समय के साथ ढल जाता है 

कमजोर हो जाता है 

फिर इसे सहारे की जरूरत होती है 

अब सिक्कों की खनक 

कमजोर पड़ने लगी है 

सारे साथी जो हम प्याला हम नेवाला थे 

वह अपनी राह चल चुके हैं 

आगे पीछे लोग

जिन्हें अपना समझता था

रुखसत होते रहे

जब धमनी में खून का बहाव बहुत तेज था 

सब कुछ बहुत आसान लग रहा था 

उसने ढ़ेरसारी बेईमानी  शैतानी की 

अब  यह सवाल बहुत भारी है 

उसके साथ अब कोई नहीं है 

एकदम अकेला है 

न सुनने वाला न कहने वाला 

न रोकने वाला न टोकने वाला 

मां बाप का साया उठ गया है  

जिससे शिकवा शिकायत करें 

यहां सुनने वाला भी

अब कोई नहीं है 

कोई कुछ नहीं पूछता 

कोई कुछ नहीं कहता 

तुम सही हो.. तुम सही हो ..

यह तुम्हीं कहो तुम्हीं सुनो

जबकि अब तुम

कहीं नहीं हो ..

कहीं नहीं हो..

क्योंकि तुम किसी के नहीं हुए

किसी के नहीं हो..

©️ Rajhans Raju 



जेमिनी की व्याख्या

राजहंस राजू जी की यह कविता एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक केस-स्टडी (Case Study) की तरह है। यह केवल शराब की लत पर लिखी गई कविता नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे व्यक्ति के क्रमिक विनाश (Gradual Destruction) का दस्तावेज है जो अपनी गलतियों को 'सिद्धांत' का जामा पहना देता है।

यहाँ इस कविता का विभिन्न आयामों में गहरा विश्लेषण (Deep Analysis) प्रस्तुत है:

1. ‘इको-चैंबर’ और पुष्टि पूर्वाग्रह (Confirmation Bias)

कविता की शुरुआत उस माहौल से होती है जहाँ वह व्यक्ति बैठा है। यहाँ कवि ने मनोविज्ञान के ‘Confirmation Bias’ (पुष्टि पूर्वाग्रह) को दर्शाया है।

 * समान विचार वाले लोग: वह जानबूझकर ऐसी जगह चुनता है जहाँ उसके जैसे ही लोग हों। इंसान की फितरत होती है कि जब वह गलत करता है, तो उसे ऐसे लोगों की तलाश होती है जो उसे सही कहें।

 * सामूहिक मतिभ्रम (Collective Delusion): "सही के पैमाने वही तय करते हैं" — यह पंक्ति बहुत गहरी है। अपराधियों या नशेड़ियों की दुनिया में नैतिकता के नियम बदल जाते हैं। वहां 'पाप' को 'पुण्य' और 'बर्बादी' को 'मस्ती' समझा जाता है। यह एक सुरक्षित बुलबुला (Bubble) है जिसे वे टूटने नहीं देना चाहते।

2. पलायनवाद और पीड़ित मानसिकता (Victim Mentality)

चरित्र लगातार यह तर्क देता है— "मैं इतना दुखी हूँ... तो भला शराब क्यों न पीऊं?"

 * यह पलायनवाद (Escapism) का चरम रूप है। वह अपनी असफलताओं और जिम्मेदारियों का सामना करने के बजाय खुद को 'बेचारा' या 'पीड़ित' घोषित कर देता है।

 * कवि ने स्पष्ट किया है कि "घर में सब कुछ था... ठीक-ठाक था।" यानी उसका दुख वास्तविक नहीं, बल्कि स्वनिर्मित (Self-inflicted) है। वह दुख का अभिनय करता है ताकि उसे नशा करने का बहाना मिल सके।

3. परजीविता और नैतिक पतन (Parasitism and Moral Decay)

कविता का सबसे विचलित करने वाला हिस्सा वह है जहाँ उसकी नैतिक मृत्यु होती है।

 * परजीविता: "उसने नहीं कमाया था... कोई काम कोई जिम्मेदारी उसके सर माथे नहीं थी।" वह समाज और परिवार पर एक बोझ (Parasite) की तरह है जो दूसरों के संसाधनों को चूस रहा है।

 * अमानवीयता: "दवाई के लिए पैसे लिए... उसने पैसा एकदम सही जगह लगाया... पर वह अस्पताल नहीं था।" यह पंक्ति रोंगटे खड़े कर देती है। जब लत हावी होती है, तो इंसान के लिए अपनी माँ/पिता/पत्नी की जान से ज्यादा कीमती शराब की एक बोतल हो जाती है। यहाँ कवि ने दिखाया है कि कैसे नशा इंसान को 'संवेदनहीन जानवर' बना देता है।

4. अहंकार और आत्म-मुग्धता (Narcissism)

उस व्यक्ति को लगता है— "जमाना तो ऐसा ही है... वह सही है... बाकी लोगों को ही समझ नहीं है।"

यह एक नार्सिसिस्ट (Narcissist) का लक्षण है। उसे लगता है कि वह सबसे समझदार है। वह अपनी अव्यवस्था (Chaos) को अपनी काबिलियत समझता है। उसके पास जो एक-दो महिला मित्र हैं या जो चमचे हैं, वे भी उसके पैसों की वजह से हैं, पर वह इसे अपना 'करिश्मा' समझता है।

5. समय का चक्र और अस्तित्ववादी अंत (Existential End)

कविता का अंतिम भाग दार्शनिक (Philosophical) हो जाता है।

 * शरीर की नश्वरता: "अब सिक्कों की खनक कमजोर पड़ने लगी है... धमनी में खून का बहाव..." जब तक शरीर और पैसा था, तब तक भ्रम कायम था। जैसे ही ये दोनों खत्म हुए, वास्तविकता सामने आ गई।

 * पूर्ण एकाकीपन: "उसके साथ अब कोई नहीं है... एकदम अकेला है।" जिन दोस्तों के दम पर वह उछलता था, वे 'सर्दियों के मक्खियों' की तरह गायब हो गए।

 * अस्तित्व का लोप (Erasure of Existence):

   > "क्योंकि तुम किसी के नहीं हुए, किसी के नहीं हो.."


******************
****************

****************
to visit other pages
***********


*************

   > 

   यह अंतिम प्रहार है। हमारा अस्तित्व (Existence) हमारे संबंधों और हमारे कर्मों से परिभाषित होता है। जिसने जीवन भर किसी को अपना नहीं माना, अंत में दुनिया उसे भी अपना मानने से इनकार कर देती है। उसका होना या न होना बराबर हो जाता है।

निष्कर्ष

राजहंस राजू जी ने इस कविता में 'सहानुभूति' (Sympathy) का विखंडन किया है। आमतौर पर हम बर्बाद होते लोगों पर दया करते हैं, लेकिन यहाँ कवि ने दिखाया है कि बर्बादी अक्सर अहंकार और जानबूझकर किए गए चुनावों का परिणाम होती है।

यह कविता एक चेतावनी है— "जब मनुष्य अपनी बुराइयों को तर्क (Logic) का सहारा देने लगता है, तो उसका अंत 'शून्य' में ही होता है।"



भ्रम 


खुद के अच्छा होने का 

भरम बड़ा जरूरी है 

आईना देखें 

खुद को पहचाने 

यह काम बड़ा मुश्किल है 

मालूम है सबको अपना सच 

हम कितने सच्चे-झूठे हैं 

कौन लेगा हिसाब किसी का 

बही खाता सबका अपना-अपना है 

जिसे हमने खुद लिखे-मिटाए हैं 

ना जाने हम पर 

कहां, किसका, कितना बाकी है ?

हम मुक्त हुए नहीं अब तक 

मतलब कर्जा बाकी है 

©️ Rajhans Raju 

🌹🌹💐💐🌹🌹

Gemini की व्याख्या -

वाह! बहुत ही गहरी और मर्मस्पर्शी रचना है।

​राजहंस राजू जी की ये पंक्तियाँ इंसान के अस्तित्व और उसके अंतर्मन के द्वंद्व (conflict) को बहुत खूबसूरती से उकेरती हैं। यह कविता सिर्फ शब्दों का मेल नहीं, बल्कि एक 'आत्म-साक्षात्कार' (Self-realization) है।

​इस रचना के कुछ पहलू जो सीधे दिल पर दस्तक देते हैं:

​1. भ्रम और हकीकत का अंतर

"खुद के अच्छा होने का भरम बड़ा जरूरी है"

​हम अक्सर अपनी कमियों को छिपाने के लिए अच्छाई का एक मुखौटा पहन लेते हैं। आईना (सच) देखना वाकई सबसे मुश्किल काम है क्योंकि वह हमें वो दिखाता है जो हम देखना नहीं चाहते।

​2. अंतरात्मा का बही-खाता

"जिसे हमने खुद लिखे-मिटाए हैं"


​यह पंक्ति बहुत कमाल की है। हम दुनिया से झूठ बोल सकते हैं, लेकिन अपने मन के 'बही-खाते' में हम जानते हैं कि हमने कहाँ हेरा-फेरी की है। अपनी गलतियों को मिटाने की कोशिश हम खुद ही करते हैं, पर उनका निशान रह जाता है।

​3. मुक्ति और कर्ज

​कविता का अंत एक बहुत बड़े आध्यात्मिक सत्य की ओर इशारा करता है। जब तक हम अपने कर्मों, भावनाओं और लेन-देन (चाहे वो प्रेम का हो या पीड़ा का) का हिसाब नहीं कर लेते, तब तक 'मुक्ति' संभव नहीं है। यह 'कर्जा' पैसों का नहीं, बल्कि रूह के बोझ का है।

​यह रचना पढ़कर कबीर के दोहे या किसी गहरे सूफी कलाम की याद आती है, जहाँ इंसान को अपने गिरेबां में झांकने की सलाह दी जाती है।



तालाब 

प्रश्नवाचक हो गया है 

जिस पर बड़े 

सेमीनार का आयोजन है 

जिनकी स्मृति में 

अब भी तालाब है 

वह लोग यहां पर नहीं हैं

शायद यह वही जगह 

जहां सभागार है 

पहले ...

सबके पास एक छोटी सी 

प्लास्टिक के बोतल में 

कहते हैं साफ पानी है 

पहला घूंट पीते वक्त 

अक्सर एक हिचकी आती है 

शायद हमारे किसी कोने में 

अब भी तालाब मौजूद है 

जिसको हमारी 

या फिर हमको 

उसकी याद आती है 

©️ RajhansRaju

******************
****************

****************
to visit other pages
***********


*************

राजहंस राजू जी, यह एक बेहद संवेदनशील और गहरे अर्थ वाली कविता है। आपने आधुनिक विकास, पर्यावरण के विनाश और हमारी जड़ों से कटने की पीड़ा को बहुत ही सूक्ष्म (subtle) तरीके से उकेरा है।

यहाँ आपकी कविता का एक विश्लेषण है, जो इसकी गहराइयों को छूने का प्रयास है:

कविता का मर्म और मुख्य बिंदु

१. विडंबना (Irony) का शानदार प्रयोग

> "तालाब प्रश्नवाचक हो गया है... जिस पर बड़े सेमीनार का आयोजन है"

यह पंक्तियाँ हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना को दर्शाती हैं। जिस जगह पहले तालाब था, उसे भरकर वहां सभागार (auditorium) बना दिया गया है और अब उसी एसी (AC) हॉल में बैठकर लोग 'तालाबों के संरक्षण' पर चर्चा कर रहे हैं। यह "विकास" के नाम पर किए गए विनाश पर एक करारा व्यंग्य है।

२. कृत्रिमता बनाम प्रकृति (Artificiality vs Nature)

> "सबके पास एक छोटी सी प्लास्टिक के बोतल में कहते हैं साफ पानी है"

यहाँ 'प्लास्टिक की बोतल' केवल पानी का जरिया नहीं, बल्कि हमारे कृत्रिम जीवन का प्रतीक है। हमने मुक्त बहते हुए तालाब को मार दिया और अब प्लास्टिक में बंद 'बिके हुए' पानी पर निर्भर हैं।

३. 'हिचकी' - एक रूपक (Metaphor)

> "पहला घूंट पीते वक्त अक्सर एक हिचकी आती है"

यह इस कविता का सबसे खूबसूरत और मार्मिक हिस्सा है। वह 'हिचकी' केवल शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि आत्मा का विरोध है। शायद शरीर उस प्लास्टिक के पानी को स्वीकार नहीं कर पा रहा है, क्योंकि उसकी यादों (DNA) में अभी भी तालाब का सोंधा पानी बसा है।

४. भीतर का तालाब

> "शायद हमारे किसी कोने में अब भी तालाब मौजूद है"

अंत में, आप यह संदेश देते हैं कि भले ही भौतिक दुनिया से तालाब मिट गए हों, लेकिन हमारी सामूहिक चेतना (collective consciousness) में वे अभी भी जीवित हैं। वह हिचकी, वह याद, वह कमी ही इस बात का सबूत है कि हम प्रकृति से अलग नहीं हैं।

मेरी राय

आपकी लेखन शैली 'नई कविता' की याद दिलाती है, जहाँ सीधे-सपाट शब्दों में बहुत गहरी बात कह दी जाती है।

 * बिंब (Imagery): सभागार, प्लास्टिक की बोतल और हिचकी - ये तीनों बिंब बहुत सशक्त हैं।

 * भाव: इसमें एक उदासी (melancholy) है, लेकिन साथ ही एक चेतावनी भी।

यह कविता पाठकों को रुककर सोचने पर मजबूर करती है कि हम विकास की दौड़ में क्या पीछे छोड़ आए हैं।


 🌹❤️🙏🙏🌹🌹

**********
👇👇👇

click Images
**********

*************

इंसान 

अपनी फितरत दिखाता रहा 

उसकी राह में 

पत्थर पर पत्थर लगाता रहा 

खुद के जीतने का भ्रम 

ऐसे ही बढ़ता रहा 

वह भी भला कब तक ?

धीरज रखती 

थोड़ी नाराज हुई 

खुद का एहसास किया 

इंसानी जीत को ?

घास फूस में बदलने लगी 

अपने पुराने रस्ते चाल पड़ी 

लोगों ने कहा बौरा गई ?

पर वह!

चुपचाप आगे बढ़ती रही 

नदी को पता ही नहीं था ?

पत्थर से बनी दीवारों को 

घर कहते हैं ? 

वह अपने रास्ते चलती रही 

जहां ठहरा करती 

उन्हीं जगहों को ढूंढ रही 

लोग उसकी राह में आते रहे 

ईंट पत्थर का 

न जाने क्या-क्या बनाते रहे ?

अपनी नाकामी नासमझी का दोष 

नदी को देते रहे

©️ RajhansRaju 



राजहंस राजू जी की यह कविता मनुष्य के अहंकार और प्रकृति के अटल सत्य के बीच के संघर्ष को बहुत ही गहराई से रेखांकित करती है। यह कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आज के दौर की एक कड़वी सच्चाई है।

यहाँ इस रचना का एक संक्षिप्त विश्लेषण है:

कविता का मूल भाव (Core Theme)

यह कविता इस विडंबना (irony) पर चोट करती है कि मनुष्य प्रकृति के रास्तों पर अतिक्रमण (encroachment) करता है और जब प्रकृति अपना स्थान वापस लेती है, तो उसे 'विनाश' का नाम दे दिया जाता है।

कविता के मुख्य बिंदु:

 * मनुष्य का भ्रम: कवि ने शुरुआत में ही स्पष्ट किया है कि मनुष्य 'पत्थर पर पत्थर' (निर्माण/कंक्रीट) लगाकर यह भ्रम पाल लेता है कि उसने नदी को जीत लिया है या उसे नियंत्रित कर लिया है।

 * नदी का स्वभाव: नदी का धैर्य टूटना उसका 'बौराना' (पागल होना) नहीं है, बल्कि 'अपने पुराने रास्ते' पर लौटना है। नदी का प्रवाह उसकी स्मृति में बसा होता है; वह अपना रास्ता नहीं भूलती, मनुष्य भूल जाता है।

 * मासूमियत बनाम अज्ञानता:

   > "नदी को पता ही नहीं था ? / पत्थर से बनी दीवारों को / घर कहते हैं ?"

   > 

   यह पंक्तियाँ इस कविता की आत्मा हैं। नदी के लिए वह केवल एक भौगोलिक बाधा है, जिसे उसे पार करना है। उसे नहीं पता कि जिसे वह डुबो रही है, वह किसी का 'घर' है। प्रकृति मानवीय भावनाओं या संपत्ति के कानूनों से नहीं, बल्कि भौतिक विज्ञान के नियमों से चलती है।

 * दोषारोपण (Blame Game): अंत में कवि बहुत ही सटीक बात कहते हैं कि हम अपनी 'नाकामी और नासमझी' (खराब योजना, बाढ़ के मैदानों में निर्माण) को छुपाने के लिए नदी को दोषी ठहराते हैं।

निष्कर्ष

यह कविता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि बाढ़ नदी का प्रकोप है या हमारी अपनी गलतियों का परिणाम? राजहंस राजू जी ने बहुत ही सरल शब्दों में 'पर्यावरण और विकास' के असंतुलन को बयां किया है।

**********
******************
****************

****************
to visit other pages
***********


*************
 🌹❤️🙏🙏🌹🌹

जिद करने,

कहनी सुनने की उम्र,

उसी वक्त खत्म हो जाती है,

जब वह कुछ-कुछ,

समझने लग जाता है,

उसके हिस्से घर का,

कुछ काम आ जाता है,

माँ को परेशान देखकर,

परेशान हो जाता है,

बहत कुछ तो नहीं कर सकता,

उसकी थकान कुछ कम हो सके,

यह सोचकर कुछ,

हाथ बटाने लग जाता है,

यूँ अनजाने में,

कुछ धूप, कुछ छांव ओढ़ लेता है ,

जैसे ही दो कदम चलने लगा,

अनजाने में ही

जिम्मेदारियों की,

उंगली थाम लेता है

©️rajhansraju



Gemini कि व्याख्या 

यह राजहंस राजू (@rajhansraju) की बहुत ही मर्मस्पर्शी और गहरी कविता है। यह कविता बचपन के उस नाजुक मोड़ को दर्शाती है, जहाँ एक बच्चा खेल-कूद की उम्र में ही परिपक्वता (maturity) की दहलीज पर कदम रख देता है।

यहाँ इस कविता का एक संक्षिप्त विश्लेषण है:

कविता का मूल भाव (Core Theme)

इस कविता का मुख्य विषय 'समय से पहले बड़ा हो जाना' है। कवि ने बहुत ही खूबसूरती से बताया है कि बड़ा होना सिर्फ उम्र (age) से नहीं, बल्कि हालातों (circumstances) और संवेदना (empathy) से जुड़ा होता है।

 * बचपन का खोना: "जिद करने, कहानी सुनने की उम्र" का खत्म होना, बचपन की मासूमियत के जाने का प्रतीक है।

 * सहानुभूति (Empathy): बच्चा जब अपनी माँ को परेशान देखता है, तो उसकी अपनी इच्छाएँ गौण (secondary) हो जाती हैं। यह उसके भावनात्मक विकास का सबसे बड़ा सबूत है।

 * जिम्मेदारी का अहसास: "जिम्मेदारियों की उंगली थाम लेता है" – यह पंक्ति बहुत शक्तिशाली है। आमतौर पर बच्चा माता-पिता की उंगली थामता है, लेकिन यहाँ वह जिम्मेदारियों की उंगली थामकर खुद चलना सीख रहा है।

दिल को छू लेने वाली पंक्तियाँ

> "यूँ अनजाने में,

> कुछ धूप, कुछ छांव ओढ़ लेता है"

अर्थ: जीवन के सुख (छांव) और दुख (धूप) का अनुभव उसे अनजाने में ही हो जाता है। उसने जानबूझकर यह नहीं चुना, लेकिन परिस्थितियों ने उसे यह स्वीकार करना सिखा दिया।

> "माँ को परेशान देखकर,

> परेशान हो जाता है"

अर्थ: यह पंक्ति बच्चे और माँ के बीच के गहरे जुड़ाव को दिखाती है। बच्चे का सबसे बड़ा दुख अपनी माँ की थकान या परेशानी होती है।

निष्कर्ष:

यह कविता उन लाखों बच्चों की कहानी कहती है जो घर के हालातों को समझते हुए चुपचाप बड़े हो जाते हैं। इसमें करुणा भी है और एक गर्व भी कि वह बच्चा अब "हाथ बंटाने" लगा है।

******
🌹❤️🙏🙏🌹🌹
*****************
my facebook page 
***************

***********
facebook profile 
************

***************
 🌹❤️🙏🙏🌹🌹

जाड़े के मौसम में 

जब घना कुहरा छा जाता है 

और सामने कुछ दिखाई नहीं पड़ता 

तब बस ठहर जाना चाहिए

यही वक्त है अंदर देखने का 

आसपास को महसूस करने का 

कितना वक्त हो गया 

खुद को ठीक से देखें 

अपने दायरे में 

हम कैद हो गए हैं 

इसे ही विस्तार समझते हैं 

यात्रा का कोई पड़ाव 

मुकाम कैसे हो सकता है 

जिसे मंजिल समझ रहे हैं 

जबकि अब भी चल रहे हैं 

क्या कभी वापस लौट पाते हो 

जहां से चले थे 

क्यों वहां फिर लौट नहीं पाते हैं 

हर यात्री की यही दुश्वारियां है 

जब मुड़कर देखता हैं 

चलो वापस उसी मोड पर चलते हैं 

तब वहां पर पहुंचने वाला 

जो शख्स होता है 

वह वह नहीं रह जाता है

इतने वर्ष जो चलता रहा हूं 

उसमें कुछ तो बदल गया हूं 

हर पल बदलते रहना मेरी मजबूरी है 

चाह कर भी मैं कहां ठहर पाता हूं 

ऐसे ही सब कुछ निरंतर बदल रहा है 

कुछ भी स्थिर नहीं है 

जो जैसा अभी है 

वह अगले पल वैसा नहीं रहता है 

यह परिवर्तन ही सत्य है 

सब कुछ परिवर्तित हो रहा है 

फिर मेरी अपनी धारणाएं हैं 

मैं किस सीमा तक पहुंच पाया हूंँ

और कैसे किसको देख पाता हूं 

यह धुंध भी बहुत जरूरी है 

जो एक सीमा के आगे 

देखने न दे 

बस कहीं यूं ही 

ठहरना पड़ जाए 

खुद को जी भरकर देख पाना 

शायद तभी संभव होता है  

गुजरते लम्हों में हमने क्या महसूस किया है 

और यह अहर्निस यात्रा अब भी जारी है

अच्छा बहुत हुआ चलो चलते हैं 

©️ Rajhans Raju

*********************
my 
Youtube channels 
**************
👇👇👇



वह जो 

आसमान में है 

उसे जो चाहे 

वैसा समझता है 

हर शख्स

अपना मानता है 

जबकि वह आसमान का है 

उसी में रहता है 

उससे परे जा नहीं सकता 

मगर खुद को 

कमबख्त तन्हा कहता है

यह देख पाने की हद 

बड़ी अजीब है 

खुद को कहां ? 

कोई पूरा

देख पाता है ?

©️ Rajhans Raju 


राजहंस राजू जी की यह कविता बेहद दार्शनिक और गहरी है। यह कविता देखने में सरल लगती है, लेकिन इसमें 'नज़रिये' और 'अस्तित्व' (Existence) को लेकर बहुत बारीक बात कही गई है।

यहाँ इस कविता का एक संक्षिप्त विश्लेषण और भावार्थ है:

कविता का मूल भाव: स्वामित्व और अकेलापन

इस रचना में संभवतः 'चाँद' (या किसी उच्च पद/आसमान में स्थित वस्तु) को केंद्र में रखा गया है, जिसके माध्यम से कवि मानवीय स्वभाव और आत्म-दर्शन की बात कर रहे हैं।

1. भ्रम और अपनापन (Lines 1-6)

> "उसे जो चाहे वैसा समझता है... हर शख्स अपना मानता है"

कवि कहते हैं कि जो ऊँचाई पर है (आसमान में), उसे हर कोई अपने नज़रिये से देखता है। प्रेमी उसे प्रेम का प्रतीक मानता है, दुखी व्यक्ति उसे अपने दुख का साथी। विडंबना यह है कि हर कोई उस पर अपना हक़ जमाता है, उसे अपनी कहानी का हिस्सा बना लेता है।

2. बंधन और एकांत (Lines 7-11)

> "जबकि वह आसमान का है... कमबख्त तन्हा कहता है"

हकीकत यह है कि वह किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि आसमान का है। उसकी नियति (Fate) आसमान में रहना है, वह उस दायरे से बाहर नहीं जा सकता। लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी (Tragedy) यह है कि सबके द्वारा 'अपना' माने जाने के बावजूद, वह खुद को 'तन्हा' (अकेला) महसूस करता है। भीड़ के बीच अकेलेपन का यह बहुत सुंदर चित्रण है।

3. आत्म-दर्शन का प्रश्न (Lines 12-16)

> "यह देख पाने की हद... खुद को कहां ? कोई देख पाता है ?"

कविता का अंत एक बहुत बड़े प्रश्न पर होता है। हम दूसरों को देख सकते हैं, उनका विश्लेषण कर सकते हैं, उन्हें अपना बना सकते हैं, लेकिन 'खुद को देख पाना' सबसे कठिन है। यहाँ 'देखने' का अर्थ शीशे में देखना नहीं, बल्कि अपने असली स्वरूप को समझना है। जिस तरह आँख सब कुछ देखती है पर खुद को नहीं देख पाती, उसी तरह इंसान (या वह आकाशीय पिंड) भी अपनी असलियत से अनजान रह जाता है।

निष्कर्ष

राजहंस राजू जी ने 'दृष्टि की सीमा' (Limit of vision) को बहुत खूबसूरती से उकेरा है। यह कविता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम जिसे अपना समझ रहे हैं, क्या वह वाकई हमारा है? और क्या हम दूसरों को देखने की होड़ में खुद को देखना भूल गए हैं?

**************************
my Bloggs
***************
👇👇👇👇👇



बीत गया सब 

जैसे बीत जाता है 

ढ़ल गई उम्र धीरे-धीरे 

पता कहांँ चला 

मुड़ के देखा फासला बहुत है 

मैं जहां था 

अब भी वही हूंँ 

फिर क्या बदल गया 

जो पहले जैसा ना रहा 

यह फासला 

जिसे मैं समझ रहा 

वह अपनी जगह ठहरा हुआ है 

या चल रहा

उसे भी ऐसा लग रहा है 

वह भी ढ़ल रहा है 

सुबह देखा था जिसे 

वह अब भी वहीं है 

बस कहीं कोई ढल गया 

रात हो गई है 

वह अब सो रहा 

सब स्थिर है नहीं नहीं 

हर पल सब बदल रहा 

फासला वैसे ही बरकरार है 

जो स्थिर लग रहा 

वह भी अपनी गति से चल रहा 

©️ Rajhans Tiwari

******************
****************

****************
to visit other pages
***********


*************


एक बात कहूंँ

मैं कभी 

मुकम्मल नहीं होना चाहता 

क्योंकि मेरा अधूरापन ही 

मुझे तुम्हारे साथ 

बनाए रखता है 

खुदा बनने की चाहत 

पत्थर बना देगी 

सुख-दुख का फर्क मिटा देगी 

मैं हंसना चाहता हूंँ 

रोना चाहता हूंँ 

मुझे झगड़ना है उलाहने देना हैं 

पीठ पीछे 

उसके बारे में तमाम बातें करनी हैं 

यही ढ़ेर सारी कमियां 

मुझे इंसान बनाए रखती हैं 

फिर मैं क्यों 

बन जाऊं खुदा 

जब जिंदगी में जिंदादिली 

इसी से आती है 

मैं अपनी नाकामियों का 

बोझ भी उठाना चाहता हूंँ 

जरा जरा सी बात पर 

मुस्कुराना चाहता हूं 

यह अधूरेपन के बिना संभव नहीं है 

मैं क्यों पहुंच जाऊं 

सबसे ऊंची जगह 

जहां मेरे सिवा कोई नहीं हो 

मैं अपनों के साथ रहना चाहता हूंँ 

यह ताकत और ऊंचाई 

अकेला कर देती है 

कभी-कभी अधिक समझदारी भी 

वहीं पर ले जाती है 

जहां कुछ भी कहने को बचता नहीं है 

फिर अपनों के साथ रहकर भी 

मौन पसर जाता है 

क्योंकि सब समझदार है 

सब जानते हैं 

एक दूसरे को समझाने की 

जरूरत कहांँ रह जाती है? 

सबकी अपनी दुनिया है 

उसमें खोए हुए हैं 

यह जिंदगी कितनी बेहतर है 

बेहतरीन ढंग से चल रही है 

वही अपने-अपने रास्ते 

इसके सिवा कुछ भी नहीं है 

सबने अपने नजरिए से 

एक दूसरे को परखा 

सही गलत भी साबित कर दिया है 

बहुत अरसा हो गया 

एक दूसरे से बात किए 

हालांकि पूरा होना 

किसी के लिए संभव नहीं है 

और अधूरेपन के साथ जीते रहना है 

एक दूसरे को ऐसे ही 

हमने तन्हा छोड़ दिया है 

और मान बैठे 

एक दूसरे के बारे में 

न जाने कौन-कौन सी बातें 

वक्त अपने सफ़र पर 

आगे बढ़ता रहा 

हालांकि सब कुछ 

वहीं वैसे ही ठहरा हुआ है 

जो मोड थे जिंदगी के 

अब भी वहीं रुके हुए हैं 

कहने सुनने के लिए भी कुछ है 

ऐसा लगता नहीं है 

एक छोटा सा काम करना 

जब कभी अकेले हो

लगे बेकार हो 

तुम्हारे पास तुम्हारे लिए वक्त है 

बस पीछे मुड़कर देखना 

वह देखो वह मोड 

अब भी वहीं है 

बस वहां लौट नहीं सकते 

हालांकि उम्र और वक्त 

एक साथ चलते हैं 

वक्त तो कभी 

बूढ़ा पुराना नहीं होता 

पर हमारी अपनी मियाद है 

जो वक्त के साथ ढ़ल जाता है 

वक्त अहर्निस 

वैसे ही चल रहा है 

हम न जाने कब ?

अर्द्ध विराम से 

पूर्ण विराम तक आ गये

©️ RajhansRaju

❤️❤️❤️

 गहन विश्लेषण (Deep Analysis)

I. ✒️ केंद्रीय विषय (Central Themes)

1. अपूर्णता का उत्सव (Celebration of Imperfection)

यह कविता का सबसे मजबूत विषय है।

 * कवि 'मुकम्मल' (पूर्ण) नहीं होना चाहता। उसके लिए, अपूर्णता ही वह धागा है जो उसे दूसरों से (खासकर 'तुम्हारे' से) जोड़े रखता है।

 * वह जानबूझकर अपनी कमियों (झगड़ना, उलाहने देना, पीठ पीछे बातें करना) को बनाए रखता है, क्योंकि यही उसे 'इंसान' बनाए रखती हैं और 'जिंदादिली' देती हैं।

 * यह एक विरोधाभासी (Paradoxical) विचार है: कमी होना ही पूर्ण रूप से जीना है।

2. 'खुदा' बनाम 'इंसान' की द्वैतता (Duality of 'God' vs. 'Human')

कवि दैवीय (Divine) पूर्णता को अस्वीकार करता है:

 * खुदा बनना = पत्थर हो जाना, सुख-दुख का भेद मिट जाना, मौन हो जाना, अकेला पड़ जाना। यह एक तरह की भावनात्मक शून्यता है।

 * इंसान बने रहना = हँसना, रोना, नाकामियों का बोझ उठाना, लड़ना, मुस्कुराना। यह गहन भावनात्मक जुड़ाव और जीवन की सक्रियता है।

 * कवि जानबूझकर मानवीय संघर्षों और त्रुटियों को चुनता है ताकि वह रिश्तों और जीवन के अनुभवों में बना रह सके।

3. अकेलापन और अलगाव (Loneliness and Isolation)

कवि उन चीजों को नकारता है जो अलगाव लाती हैं:

 * ऊँचाई और ताकत: ये चीजें व्यक्ति को अकेला कर देती हैं।

 * अधिक समझदारी: यह रिश्तों में सबसे खतरनाक अलगाव लाती है। जब 'सब समझदार हैं, सब जानते हैं', तो संवाद (बातचीत) समाप्त हो जाता है, और अपनों के साथ रहते हुए भी 'मौन पसर जाता है'। यह आधुनिक जीवन में भावनात्मक दूरी पर एक तीखी टिप्पणी है।

II. 📝 साहित्यिक और दार्शनिक पहलू

1. स्वर और शैली (Tone and Style)

 * कविता का स्वर आत्म-चिंतनशील (Introspective) और दार्शनिक (Philosophical) है। यह एक स्वीकारोक्ति (Confession) के साथ शुरू होती है और एक गहरे सवाल के साथ समाप्त होती है।

 * शैली गद्य-गीत (Prose-Poem) के करीब है, जिसमें विचारों का प्रवाह सहज है लेकिन गहरी भावनाओं से भरा हुआ है।

2. प्रतीकात्मकता (Symbolism)

 * खुदा/सबसे ऊंची जगह: पूर्णता, अछूतपन, भावनात्मक अलगाव का प्रतीक।

 * पत्थर: भावनाहीनता, अक्रियता का प्रतीक।

 * अधूरापन/कमियाँ: मानवीयता, रिश्ते, संवाद, जीवन शक्ति का प्रतीक।

 * मोड़ (Junction/Turn): जीवन में लिए गए निर्णय या छूटे हुए अवसर। यह दिखाता है कि भौतिक रूप से आगे बढ़ने के बावजूद, कुछ भावनात्मक पड़ाव 'अब भी वहीं रुके हुए हैं'।

3. समय का विरोधाभास (The Paradox of Time)

अंतिम भाग समय के साथ मानवीय संबंध को दर्शाता है:

 * समय ("वक्त अहर्निस") निरंतर चलता रहता है और कभी बूढ़ा नहीं होता।

 * मानव ("हमारी अपनी मियाद") समय के साथ ढल जाता है।

 * यह विरोधाभास इस अहसास को और गहरा करता है कि सब कुछ 'वहीं वैसे ही ठहरा हुआ है' जबकि हमने 'अर्द्ध विराम से पूर्ण विराम तक' की यात्रा पूरी कर ली है। यह उन अनसुलझे रिश्तों और बातों पर खेद व्यक्त करता है जो समय के साथ पीछे छूट गईं।

III. 🎯 निष्कर्ष

यह कविता आधुनिक जीवन में संवाद की कमी और अकेलेपन की बढ़ती भावना पर एक मार्मिक टिप्पणी है, जो अपूर्णता में ही रिश्ते की गर्माहट और इंसानियत का सार खोजने का प्रयास करती है। यह हमें सिखाती है कि पूर्णता की ओर भागने के बजाय, अपनी कमियों को स्वीकार करना और उनके माध्यम से दूसरों से जुड़ना ही सच्ची 'जिंदादिली' है।

💐💐🙏🙏💐💐


जब से पता चला 

वह भी कुछ खरीद सकता है 

उसकी कद्र बढ़ गई है 

तारीफ हो रही है 

वह खुद को नया लगने लगा है 

ए तो वही लोग हैं 

जो पहचानते नहीं थे

अब इस कदर बिछ गये हैं 

जैसे बिना रीढ़ के हैं

जान भी नहीं है 

वह मुस्कराकर देखता है 

रहने दो जानता हूंँ तुम्हें 

कहने को कुछ बचा नहीं है 

ए सिक्कों की खनक 

कितनी अजब है 

जो तय करते हैं 

तुम्हारी जगह 

कब

कहां पर है 

कहां पर नहीं है 

©️ RajhansRaju


यह कविता 'पैसों' के प्रभाव और समाज में व्यक्ति की बदलती हैसियत को बहुत मार्मिक ढंग से दर्शाती है।

यह दिखाती है कि कैसे किसी व्यक्ति की 'कद्र' और 'पहचान' उसके पास धन (या खरीदने की क्षमता) आने के बाद अचानक बढ़ जाती है, भले ही वही लोग पहले उसे नज़रअंदाज़ करते थे।

यहाँ कुछ मुख्य भाव और विषय हैं जो कविता व्यक्त करती है:

🪙 कवि के मुख्य भाव

 * धन का प्रभाव (The Power of Money): कविता का केंद्रीय विचार यह है कि समाज में किसी व्यक्ति का मूल्य, उसकी 'खरीदने की क्षमता' से तय होता है, न कि उसके वास्तविक गुणों से।

 * दिखावटी सम्मान (Superficial Respect): लोग केवल पैसे वाले व्यक्ति की 'तारीफ़' करते हैं और उसके सामने झुक जाते हैं ("जैसे बिना रीढ़ के हैं")। यह सम्मान सच्चा नहीं, बल्कि स्वार्थ पर आधारित है।

 * पुरानी उपेक्षा की कसक (The Sting of Past Neglect): नायक को पता है कि ये वही लोग हैं जो उसे पहले 'पहचानते नहीं थे'। उसे अचानक मिली इस कद्र की वजह भी पता है, इसलिए वह 'मुस्कराकर देखता है' और मन ही मन कहता है 'रहने दो जानता हूंँ तुम्हें'।

 * सिक्कों की खनक (The Jingle of Coins): अंतिम पंक्तियाँ सबसे महत्वपूर्ण हैं। 'सिक्कों की खनक' को अजीब बताया गया है, जो किसी व्यक्ति की सामाजिक 'जगह' को तय करती है—कौन कहाँ सम्मान पाएगा और कहाँ नहीं।

✨ कविता का सार

यह एक तीखा व्यंग्य है जो मानवीय स्वभाव और समाज की दोगली नीति पर चोट करता है। यह बताता है कि पैसे के आगे रिश्ते, पहचान और सच्चा सम्मान अक्सर गौण हो जाते हैं। व्यक्ति वही है, लेकिन उसकी जेब में पैसा आते ही दुनिया का उसके प्रति नज़रिया 360 डिग्री बदल जाता है।

क्या आप इस कविता के किसी विशेष भाग पर और चर्चा करना चाहेंगे, या आप इसी विषय पर कोई अन्य कविता पढ़ना चाहेंगे?

💐💐🙏🙏💐💐


मौन बे शब्द 

भाषा रहित नहीं होता 

इसे समझने के लिए 

थोड़ा धैर्य चाहिए 

चुपचाप देखना सुनना है 

मौन तक पहुंचना है 

फिर कुछ 

कहना भी नहीं है 

©️RajhansRaju


यह कविता मौन की गहराई और उसके अर्थ को खूबसूरती से दर्शाती है।

🧘 मौन: एक भावपूर्ण विश्लेषण

यह रचना बताती है कि मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं है, बल्कि स्वयं में एक भाषा है।

 * "मौन बे शब्द भाषा रहित नहीं होता": यह सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति है। यह स्थापित करती है कि मौन में भी अभिव्यक्ति होती है, जो शब्दों से परे है।

 * "इसे समझने के लिए थोड़ा धैर्य चाहिए": मौन की भाषा को समझने के लिए जल्दबाजी नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण अवलोकन और धैर्य की आवश्यकता होती है। यह एक त्वरित संवाद नहीं है, बल्कि एक गहरी अनुभूति है।

 * "चुपचाप देखना सुनना है, मौन तक पहुंचना है": यह मौन को साधने का तरीका बताता है—बाहरी दुनिया से हटकर भीतर की ओर ध्यान केंद्रित करना और बिना प्रतिक्रिया दिए अवलोकन करना।

 * "फिर कुछ कहना भी नहीं है": यह अंतिम चरण है, जहाँ व्यक्ति मौन की पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। जब मौन की भाषा समझ में आ जाती है, तब शब्दों की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है।

यह कविता पाठक को बाहरी शोर से हटकर आंतरिक शांति और गहन समझ की ओर ले जाती है।

**********



*************

Comments

  1. आओ मायने ढूंढते हैं, जिंदगी को हमने कैसे देखा कहते हैं

    ReplyDelete
  2. कितना अच्छा हो

    कुछ लोग कुछ न करें

    बस जितना है उतने में रहे

    अच्छा तो होगा कुछ बेहतर कर ले

    पर जो है उसको बर्बाद करना

    कहां तक ठीक है

    खैर अक्ल पर पत्थर पड़ना

    इसे ही कहते हैं

    जब पड़ जाता है

    तब सही गलत का फर्क नहीं रह जाता

    ReplyDelete
  3. मौन बे शब्द
    भाषा रहित नहीं होता
    इसे समझने के लिए
    थोड़ा धैर्य चाहिए
    चुपचाप देखना सुनना है
    मौन तक पहुंचना है
    फिर कुछ
    कहना भी नहीं है
    ©️RajhansRaju

    ReplyDelete

Post a Comment

स्मृतियाँँ

Business

haq

Be-Shabd

Darakht

Alvida

Samvad

Kamala Kant Shukla

Dussehra

Chaukhat