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आम का पेड़

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आते जाते कुछ लोगों ने, उसे पत्थर मारे, फिर थककर, उसी के पास बैठ गए, इस साल मौसम अच्छा नहीं था, वैसे भी आम का पेड़ है न, हर साल उतने फल नहीं लगते, अब बच्चों को कौन समझाए? मीठास लाने और पाने में, बहुत वक्त लगता है, फिर उम्र का तकाज़ा भी है अब उतने बौर नहीं आते, और बोझ उठाया भी नहीं जाता, पर उस बूढ़े दरख्त ने,  अपनी आदत नहीं छोड़ी, छांव लिए वैसे ही खड़ा है, जो हर मुसाफिर का, कुछ देर के लिए पड़ाव बनता है, उसके जर्जर शरीर में, अब बहुत कम, फिर भी, मीठे आम, लगते हैं।

इन छुट्टियों में

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इस बार की छुट्टियों में, एक छोटा सा पुल बनाते हैं, थोड़ा सा गाँव,  इस तरफ ले आते हैं, वैसे भी यहाँ फुर्सत किसे है? शहर को बहुत जल्दी है, वो तो पूरा, गाँव निगल जाता है-