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ज़मीन

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मेरे पास ही में ज़मीन का एक टुकड़ा था,  बेवज़ह बैठने,  बच्चों  के खेलने की जगह थी।  कुछ सालों से ज़मीन की कीमतें, 
तेज़ी से बढ़ने लगी,  वह तमाम शातिर लोगों की नज़र में गड़ने लगी,  पता चला उसमे कुछ जाति और धर्म के विशेषज्ञ थे,  उनके पास हथियार और झंडा था,  पता नहीं किससे? किसकी?  सुरक्षा की बात होने लगी,  घंटो बैठकें हुई,   बच्चों को भी उनके झंडे और हथियार,  नए खिलौने जैसे लगे,  चलो..अब इनसे खेलते हैं,  इस खेल-खेल में  न जाने?  कब वो खुद से बहुत दूर हो गए,   घर की फ़िक्र छोड़,  झंडा लेकर चलने लगे,  कुछ बच्चों की लाशें, घर आयी,  कुछ पहचानी  गयी, ज्यादातर का अब तक,  पता नहीं चला, उस मैदान में खेलने गए,  बच्चों का घर में, अब भी,