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Showing posts from 2014

दिवाली

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न जाने कितने बरस बीत गए,
वह अपनी जद्दो-जहद में उलझा रहा,
खाने-कमाने का,  न खत्म होने वाला सिलसिला,
कुछ,
फिर और पाने कि इच्छा,
यूँ ही वक्त का बीतते जाना,
और कुछ भी न समेट पाना,
थककर कहीं गुम हो जाना,
अनायास ही,
अतीत की पगड़ंड़ी की तरफ,
लौट जाने की,
नाकाम कोशिश,
न जाने कब खत्म हो यह वनवास?
वह तो चौदह वर्ष में ही लौट आए थे,
पर! क्यों नहीं खत्म होता,
ईंट-पत्थरों में फंसे,
अनगिनत लोगों की यात्रा,
शायद! आज़ की रात,
कोई दिया जलता होगा,
घर से दूर गए,  उन मुसाफिरों के लिए,
जिन्हें लौट के आना था,
अपने घर,
जो न जाने कहाँ खो गए,
खुद की तलाश में।
शायद! याद आ जाए,
यह सोच कर,
एक दिया कहीं भी,
यूँ ही रख दें,
जो किसी के,
घर लौटने का....

परदा

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कोई परदा? कब तक बनेगा चेहरा? जब रोशनी दूर हो आँखो से, क्या करेगा परदा। फिर तन्हा, मकानों मे, खुद को पाता है, ड़र-ड़र के,  न जाने किससे, चेहरा छुपाता है। आइने के सामने, परदा लेकर जाता है, कुछ नज़र आए, इससे पहले, आइना ढ़क देता है..

ज़मीन

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मेरे पास ही में ज़मीन का एक टुकड़ा था,  बेवज़ह बैठने,  बच्चों  के खेलने की जगह थी।  कुछ सालों से ज़मीन की कीमतें, 
तेज़ी से बढ़ने लगी,  वह तमाम शातिर लोगों की नज़र में गड़ने लगी,  पता चला उसमे कुछ जाति और धर्म के विशेषज्ञ थे,  उनके पास हथियार और झंडा था,  पता नहीं किससे? किसकी?  सुरक्षा की बात होने लगी,  घंटो बैठकें हुई,   बच्चों को भी उनके झंडे और हथियार,  नए खिलौने जैसे लगे,  चलो..अब इनसे खेलते हैं,  इस खेल-खेल में  न जाने?  कब वो खुद से बहुत दूर हो गए,   घर की फ़िक्र छोड़,  झंडा लेकर चलने लगे,  कुछ बच्चों की लाशें, घर आयी,  कुछ पहचानी  गयी, ज्यादातर का अब तक,  पता नहीं चला, उस मैदान में खेलने गए,  बच्चों का घर में, अब भी,

आधा-अधूरा

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आधा छूटता नहीं,  पूरा होता नहीं,  कम्बख्त,  वह भी पौना छोड़े जाता है।  अजीब तरह से सब होता है,  आधा-अधूरे को ही,  पूरा समझा जाता है, ऐसे ही हरदम,  कुछ बचा रह जाता है। चलते-चलते, तमाम रस्ते गुज़र जाते हैं,  पर! यह दूरी क्यों ? उतनी ही रह जाती है ? फिर अधूरा ही रह जाता,  एक बनने की कोशिश में...

आहट

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आवाज़ आहट की उसके, कुछ इस तरह आती है,
हवा चुप-चाप छूकर गुज़र जाती है। उसके होने की तमाम निशानियाँ,
बिखर जाती हैं, वह ख़ामोशी से
जब कहीं से गुज़र जाती है, उसकी खुशबू अब तक यहाँ कायम है, तितलियाँ आकर यही बताती हैं, चिड़ियों ने चहचहाकर जो गीत गाया है, उसकी धुन से यह राग आया है, बंद आँखों से जो दुनिया दिखाई देती है, उसकी चाहत है,
हर तरफ,
एक आहट सुनाई देती है।

Holi-color of life

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नए रंग कि तलाश करता रहा,
न जाने कहाँ भटकता रहा।
जिंदगी ने तो हर जगह,
खुशियों कि थैली रखी थी,
मै कुछ और ढूँढता रहा,
सब कुछ धुँधला, नज़र आने लगा।
फिर रंगों ने तरकीब निकली,
हर थैली, हर चेहरा एक जैसा कर दिया,
मुस्कान आ गयी, हाथ लग गयी,
खुशियां बेवजह आज, भर गयी।
जेब तो खाली थी कब से,
मेरे हँसते ही कुछ भर गयी।
ख़त्म हुआ नहीं कुछ भी,
पर !
इन रंगों से कुछ बात बन गयी।

वह नहीं रुका

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कब से राह तकता रहा, 
इसी तरफ से गया था,  दरवाजे पर ठहरा उसे,  जाते हुए देखता रहा, शायद ! वह पलट कर देखे,  या फिर लौट आए,  इसी ख्वाइश में, उसे देखता रहा।  वह नहीं मुड़ा,  तेज़ कदमों से दूर जाता रहा,  उसे मालूम था,  मैं उसकी उम्मीद में,  दरवाज़े पर रुका हूँ, शायद!  यही सोचकर उसने मुड़कर नहीं देखा,  या फिर,   अपना दुखी चेहरा, मुझसे छुपाता रहा,  वह नहीं मुड़ा। मै उसके जाने के बाद,  काफी देर तक,   वहीँ ठहरा रहा,  दरवाज़ा अब भी खुला है, कैसे बंद कर दूँ ? अभी-अभी तो गया है,                पता नहीं कब.....