बे शब्द

बहुत देर तक बोलता रहा, सुनता रहा,
शब्दों के सहारे, 
न जाने, कितने अर्थ गढ़ता रहा,
इनकी कारीगरी, 
बडी‌ बारीकी से, सब कहती रही,
इस कहने सुनने का शोर होने लगा,
अब सुनने को कोई तैयार नहीं था,
हर जगह, 
कहने का सिलसिला चलता रहा,
ऐसे में शब्द बिना अर्थ लगने लगे,
पर बिना अर्थ के शब्द?
या फिर शब्दों के बिना ही?
हाँ! जब वह खामोशी,
हमारे बीच आयी थी,
उस वक़्त.......
शायद! 
हमने एक दूसरे का,
अर्थ,
समझा था.

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