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Showing posts from August, 2017

अग्नि-परीक्षा

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ए भी तो सच है,  बनवास तो राम को हुआ,
पर! बेघर हमेशा सीता हुई,
चाहे वह राधा बनी,
या फिर मीरा हुई,
आग में गुजरना पड़ा,
विष का प्याला उसने पिया,
आँच राम को न लग जाए कहीं,
ए समझकर,
हर काल में जलती रही,
सदा मर्यादा पुरुषोत्तम रहें वो,
सब तजके भी,
हर दम,
राम-राम कहती रही। पर क्या मिला इसका सिला?
अब तो यही लगता है,
उस वक्त बात मानकर,
तुमने अच्छा नहीं किया,
काश!
अग्नि परीक्षा से इंकार कर देती,
या फिर दोनों भाइयों से कहती,
आओ इस आग से तीनों गुजरते हैं,
देखते हैं फिर भला?
कितने कुंदन निकलते हैं,
सवाल जब राम पर नहीं उठा,
फिर सीता पर क्यों उठे?
जो लांक्षन किसी स्त्री पर लगे,
उसीसे भला?
कोई पुरुष क्यों बचे? जब!
वो भी तो हाड मांस का है,
और देह धारण करता हो,
फिर जिस्मानी दोष से,
कैसे बच सकता है? अच्छा होता कि कह देते,
तुम इंसान नहीं हो,
और सीता भी कोई आम औरत नहीं है,
पर तुमको तो मर्यादा पुरुषोत्तम बनना था,
जिसके लिए सब कुछ,
सीता को सहना था।
वो चुप रहकर  सहने वाली सीता,
सबको भाती है,
घरों में आज भी सबके,
तुम्हारे साथ पूजी जाती है।
अब भी वही आदर्श मानते हैं,
अपनी आवाज में बोलने वाली औरत,
क…

निकम्मा😀😀

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यूँ खुश होकर,  तालियाँ मत बजाओ,
यहाँ सवाल खुद को, 
पाने और खोने का है,
दर्द ए है कि खुद के मरने का, 
मातम भला कैसे मनाए?
जबकि अब भी,
गरदन बहुत कसके दबी है,
मुँह टेढ़ा हो गया है,
और जीभ ऐंठ गयी है,
सिर्फ एक ही कमी है
मरने वाली feeling नहीं दिखती,
कमबख्त शक्ल ही ऐसी है,
लगता है हँस रहा,
वैसे ही जैसे बिना चेहरे वाले,
कंकाल होते हैं,
जो चेहरों पर हंसते है,
वो न तो अपना,
न तो दूसरों का चेहरा देखते हैं,
अब उन्हें ए मालूम है,
असल में जो है,
उसमें आँख नहीं है,
और चेहरों में कोई फर्क नहीं है,
अब वह चेहरे के साथ भी हंसता है
हश्र चेहरे का,
उसने, जबसे जाना,
उसके चेहरे पर,  अनायास हंसी रहने लगी,
उसके यूँ हँसते रहने पर,
उस पर बेहया होने का इलजाम,
लगता है,
कैसा निकम्मा है,
देखो,
अब भी,
कैसे हँस रहा है। 😁😁😁😁😁
rajhansraju

धागों का इंद्रधनुष

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धागों का, टूटना और छूटना,
कभी चटक जाना
कभी छटक जाना
फिर उन्हें समेट लेना
पूरा धागा बना लेना
उसका एक सिरा,
कभी कसके पकड़ लेना, किसी गाँठ का पड़ जाना, किसी वजह से कुछ उलझ जाना, ऐसे में एक दूसरे को, थोड़ा वक्त देना,
बस! किसी उंगली से थाम लेना,
ए उम्मीद की डोर,
जो अब भी बंधी है,
उसके किसी उंगली में,  हो सकता है, सिर्फ फॅसी हो,  जबकि दूसरा सिरा,
अब भी मेरी तरफ है,
तो इसकी वजह यही है,
ए डोर अब भी कायम है।
वैसे भी जो कच्ची मिट्टी,
कच्चे धागे से बना हैं,
उनके कुछ भी बनने का सिलसिला,
कभी खत्म नहीं होता,
उसे तो सिर्फ वो कुम्हार, 
वो जुलाहा चाहिए, 
जो उसे गढ़ दे,
और रंगो से ऐसे रंग दे, बस यूँ ही,
हर बार नया हो जाए,
शायद! इसी इंतजार में,
वह एक सिरे पर,
बिना रंग, बिना धागे के,
खाली हाथ बैठा रहा।
जबकि दूसरे सिरे पर,
आज उसके हाथ में,
इंद्रधनुष है,
हालाँकि,  उसे इस बात की उम्मीद नहीं थी, कोई रंग आकर उसे छू लेगा, वह आज सतरंगी हो जाएगा,
पर ए भी सच है!
सुबह अपनी कलाई पर,
उसने "छः रंग"
खुद ही बाँधे थे, बस एक की कमी थी। rajhansraju

बे-चेहरा

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हलाँकि,
उसे यही लगता है,
उसने मुझे,
ऐसो आराम का हर सामान दिया है,
मुझे महफूज रखने की सारी व्यवस्था की है,
और लोगों से,
मुझे समझने का दावा करता है,
ए लिबास और दीवार,
मेरे लिए तो है,
देखो कितनी खूबसूरत है,
ए जंजीर सोने की है,
इसमें हसीन पत्थर जड़े हैं,
सब कुछ बहुत कीमती है,
मुझको सर से पाँव तक,
हर तरह की रंगीन बेडियों से जकड़ा है,
जिसे कभी कोई लिबास, जेवर,
या कुछ और कह देता है,
उसका दावा अब भी यही है,
वह,
मेरे सहूलियत,
मेरे हक की बात करता है,
ए और है कि उसने कभी,
मेरी आवाज नहीं सुनी,
मुझे सिर्फ बुत समझते रहे,
और मै,  बिना किसी पहचान के,
हरदम बेचेहरा रही,
rajhansraju

खोटे सिक्के- बाजार में

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मेरी जरूरत का हर सामान
बाजार में मिलता है,
दुकानों में क्या कुछ नहीं है,
इंसानी शक्लों की पूरी तह लगी है,
खरीदने, बेचने और बिकने वाले,
हर जगह,
जैसे एक ही आदमी हो,
कौन, किस तरफ, क्या है?
कुछ भी समझना,
बहुत मुश्किल है।
तभी अलग शक्ल लिए,
कुछ लोग,
दुकान की चौखट पर आए,
अपने खास होने का,
एक अजीब सा उलझा हुआ,
कुछ?  यकीन जैसा लगा? जैसे खुद को थोड़ा बहुत पहचानते हों,
पर यह क्या?
दुकान का दरवाजा खुलते ही,
उसकी चमक ने सबको,
अपनी आगोश में ले लिया,
ऐसे ही, जो भी यहाँ आया,
अपनी सूरत खोता रहा,
जिसकी पहली शर्त यह है,
इसकी कीमत,
उसे खुद ही चुकाना है,
असली काम?  जिनके जेब में सिक्के है,
उन्हें दुकान तक लाना है।
जबकि, अब भी उसे अपनी जरूरत का,
ठीक से अंदाजा नही है,
बस वह खरीद सकता है,
इसलिए खरीदता रहता है।
ऐसे में कभी-कभी लगता है,
शायद!  वो ज्यादा खुश नसीब हैं,
जो बाजार से,
अक्सर?
खाली हाथ लौट आते हैं,
या तो उनको ए बाजार
समझ नहीं आता,
या फिर एकदम कड़के हैं,
मतलब इनकी जेबें खाली हैं,
जिसमें शायद!
इनकी पूरी मर्जी नहीं है,
पर ऐसे ही,
कुछ अपनी सूरत के साथ,
बचे रह जाते हैं।
शायद! थोड़े जिद्दी हैं, 
या फिर…