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Showing posts from 2013

my childhood

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मेरे पीठ पर,
मेरा बचपन है, मै किससे?  क्या सवाल करूँ? जब धंधे पर बैठा, मेरा रहनुमा है ????

फसाद

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फसाद करना भी, लोगों का काम हो जाता है, कुर्सी पाने का, जरिया हो जाता है,  तब किसी का,  अफ़सोस करना भी,  उन्हें,   साज़िस का हिस्सा नज़र आता है।  जिन्होंने, न मालूम कितने,  बेगुनाहों का खून बहाया,  वही रहनुमा बन जाता है  किसे अच्छा कहूं, किसे बुरा कहूं, जब हर किसी ने   अपने पहलू में तेज़ धार वाला, खंजर रक्खा है, अभी वह चुप है,  शायद, घात लगाकर बैठा है, ऐसे ही अपने,
मौके का,  इंतजार करता है...

flood

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इन्सान अपनी  फितरत दिखाता रहा,  उसकी राह में पत्थर पर पत्थर लगाता रहा, खुद के जीतने का भ्रम ऐसे ही बढ़ता रहा,  वह भी भला कब तक धीरज रखती, थोड़ी नाराज़ हुई,  खुद का एहसास किया,  इंसानी जीत को घास-फूस में बदलने लगी, अपने पुराने रस्ते पर चल पड़ी, लोगों ने कहा बौरा गई, वह चुपचाप आगे बढ़ती रही,  नदी को पता नहीं था,  पत्थर से बनी दीवारों को घर कहते हैं, वह तो अपने रस्ते चलती रही,  जहाँ ठहरा करती,  उन्हीं जगहों को ढूंढ रही,  लोग उसकी राह में आते रहे,  ईंट-पत्थर का सबकुछ बनाते रहे, अपनी नासमझी, नाकामी का दोष,           नदी को देते रहे।

मेरा ईश्वर?

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मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था, चाक-चौबंद है, ऐसा लगता है आज,  देवता के लिए खतरे की घडी है। मजाक का नया दौर चला है, कहते हैं हम, ईश्वर के लिए, लड़ रहें है। उसके नाम पर,  पता नहीं क्या-क्या रच लिया है, उसको बेचने का कारोबार,  खूब हुआ है।

ख़ामोशी

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बिना शब्दों के,  ढेरों बातें होती रही,   तुम्हारा एहसास,  न जाने कहाँ ले  जाता रहा, तुमने भी कहाँ कुछ कहा?  थोड़े-थोड़े लम्हों बाद,  मेरी तरफ देखने की कोशिश, और न देख पाना,  फिर,  उसी ख़ामोशी का लौट आना,  जो खुद में बिखर गया था, उसी को चुपचाप,  समेटते रहना .....

क्या हाल है?

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किसी ने यूँ ही, 
हाल पूँछ लिया,  क्या जवाब दे ?  सोचता रह गया,   न जाने क्या कुछ,  
होता रहा? एक पल में,   कितने पन्ने पलट दिए,   आँख में कुछ गीला सा लगा? उसने मुड के नहीं देखा,  ठीक हूँ ,  कहके,  हँसने लगा।

नाम?

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पुरोहित ने कहा-  माताजी से गऊदान करादें  जजमान, इस उम्र में गंगा स्नान के बाद यह जरूरी है, हो सकता है अब आना न हो पाए, माताजी की उम्र काफी हो गई है, पुत्र ने सोचा-विचारा, पत्नी की तरफ देखा,  सहमति  ही थी,  माताजी को कुश की पाँती थमाई,  पुरोहित ने न समझ आने वाले मन्त्र पढ़े,  माताजी से खुद का नाम लेने को कहा,  वह सोचने लगी!  विवाह के बाद तो किसी ने नाम से बुलाया ही नहीं,  अचानक नाम की जरूरत कहाँ से आ पड़ी? बड़ी मुश्किल से अपना नाम लिया,  जैसे किसी भूली चीज़ को याद किया। पुरोहित फिर बुदबुदाया,  गोत्र का नाम लेने को कहा,  यह याद करना तो और कठिन था, जिस घर में जन्म लिया,  जहाँ बेटी बहन थी,  वहां से तो अब सम्बन्ध ही न रहा, फिर पत्नी, माँ बनी,  सारे पहचान रिश्तों से ही थे,  खुद तो कुछ थी ही नहीं, वह सोचती रही, स्त्री का नाम, गोत्र ? होता है क्या ?