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Showing posts from October, 2010

a journey

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जिंदगी किसे, किस मोड़ पर लाएगी , कब कहाँ छोड़ जाएगी .  बरसाती नदी जैसे , कभी ए उफनाएगी . पतवार नहीं, किनारा नहीं , किसी मांझी की, ए नाव नहीं . जीवन की सरिता कैसी,  हरदम ए बहती रहती . चाहे हम, या ना चाहें , अपनी राह ए चलती रहती .  नदी नाव का मांझी कौन , किनारों से है रिश्ता क्या ? जीवन पथ पर चलने वाले,   बिना रुके ही चलते जाते , कहीं राही ,कहीं किनारा , पतवारों की बातें क्या ? नदी जब उफनाती है,  पतवारों से नाता क्या ? जीवन की बातें कैसी ?  नदी-नाव का रिश्ता कैसा ? सूरज -चाँद की बातें होती , नदिया हरदम बहती रहती .  जीवन की किस बेला में , धूप-छावं कब आएगा ? न जाने राही यह,  कदम बढाता जाए वह .  जीवन की अबूझ पहेली , मांझी ने तो हरदम खेली . चप्पू, नाव, नदी का रिश्ता ,  बिना इसके सभी अधूरा . बीच नदी में आते ही  , सारे रिश्ते जुड़ जाते हैं . मांझी कौन ? नाव कहाँ ?  नदिया में है धर कहाँ ?  चप्पू, नाव ,नदी की बातें , साँसों तक ही रिश्ते नाते .... 

बेटियाँ

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मौसम कितनी जल्दी बदल जाते हैं , जब एक आता है , दूसरा चला जाता है . यादें ही बची रह जाती है , एक मौसम में दूसरे की . बेटियाँ कितनी जल्दी बड़ी हो जाती हैं , बीते मौसम की तरह यादों में रह जाती है , वक्त के साथ चल देती हैं , सब कुछ स्वीकार कर लेती हैं . वह भी इतनी सहज , जैसे कुछ बदला ही नहीं . ऐसे ही हरदम , किसी अनजाने घर में  , प्यार से ,  एक परिवार बनाती है ||

बंधन

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क्या कहीं कोई आज़ाद है ? सब कुछ एक नियम से,  एक व्यवस्था में बंधा है . जन्म लेते ही ,बंधन में बंधना है . पहले माँ का प्यार ,पिता का दुलार . थोडा वक्त गुजरा , रिश्तों की डोर बड़ी हो जाती है . चारों तरफ से जकड लेती है , हर इच्छा ,हर जरूरत, एक बंधन है . इसमें बंधना ही नियति है  ,  इसी से रिश्ते- नाते,  देश -समाज बनता है . पहली सांस से,  आखरी सांस तक, सब बंधा है , कोई आज़ाद कहाँ है ?

india - an idea

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कैसे होगी मेरी पहचान,
बिना सम्मान के , एक भाव मेरे होने का,
एक राग मेरे जीवन का, जो ताल है जीने का।  मेरे साथ, 
मेरी आह में जो रहता है , भारत नाम है उसका, जो मेरी सांस में बसता है।  हर रंग भर जाता है, 
खुश हो जाता हूँ , यह दिल, 
इसकी गोद में सकून पाता है, जब भी नाम लबों पर आता है , धड़कन तेज हो जाती है . यह जमीन, 
हमारा जीवन है , इसे हरदम हरा रखना है , हर कोने को खुशियों से भरना है . इसकी हरियाली, 
हर घर तक जाए , नदिया सबकी प्यास बुझाए . कुछ इस तरह आज, गलें मिलें  जब हम चले,  पहाड़, नदिया, रेत, समंदर,
सबको अपना कहे।  उड़ने को पूरा आकाश हो , सारे रंग एक हो जाए , भारत सिर्फ नाम नहीं ,  पहचान है , हम एक रंग में,
 रंग जाएँ,  सबमे भारत भाव,
 भर जाए .....

sunrise

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रात की चादर ओढ़ के , जब दुनिया सो जाती है .  कुछ आँखे अलसाई सी , किसी की याद में खोई सी . तन्हाइयों में रोई सी , तलाश में अपनों के निकल पड़ती हैं , दूर अँधेरे में ,दीवारों से टकराती हैं . थक कर कमरे की दीवारों तक जाती हैं ,  कदम वहीँ रुक जाते हैं , सपनों को, खिडकियों में ढूँढता है ,  बंद दरवाजे को बार -बार देखता है . शायद कोई दस्तक ,बिछड़े यादों से मिला दे . आसमान भी कितना छोटा है उसका , अँधेरे में काला ही नज़र आता है , कोई चाँद सितारें नहीं इसमें . सूरज भी ,लगता है,  किसी कोने में चादर ओढ़के सो गया . वह तन्हाइयों से बातें करता है , उदास ,कमरे को देखता है . पता नहीं कब, आँख लग जाती है . लगता है, सबेरा होने वाला है , खिड़की से, सुनहरी धूप झाँक रही है , सूरज ने दरवाजा खटखटाया है , साथ चलने को बुलाया है . 

untouchable

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तुम कैसे हो, मै कैसा हूँ.  जीवन का रंग क्यों ऐसा है , सबका रंग सबकी जात , कहती है कुछ ऐसी बात . जीवन पथ पर पर ,चलते साथ , दूर रह जाते क्यों हाथ .  एक स्पर्श की होती चाह , पर रंग जात आती है राह . एक राह पर चलते जाते , दूर कदम, मिल न पाते .  मै जीतूंगा ,मै बड़ा हूँ , चाहे तन्हा ही खड़ा हूँ .  न बढ़े कदम ,न बढ़े हाथ , तन्हा कोई नहीं साथ , जात रंग का भेद न छूटा, अहंकार क्यों न टूटा . मानके तुमको सूत , बना रहा मै अछूत . मेरी पवित्रता इतनी कमजोर , स्पर्श मात्र से हो जाती चूर . भागता रहा मै, लिए जात , तुम रहे स्थिर निर्विकार . बिना जात , बिना रंग . हर दम सबके साथ ||     

स्त्री

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मै वसुधा ,मै ही नारी ,  रचना मै करती हूँ .  सबको सींचा करती हूँ , सृजन मेरी पहचान , नवीनता का मै आधार , धर्म जाति से हीन .  परंपरा,धर्म ,मुझ तक ही सीमित , कैसे रहना ,कैसे दिखना ही संस्कृति . हर धर्म ने मुझको मारा है , हर जाति ने मुझको तोड़ा है. कुछ भी नाम दिया हो, कोई भी काल रहा हो .  तब भी मै ऐसी ही रही , सबसे यूँ ही जुड़ती रही . ममता लिए खड़ी रही , बच्चों के बनाए नियम से बांधती रही . नारी जागरण का ज़माना आया . कदम से कदम मिलाकर चलना है , ऐसे  नहीं ऐसे रहना है . आगे बढ़ाना ,आगे रहना , यही आज का कदम ताल है . भला कोई कब तक आगे रह सकता है , जब पाने को पूरा आसमान है .  फिर भी ,नए नियम का बोझ,  मुझ मुझे ही सहना है . मैंने भी सोचा !  मै भी बदलूंगी ,दुनिया के साथ चलूंगी . मेरा भी आकाश है , मेरे पंख बेक़रार हैं ,धरती मुझे बुला रही . समुन्दर में बहना है ,  रेत पर चलना है , मुझे भी उड़ना है . लोगों ने कहा  "अभी दुनिया देखी कहाँ ?" मैंने कहा  "यह तो बस शुरुआत है " 

ayodhya - hey ram!

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 अल्लाह क्या अपने बन्दों पर नाज करेगा ? इंसानों के क़त्ल को माफ़ करेगा ? राम बिना मर्यादा रह पाएँगे ? इंसानों में अंतर कर पाएँगे ? यह हिन्दू, वह मुसलमान,कौन बताएगा ? उनकी रक्षा को लड़ते हैं,  कैसे समझाएगा  ?  राम को मंदिर अल्लाह को मस्जिद,हम बनाएगे. वह कहाँ है यह बताएँगे,  बस यह नहीं जान पाए,वह कहाँ नहीं है .  बना सके न एक घर खुद की खातिर, मंदिर-मस्जिद हम चिल्लाएँगे. मरते भूख से बच्चे खुद के, पर मूरत को भोग लगाएँगे. दाता को किया भिखारी, मंदिर बना बने ब्यापारी. कमजोर किया ईश्वर को,  इंसानों  पर किया है आश्रित. सर्वशक्तिशाली को दीवारों में कैद किया,  नाम उसका लेकर दंगा और फसाद किया. राम-रहीम को बेवजह बदनाम किया, कभी तीरथ, कभी ब्रत का नाम कर दिया. पर मरते बेबस लोगों की, फ़िक्र कितनी बार किया ? कशी और काबा पर न्योछावर क्या न किया, रोते नंगे बच्चों को हरदम दुत्कार दिया. कायनात की ख्वाइश में, मंदिर-मस्जिद का निर्माण किया. 
खुद की खातिर लोगों को, बेघर कितनी बार किया...?...

कोशिश

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ऐसी कोशिश  ताउम्र होनी चाहिए, कोई कुछ भी कहे कोई फर्क न पड़े .  औरों जैसा होने की चाहत न रहे , इस दौड़ से दूर, एक मुकाम हो, अपनी कुछ अलग पहचान हो . कुछ अजीब लोग भी इस दुनिया को चाहिए , जो महसूस करें हर दर्द, हर आह को . अपने से परों की भी परवाह हो , बिना कहे बिना सुने ,
 किसी को देख के ,मुस्करा देना . थोड़ी देर रुक जाना ,साथ बैठ जाना . अनजाना सा कुछ बाँट लेना,साथ होने का भरोसा , एहसास अपने पन का ,कितना कुछ दे जाता है .  एक पल में भरोसा -प्यार ,और न जाने क्या -क्या . अनकही बातें भी समझ ली जाती हैं ,
एक दिलासा दे जाती हैं . किसी के पास चुपचाप ,यूँ ही बैठे रहें . बिना शब्दों के, खुद का एहसास होने दें .  कुछ देर के लिए दुनिया का गुढा गढ़ित भूल जाएं . दुनिया को खूबसूरत निगाहों से देख पाएं ,  किसी के काम आए ,इसी में सकूं पाएं . शिकवा शिकायत की आदत भूल जाएं , एक कोशिश ,यह भी करें , औरों के खुश होने पर ,  हम भी खुश हो जाएँ .

छोटी सी बात

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अक्सर बातें बेवजह शुरू हो जाती हैं , काफी दूर तक जाती है .  कुछ अपने कुछ पराए हो जाते हैं, कितना अजीब होता है , एक छोटी सी बात, कहाँ से कहाँ तक जाती है , क्या -क्या हो जाता है ,  कोई जीत कर हार जाता है .  कुछ का कुछ हो जाता है , कहीं हिंदुस्तान,   कहीं पाकिस्तान हो जाता है .

सब ठीक है !

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वैसे ही सब कुछ अगाध, अविरल गति से चलता रहा . बिना रुके , एक पल  लगा था . सब कुछ ठहर गया है . पर ! ऐसा कुछ नहीं, सब तब जैसा ही सामान्य है, भावना शून्य ,मूक . सभी कदम अब भी चल रहें है, आँखें हाथ सब हिल रहे हैं,
हाँ ए सब अब भी जिन्दा है .
आज फिर कोई अमानवीयता के भेंट चढ़ गया, पर कुछ खाश नहीं हुआ ! कुछ पल, कुछ दिन, कुछ लोग मुरझाए रहे . आखिर सब्र टूट ही गया , फिर सब उसी तरह चलने लगा, किसी के साथ कुछ भी हो, क्या फर्क पड़ता है, सब सामान्य ही  दिखता है, एक  आदत हो गयी है . चुप रहना , कुछ न कहना ,सब का जड़ हो जाना , आज हम भी, जिन्दा लाशों के बीच जिन्दा हैं , खुद को अपने कंधे पर ढोते हैं , सिर्फ अपने ही बोझ से दब जाते हैं , सब सामान्य रहे, इसलिए खुद को भूल जाते हैं . भीड़ में शामिल होते ही,