जड़े बची है..


अभी-अभी कहीं और से
उखाड़ के रोपा है,पौधा हरा है
जड़े बची है
सुबह देखनामुरझाई पत्तियाँ,
कैसे अँगड़ाई लेती हैं,
ऐसे ही जिन्दगी के
तमाम जख्म भर जाते हैं 
नया सवेरा, नई रोशनी,
नई बात बता जाती है,
कोई कुछ नहीं कहता,
कहानी खुद ही अपनी,
दास्ता कह जाती है,
अगर उसमे कुछ भी बचा होगा,
वह उठेगा नया घरौंदा,बना लेगा,
मिट्टी में जड़ जमा लेगा,
फिर पतझड़ में पत्तियाँ गिरेंगी,
तब तक वह पेड़ बन चुका होगा..

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