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Showing posts from January, 2010

फुटपाथी

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देखो धरती आसमान से, 
कैसे मिलाती है क्षितिज पे । जैसे कोई बिछड़ा बच्चा ढूंढें, 
माँ की गोद को, फुटपाथ पर भी होते हैं बच्चे, 
बिना माँ बाप के। अकेले लड़ते भूख और समाज से । एक रूठा बच्चा, 
पास नहीं कोई ,आस नहीं कोई । कब तक चलेगा बिना सहारे, 
मरे बचपन के साथ , हाथ में उठाए बचपन का बोझ । कोई नहीं पूंछता उसका नाम , हर कोई कहता है रामू या छोटू । नाम की जरूरत ही नहीं पड़ी उसे , सब अपने हिसाब से, 
रख देते हैं उसका नाम । उसे भी नहीं मालूम , किसी ने कभी रखा हो, 
उसका कोई नाम । कभी कप - प्लेट धोता , किसी घर में, 
पोछा लगाता मिल जाता है , यह रामू या छोटू पेट भरने को चंद टुकडे , साथ में दो -चार थप्पड़, रोने की भी चाहत कहाँ रह जाती है । कोई आंसू नहीं पोंछता यहाँ , हर कोई देता है, एक भद्दा सा नाम । फिर भी वह हँसता है, 
जवाब देता है , हर नाम पर । आधी रोटी से भी भर जाता है, 
उसका पेट , क्योंकि गालियाँ, थप्पड़, 
आज काफी थे । वह फिर हँसता है, बेबस लोगों पर , जो खुद और समाज से हारे हैं । अपना गुस्सा और रौब, 
उस पर जता रहें हैं । उसे नहीं मालूम, 
जीवन के और भी अर्थ हैं , जिसे वह नहीं जानता । वह तो इतनी जल्दी, 
बड़ा हो गया कि चंद दिनों…