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Showing posts from December, 2009

सुनामी

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पल में ही ख़त्म हो गया सब कुछ , चिता जलाने को भी कम पड़ गए लोग ।
दफ़नाने को भी कहीं नहीं कोई , सारे पहचान हो गए ख़त्म ।
बस एक ही नाम मृत , लाश बन गए सब लोग ।
जीवन कितना छडिक , हर कोई भाग रहा है ।
कोई जीवन के लिए ,तो कोई म्रत्यु के डर से।
पर !सभी नाकाम ,एक सा ही अंजाम ।
कोई इस पल, तो कोई उस पल , इसी मिट्टी में मिल गया ।
बिना किसी नाम, बिना किसी पहचान के ।
कुछ लोगों को, न मिट्टी मिली, न आग ।
वह काम आए परिंदों के ।

नियम

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बेगाने बन जायेंगे अपने,
अपनों से मिलाना कम होगा । याद तो आएगी अक्सर,
आँखों में आंसू भी आयेंगे ।
पर ! नियम है ऐसा ही,

बच्चे उड़ जाते पंख जमते ही ।
सूनी आँखे रह जाती, 

उसके वापस न आने पर ।
उसकी मंजिल, उसकी राह,

चल दिया छोड़ घर बार ।
बेटी तो चल देती ससुराल, 

बेटा भी कहाँ रहता साथ ।
खाने कमाने के चक्कर में,

वह भी जाता है परदेश ।
माँ रह जाती घर पर तन्हा, 

बेटी - बेटों की यादों में ।
कैसे डाटा था मुन्ने को, 

कैसे प्यार किया था ।
बेगानों के बीच गया वो, 

कैसे लड़ता होगा उनसे ।
जो रोते - रोते आँचल में, 

छुप जाता था मेरे ।
पापा की जब भी पड़ती, 

थोड़ी सी डाट उसे ।
बेटी भी कैसे होगी ससुराल में ,
पापा की बेटू थी जो,
लाडली पोती थी वो ।
भाइयों से दिन रात  लड़ती,

बात-बात पर रोती थी वो ।
कैसे नियम में बांध पाएगी? 

कैसे उठाना है ? कैसे बैठना है ?
धीरे से बात करना है,

अब उसे अच्छी बहू बनाना है ।
इस नियम को बनाया हमने,

इस नियम को माना मैंने ।
बेटी - बेटों ने ही माँ कहा मुझको, 

पूर्ण किया मुझको ।
वह वक्त भी आ गया,

जब बच्चे दूर उड़ने लग गए ।
अब मुझे छोड़ , एक नया घर बनाएँगे ।
मुझसे मिलने कभी -कभी आएँगे । तब मैं भी अपना पुराना …

युद्ध

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वर्षा पानी बिन बादल के, 
सूनी आँखों से, आह निकली दिल से, 
उसके न आने से । राह चल दिया ऐसे, 
बिन पानी नदी जैसे । अंगुली पकड़ के चलता था जो, 
बुढ़ापे का सहारा था वो । उसकी माँ कैसे सह पाएगी,
अकेले बेटे के जाने का गम , मै तो दुःख छिपाऊंगा, 
बेवजह भी मुस्कराऊंगा, बेटे के शहीद होने का फक्र दिखाऊंगा । पर कैसे ? 
गोलियों से छलनी उठा होगा ? जरूर अपनी माँ को याद किया होगा । लहू की हर बूँद तक लड़ा होगा , शहीद तो उधर भी होंगे,
बेबस घर ऐसा ही होगा । कोई बाप जब वहां भी तनहा होगा , अपने बेटे के, 
यही हालत सोचता होगा । उसे दफनाया या जलाया होगा , नहीं तो चील कौवों ने खाया होगा । मेरे बेटे से ही, 
इस लड़ाई का अंत नहीं होगा , अभी कितने ही बापों की, 
आँखें सूनी होंगी । माओं की कोखें खाली होंगी, 
यही दर्द, यही आह निकलेगी , जब भी लड़ाई होगी,
हार माँ बाप की होगी । सीमाएं कुछ बदल जाएंगी,
कुछ नए नाम भी पद जाएँगे । रोने को दो आँखें दूर,
किसी कोने में होंगी । कौन मारा था?
किसने मारा था ? किसके लिए? 
कौन याद रखेगा ? कभी-कभी नारे लग जाएँगे,
शोर भी होगा । पर ! इन हारी आँखों के सामने, 
कोई नहीं होगा , बेटे के कंधे बिना इन,
इन सूखी लकड़ियों का क्या हो…