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Showing posts from 2017

ताला बंद है

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एक दरवाजा,  जो शदियो से नहीं खुला,
उसके बारे में,
तमाम कहानियाँ कही जाती है,
कुछ लोग बताते है,
ए दरवाजा किसी महल में,
जाकर खुलता है,
हलाँकि उसके पीछे,
कोई इमारत,
तो नजर नहीं आती,
बस!
एक छोटी सी दीवार है,
जिसमें ए दरवाजा है,
उसमें एक बड़ा सा ताला लगा है,
यहाँ के लोग,
जो कहानी कहते हैं,
उसमें किसी राजा का जिक्र आता है,
जो बड़ा बेरहम था,
पर!
उसकी एक कमजोरी थी,
वह हर खूबसूरत चीज,
सदा के लिए,
अपने पास रखना चाहता था,
इसके लिए,
उसने,
शानदार कैदखाने बनवाए,
उनके दरवाजों पर,
रत्न जडित ताले लगवाए,
उसे खुद के अक्श से भी,
बेशुमार मुहब्बत थी,
एक कमरे में तो
सिर्फ!
आइना था, जहाँ राजा खुद को देखता था,
और पहले जैसी शक्ल,
तलाशता रहता,
उसकी बदनसीबी
तब शुरू हुई जब,
आइने में, 
हर दिन,
कोई और आदमी,
नजर आने लगा,
जिसका जिक्र,
वह किसी से नहीं करता,
राजा जो ठहरा?
लोग हंसेगे?
कमरे में तो सिर्फ आइना है,
वह चुपचाप,
खुद को ढूंढने की नाकाम,
कोशिश करता रहा,
अकेले में आइना देखता रहा,
धीरे-धीरे उसने,
सबको आजाद कर दिया,
बस यही एक ताला,
जो अब तक बंद है
जिसकी चाभी,
उससे,
न जाने कहाँ?
गुम हो गयी,
कहते है…

अपना-अपना दुःख

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सोचता हूँ क्या कहूँ? लड़खड़ाते कदम अच्छे हैं,
या फिर लड़खड़ाती आवाज,
कुछ भी हो?
अच्छा नहीं लगता,
नींद का यूँ खो जाना।
शायद! कभी-कभी,
किसी को अलविदा कहना,
बड़ा मुश्किल होता है,
वो भी जिसके साथ इतना वक्त गुजारा,
उसने भी तो भरपूर साथ निभाया,
फिर उसके लिए,
चंद रातें जाग लेना,
बुरा तो नहीं है,
हो सकता है,
उसको आखरी बार,
जी भर कर देखने की चाहत हो,
अब एक दूसरे को,
आखरी अलविदा कहना है। वो दुःख जो उसका अपना है, जिसकी चादर ओढ़े है,
उसी से एक सुकून है,
जिसको कसके थामा है,
कम से कम वो उसका अपना है,
हलाँकि साँस उसकी चलती नहीं,
धड़कन सुनाई देती नहीं,
पर गरदन जिसने पकड़ा है,
वह कहता उसको अपना है,
छोड़कर उसको चल न दे,
यूँ ही जिंदा छोड़ दे,
ए भी उसके लिए,
अच्छा नहीं है,
जिंदगी से डरता है,
खुद का सामना,
कहाँ करता है?
कहीं आँख पूरी खुल गयी,
या नींद उसको आ गयी,
कुछ और सपने आ गए,
या सच थोड़ा सा दिख गया,
तब पुराना दुःख कहाँ रह पाएगा,
बिना उसके,
पास क्या रह जाएगा? जबकि, एक कच्ची डोर ही काफी है,
जिसे थामकर,
दरिया नहीं,
समंदर,
पार कर जाएगा,
फिर पार बैठा
उस दुःख पर,
मुस्कराएगा,
जो अब भी वहीं ठहरा है,
जो …

यात्री

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न कोई ठहरता है, न मुड़ कर देखता है,
तूँ कौन है,
कैसा है?
किसी को फर्क,  कहाँ पड़ता है,
सब अच्छे से चल रहा,
और हम भी चल रहे,
रास्तों और मंजिलों को,
किसी की परवाह नहीं है,
वो सबके लिए एक जैसी हैं,
अब देखते हैं कौन?
किन रास्तों से होकर, मंजिल तक पहुँचता है,
या फिर,
जिसे मंजिल समझता है,
वह सिर्फ पड़ाव है,
rajhansraju

अच्छा! चलते हैं

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बहुत दिनों से,  कहीं चलने का जिक्र हो रहा था,
पर ए आदत बड़ी अजीब है,
कदम कहीं और पड़ते ही नहीं,
बस उन्हीं जाने पहचाने,
रास्ते और लोगों के बीच,
कैसे भी करके पहुँच जाते हैं,
वहीं पैरों का थम जाना,
तमाम चलने वालों को,
गौर से देखा,
तो यही पता चलता है,
सबने अपनी ठहरने की,
एक जगह बना रखी है,
यहाँ से वह कहीं भी जाए,
मगर लौटकर यहीं आता है,
ऐसे ही उसे,
हर एक चीज भाने लगी है,
जिससे उसका कोई ताल्लुक नहीं है,
वह उसे भी ढूँढता है,
जिसे नापसंद करता है,
उसी की कमी क्यों खटकती है?
वो जानता है,
यह उसके लिए अच्छा नहीं है,
बेचारा! क्या करे?
आदत से लाचार है,
तभी उसने देखा,
वो गली में पड़ा बेकार पत्थर,
आज नजर नहीं आ रहा,
कौन ले गया?
कहीं किसी की,
जागीर तो नहीं बन गया,
हालाँकि!
उससे सिर्फ ठोकर लगती थी,
पर! क्या करे?
आदमी है,
जो बड़ा अजीब है,
इसकी भी,
आदत पड़ गयी। अच्छा चलो कोशिश करते हैं,
एक नयी चप्पल,
और एकदम अलग तरह का,
जूता लेते हैं,
जिसे पुराने रास्ते का अंदाजा न हो,
जिसको घिसने,  ठोकर खाने का,
तजुर्बा भी न हो,
निकलने का वक्त,
रोज जैसा न हो,
फिर देखते हैं,
अपनी फितरत,
हम कुछ बदलते हैं कि नहीं,

कुछ मीठा हो जाए

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उसके पास, 
खाने और पकाने,
दोनों का सामान नहीं था, कई दिनों से, कुछ नहीं खाया था, जैसे तैसे सब जिंदा हैं, आज चेहरों पर, कुछ चमक दिखी, काफी दिनों बाद, कुछ बनाने की तैयारी हो रही थी, उसने कैसे करके,  कुछ रोटियां बनायी,
हाँ! कहीं से थोड़ा सा,
कुछ मिल गया था,
शायद कुछ खराब था,
खैर! ताजा तो नहीं था,
मगर उससे रोटी बन सकती थी,
सबने थोड़ा-थोड़ा खाया,
कुछ पेट की,  और कुछ मन की,
भूख मिटाई। जो थोड़ी अच्छी बन पड़ी थी,
उन्हें बच्चों ने खायी,
जो सबसे खराब,
ज्यादातर कच्ची थी,
जिसने बनाया,
उसने चुपचाप खाया,
और किसी ने,
न कुछ देखा,
न कुछ पूँछा?
उसके हिस्से में,
सच में रोटी थी?
शायद कुछ बचा था,
या फिर पूरा बरतन खाली था,
और सबका मन रखने को,
मैंने खाया जी भरके, उसका यह,
झूठ-मूठ का कहना था, खैर! किसी और ने, यह बात नहीं जानी। अक्सर ऐसा होता है,
खुद के खाने की जल्दी में,
भूल जाते हैं हम,
वो खाना जो परस रहा,
या फिर जिसकी
उंगली में थोड़ी सी भी,  आँच लगी होगी,
उसकी खातिर,
थोड़ा ठहरें, देखें,पूँछे,
मै जो खा रहा,
क्या वो,
सबके हिस्से आ रहा,
अगर कुछ कम है तो आओ,
सब में कूछ कम करते हैं,
ऐसे हर थाली सज जाएगी,
जो भी होगा,
थोड़ा…

मुझे डर नहीं लगता

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वैसे, कहता तो यही हूँ,
मै डरता नहीं हूँ,
ए सच है कि झूठ,
मैं क्यों कहूँ,
रहने देते हैं,
एक पर्दा,
हमारे दरमिया,
सच-झूठ का फैसला,
छोड़ देते हैं,
इस जिद से,
पता नहीं कौन?
रुसवा हो,
यही सोचकर,
फिर कह रहा हूँ,
मै डरता ....
rajhansraju

संगम पर

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कुछ पल,  ठहर कर देखा,
वह अब भी वैसे ही,
बाँह फैलाए,
अपने दामन में भरने को,
धीरे-धीरे बढ़ रही,
मै मूरख भागा डरके,
समझ न पाया,
उसके मन को,
ऐसे ही भाग रहा,
न जाने कब से?
जबकि उसकी बाँहे,
तो गंगा-यमुना हैं,
जो निरंतर बाँध रही,
हम सबको।
rajhansraju

पथिक

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जो हरदम भरा रहता था,
वो खाली है एकदम,
जिससे धार बहा करती थी,
वो चुप है क्यों?
अब भी लोग गुजरते हैं,
जब पास इसके होकर,
एक नजर देख लेते हैं,
घड़ा है निश्चय ही,
इसमें भरा होगा जल,
कुछ खिन्न भाव से लौट गए,
कहा नहीं एक भी शब्द,
पथिक हैं,
बस चलते जाना है,
पर!
कहीं भी खाली घट,
देखकर अच्छा नहीं लगता है,
खुद को बोझ समझता है,
वो राही तब,
जब किसी शहर से गुजरता है,
चलते-चलते शायद,
थोड़ा सा थक जाता है,
करने को आराम कुछ पल,
तनिक ठहर जाता है,
प्यास बुझाने को तब वह,
आसपास नजर दौडाता है,
पानी से भरा घड़ा,
घर की याद दिलाता है,
यहाँ भी उसके खातिर,
जैसे कोई इंतजार में बैठा है,
ए शहर भी अपना लेगा,
उसको यही लगता है,
पर कहाँ हुआ ऐसा कुछ,
घड़ा तो पूरा खाली है,
सबको यहाँ जल्दी है,
पानी भरने की,
कहाँ किसी को फुर्सत है,
जबकि सब प्यासे हैं,
दूर शहर में आए हैं,
आते-जाते जिसको देखो,
सब उसके जैसे हैं,
हर घर खुद का लगता है,
वैसे ही दरवाजा भी खुलता है,
फिर लौट कर वापस कोई जाता है,
जिसको होना था चौखट पर,
जब वह नहीं होता है,
ऐसे ही अपना कोई,
इंतजार करता है,
कब आओगे,
जल्दी आना,
रास्ते में कुछ खा-पी लेना,
थोड़ा …

रोटी का बाजार

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शहर अपने को, 
कूछ यूँ बयाॅ करता है,
बाजार सब चला रहा,
यही लगता है,
यहाँ रोटियाँ खूब बिकती है,
जो भूखे हैं,
वही दुकानों में काम करते हैं,
मगर जब ए बँटती है,
सबसे छोटा टुकड़ा,
इन्हीं को मिलता है। वो न जाने खुद पर,
या किसी और पर,
अब भी हँस रही है
हाँ! वह चिथडों में लिपटी,
रोटी बना रही है,
हर रोटी की अपनी कीमत है,
बस मुट्ठी में,
सिक्कों की जरूरत है,
यहाँ सबके हिसाब से,
रोटियाँ बनती हैं,
जैसी चाहत हो 
वैसे ही रूप, रंग, आकार रखती हैं।
अरे हाँ! वहाँ मक्खन से,
सरोबार रोटियाँ रहती हैं,
जो थोड़ी भारी जेबों को मिलती है।  यहाँ कुछ टेढ़ी-मेढ़ी मोटी होती हैं
पर इनमें स्वाद बहुत है,
ए हरदम भूखे, प्यासे, मेहनतकश,
लोगों के हाथ लगती हैं,
फिर जो लोग इस रोटी को,
अपनी मेहनत से हासिल करते हैं,
असल में स्वाद वाली,
तो सिर्फ,  उन्हीं को मिलता है।
rajhansraju

वह पत्थर का है

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हाँ! मैने
बहुत मिन्नतें की,
और लोगों ने भी
तमाम जतन किए
पर! उसने,
न तो कुछ सुना
और न कुछ देखा,
उसकी हर चौखट पर,
बड़ी उम्मीद से गया,
शायद! अबकी
दुआ कबूल हो जाय,
यह दुनिया थोड़ी सी,
उसके लिए हसीन हो जाय,
सारी कोशिश नाकाम रही
कोई तरकीब काम नहीं आयी
वह वैसे ही अपनी जगह कायम रहा
न कुछ देखता है, न सुनता है
इसमें भी उसका कोई दोष नहीं है
आखिर जिसको हमने खुदा कहा है
उसको हमने ही पत्थर से गढ़ा है।
rajhansraju

अग्नि-परीक्षा

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ए भी तो सच है,  बनवास तो राम को हुआ,
पर! बेघर हमेशा सीता हुई,
चाहे वह राधा बनी,
या फिर मीरा हुई,
आग में गुजरना पड़ा,
विष का प्याला उसने पिया,
आँच राम को न लग जाए कहीं,
ए समझकर,
हर काल में जलती रही,
सदा मर्यादा पुरुषोत्तम रहें वो,
सब तजके भी,
हर दम,
राम-राम कहती रही। पर क्या मिला इसका सिला?
अब तो यही लगता है,
उस वक्त बात मानकर,
तुमने अच्छा नहीं किया,
काश!
अग्नि परीक्षा से इंकार कर देती,
या फिर दोनों भाइयों से कहती,
आओ इस आग से तीनों गुजरते हैं,
देखते हैं फिर भला?
कितने कुंदन निकलते हैं,
सवाल जब राम पर नहीं उठा,
फिर सीता पर क्यों उठे?
जो लांक्षन किसी स्त्री पर लगे,
उसीसे भला?
कोई पुरुष क्यों बचे? जब!
वो भी तो हाड मांस का है,
और देह धारण करता हो,
फिर जिस्मानी दोष से,
कैसे बच सकता है? अच्छा होता कि कह देते,
तुम इंसान नहीं हो,
और सीता भी कोई आम औरत नहीं है,
पर तुमको तो मर्यादा पुरुषोत्तम बनना था,
जिसके लिए सब कुछ,
सीता को सहना था।
वो चुप रहकर  सहने वाली सीता,
सबको भाती है,
घरों में आज भी सबके,
तुम्हारे साथ पूजी जाती है।
अब भी वही आदर्श मानते हैं,
अपनी आवाज में बोलने वाली औरत,
क…

निकम्मा😀😀

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यूँ खुश होकर,  तालियाँ मत बजाओ,
यहाँ सवाल खुद को, 
पाने और खोने का है,
दर्द ए है कि खुद के मरने का, 
मातम भला कैसे मनाए?
जबकि अब भी,
गरदन बहुत कसके दबी है,
मुँह टेढ़ा हो गया है,
और जीभ ऐंठ गयी है,
सिर्फ एक ही कमी है
मरने वाली feeling नहीं दिखती,
कमबख्त शक्ल ही ऐसी है,
लगता है हँस रहा,
वैसे ही जैसे बिना चेहरे वाले,
कंकाल होते हैं,
जो चेहरों पर हंसते है,
वो न तो अपना,
न तो दूसरों का चेहरा देखते हैं,
अब उन्हें ए मालूम है,
असल में जो है,
उसमें आँख नहीं है,
और चेहरों में कोई फर्क नहीं है,
अब वह चेहरे के साथ भी हंसता है
हश्र चेहरे का,
उसने, जबसे जाना,
उसके चेहरे पर,  अनायास हंसी रहने लगी,
उसके यूँ हँसते रहने पर,
उस पर बेहया होने का इलजाम,
लगता है,
कैसा निकम्मा है,
देखो,
अब भी,
कैसे हँस रहा है। 😁😁😁😁😁
rajhansraju

धागों का इंद्रधनुष

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धागों का, टूटना और छूटना,
कभी चटक जाना
कभी छटक जाना
फिर उन्हें समेट लेना
पूरा धागा बना लेना
उसका एक सिरा,
कभी कसके पकड़ लेना, किसी गाँठ का पड़ जाना, किसी वजह से कुछ उलझ जाना, ऐसे में एक दूसरे को, थोड़ा वक्त देना,
बस! किसी उंगली से थाम लेना,
ए उम्मीद की डोर,
जो अब भी बंधी है,
उसके किसी उंगली में,  हो सकता है, सिर्फ फॅसी हो,  जबकि दूसरा सिरा,
अब भी मेरी तरफ है,
तो इसकी वजह यही है,
ए डोर अब भी कायम है।
वैसे भी जो कच्ची मिट्टी,
कच्चे धागे से बना हैं,
उनके कुछ भी बनने का सिलसिला,
कभी खत्म नहीं होता,
उसे तो सिर्फ वो कुम्हार, 
वो जुलाहा चाहिए, 
जो उसे गढ़ दे,
और रंगो से ऐसे रंग दे, बस यूँ ही,
हर बार नया हो जाए,
शायद! इसी इंतजार में,
वह एक सिरे पर,
बिना रंग, बिना धागे के,
खाली हाथ बैठा रहा।
जबकि दूसरे सिरे पर,
आज उसके हाथ में,
इंद्रधनुष है,
हालाँकि,  उसे इस बात की उम्मीद नहीं थी, कोई रंग आकर उसे छू लेगा, वह आज सतरंगी हो जाएगा,
पर ए भी सच है!
सुबह अपनी कलाई पर,
उसने "छः रंग"
खुद ही बाँधे थे, बस एक की कमी थी। rajhansraju

बे-चेहरा

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हलाँकि,
उसे यही लगता है,
उसने मुझे,
ऐसो आराम का हर सामान दिया है,
मुझे महफूज रखने की सारी व्यवस्था की है,
और लोगों से,
मुझे समझने का दावा करता है,
ए लिबास और दीवार,
मेरे लिए तो है,
देखो कितनी खूबसूरत है,
ए जंजीर सोने की है,
इसमें हसीन पत्थर जड़े हैं,
सब कुछ बहुत कीमती है,
मुझको सर से पाँव तक,
हर तरह की रंगीन बेडियों से जकड़ा है,
जिसे कभी कोई लिबास, जेवर,
या कुछ और कह देता है,
उसका दावा अब भी यही है,
वह,
मेरे सहूलियत,
मेरे हक की बात करता है,
ए और है कि उसने कभी,
मेरी आवाज नहीं सुनी,
मुझे सिर्फ बुत समझते रहे,
और मै,  बिना किसी पहचान के,
हरदम बेचेहरा रही,
rajhansraju

खोटे सिक्के- बाजार में

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मेरी जरूरत का हर सामान
बाजार में मिलता है,
दुकानों में क्या कुछ नहीं है,
इंसानी शक्लों की पूरी तह लगी है,
खरीदने, बेचने और बिकने वाले,
हर जगह,
जैसे एक ही आदमी हो,
कौन, किस तरफ, क्या है?
कुछ भी समझना,
बहुत मुश्किल है।
तभी अलग शक्ल लिए,
कुछ लोग,
दुकान की चौखट पर आए,
अपने खास होने का,
एक अजीब सा उलझा हुआ,
कुछ?  यकीन जैसा लगा? जैसे खुद को थोड़ा बहुत पहचानते हों,
पर यह क्या?
दुकान का दरवाजा खुलते ही,
उसकी चमक ने सबको,
अपनी आगोश में ले लिया,
ऐसे ही, जो भी यहाँ आया,
अपनी सूरत खोता रहा,
जिसकी पहली शर्त यह है,
इसकी कीमत,
उसे खुद ही चुकाना है,
असली काम?  जिनके जेब में सिक्के है,
उन्हें दुकान तक लाना है।
जबकि, अब भी उसे अपनी जरूरत का,
ठीक से अंदाजा नही है,
बस वह खरीद सकता है,
इसलिए खरीदता रहता है।
ऐसे में कभी-कभी लगता है,
शायद!  वो ज्यादा खुश नसीब हैं,
जो बाजार से,
अक्सर?
खाली हाथ लौट आते हैं,
या तो उनको ए बाजार
समझ नहीं आता,
या फिर एकदम कड़के हैं,
मतलब इनकी जेबें खाली हैं,
जिसमें शायद!
इनकी पूरी मर्जी नहीं है,
पर ऐसे ही,
कुछ अपनी सूरत के साथ,
बचे रह जाते हैं।
शायद! थोड़े जिद्दी हैं, 
या फिर…

बेनाम, लावारिस, .... कत्ल?

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चर्चा तो यहाँ भी है कत्ल का
जो कि नया नहीं है
हलांकि ए कत्ल किसने किया?
इसका कोई चश्मदीद नहीं है,
उसको किसी और ने मारा
या फिर वह खुद ही कातिल था
ए किसी को पता नहीं है।
सच ए है कि
वो जिंदा नहीं है,
यकीनन कत्ल तो हुआ है।
इसमें कोई शक नही है,
ऐसे ही मुर्दों के मिलने का सिलसिला
न जाने कब से चलता रहा।
ए बिना नाम
बिना पहचान के लोग।
अरे! नहीं!
ए पूरा सच नहीं है
इनका भी घर है
बस थोड़ा सा ढूँढना है
न जाने कितनो का
अब भी कोई पता नहीं है
कैसे किस हाल में होंगे
पर! अक्सर गुमनाम, लावारिस, बेजान
जो किसी को नहीं मिलते
यूँ ही धीरे-धीरे गुम हो जाते हैं
उन्हें न तो श्मशान मिलता है
और न ही कब्रिस्तान,
उनके जाने की
किसी को खबर नहीं होती,
कोई मातम भला कैसे होगा?
वो जिस घर का शख्स है,
इससे अनजान,
उसके इंतजार में रहता है,
यह उम्मीद अच्छी है कि बुरी,
क्या कहें?
पर! उसके होने का भरोसा
सब में,
बहुत कुछ जिंदा रखता है।
आज बहुत कुछ टूटा,
घर के हर शख्स में
कुछ खाली सा हो गया।
क्या जरूरत थी
जो उसके जाने के वर्षों बाद
किसी लावारिस के शिनाख्त की,
उसके घर वालों की,
वो जो लौटने की
उम्मीद थी
अब,
सदा के लि…

शब्द जो हमने गढ़े हैं

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जो स्वाभाविक है
उसे ही तो होना है
ए खुद का अल्फाज बनकर,
किसी कागज पर बिखर जाना,
कुछ ऐसा ही है।
जहाँ अलग से कोई प्रयास नहीं होता,
ए जो,
कुछ खाली खाली सा है
उसी में खुद को
भर देता है।
किसी के वक्त का,
एक कतरा नहीं लेता,
वह तो सिर्फ खाली लम्हों को,
खामोशी से,
न जाने कौन सी,
जुबान दे जाता है।
जो उसके परतों की ही खोलते हैं,
सब कुछ बयाॅ करके भी,
न जाने कैसे?
उन परतो को भी बनाए रखते हैं।
ए कुछ सुबह की नींद जैसी है,
जब वह जाग कर भी,
बिस्तर नहीं छोड़ पाता,
सुबह को इंकार करने की चाहत तो है,
मगर ए सूरज बहुत हठी है,
भोर होते ही,
सबसे आँख मिलाता है,
जो काले शब्द पूरी रात,
हमने गढे,
हर एक का मतलब,
बताता है।
ए शब्दों का अजब खेल है,
इसे चुपचाप खेलना है,
पर! सूरज ने उंगली पकड़ कर
जो समझाया,
वो किसी से नहीं कहना है,
और शब्दों को यूँ ही मजे से,
गढ़ते रहना, 
यह तो नशा-ए-लुत्फ है
जिसको पाने के लिए,
न तो कुछ देना है,
और कहीं जाना भी नहीं,
बस दौर-ए-जिंदिगानी की तमाम,
परीक्षाओं को हँसकर बिता देना है,
जो महज,
आगे बढ़ने का फलसफा है,
ए तो चंद शब्दों में,
खुद को दर्ज करने का तरीका है,
जो कभी किसी …

इच्छाधारी

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इच्छाधारी नाग-नागिन की कहानियाँ,
तो हम सबने सुनी है,
जिसमें वो कोई भी रूप धारण कर लेते,
बचपन!
अगर गाँव में बीता हो तो,
सिनेमा वाला दृश्य, 
हर जगह मौजूद होता है,
बस कल्पना को,
डर वाली कहानियों के रंग से भरना है,
ऐसे ही साँप से डरने पूजने,
और मौका मिलते ही,
मार देने का,
अजब व्यवहार करते रहे,
इसमें किसी के लिए कुछ भी गलत नहीं,
हर आदमी अपनी आस्था और कहानी गढ़ता है,
पर साँप का जहर?
बड़ा अजीब है,
जो उसकी पहचान है
इंसान उसी से डरता है,
इसी डर से,
तमाम विषहीन साँपो,
की जान खतरे में पड़ जाती है,
क्यों कि हमको पता नहीं चलता,
किसमे जहर नहीं है,
अक्सर इस अफरा तफरी में,
बिना जहर वालों की जान चली जाती है,
उनका सांप होना,
उनके लिए सजा बन जाती है।
खैर! अब तो शहर का जमाना है
पर साँप के होने पर संदेह नहीं करना,
आस-पास हमारे,
अब सिर्फ,
इच्छाधारी रहते हैं,
जो हर वक्त रंग बदलते हैं,
हमारे ही आस्तीनों में रहते हैं,
जो खुद बीन बजाता है,
दूध पूरा पी जाता है।
उन सीधे साधे साँपो को,
नाहक बदनाम करता है,
जो बिना कान का,
जिसमें विष भी नहीं है,
सारा इल्जाम उस पर लग जाता है,
जबकी उस तक बीन की आवाज,
ज…

कितना समझता है?

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कहीं कुछ भी तो नहीं है
जो तुझसे जुदा हो
यहाँ वहाँ जो भी बिखरा है
या हाथ में
सिमटा है,
जिसे अपना,
या किसी और का,
कहता है।
ए सिर्फ दायरा है
जो बताता है
कौन कितना समझता है।
पर उमने जो बनाया है
वह किसी एक का तो नहीं है,
और सिर्फ लेना ही?
मेरा काम तो नहीं है
शायद! हकीकत कुछ और है
जिसे हम देखना नहीं जानते,
जबकि मै भी उसी की रचना हूँ
जिसमें वह व्यक्त होता है
जैसे नदी और पहाड़ वह गढ़ता है
फिर हमारी आँखों से सब देखता है
कुदरत में सारे रंग भरता है,
उसके आगे दुनिया में,
कोई नहीं जा पाता है।
तब भी,
कुछ लोग,
अपनी समझ का दावा करते हैं,
किस से क्या जुदा है,
ए बताते फिरते हैं,
जबकि हकीकत ए है,
कौन किससे बना है,
और कितना गहरा है,
कभी पता,
चलता नहीं है।
rajhansraju

तूँ नदी है

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बस यही करना है, जो कुछ?
अच्छा या बुरा हुआ,
उसे भुला कर,
कत्ल न तो करना है,
और न होना है।
फिर जो दरिया है,
वो भला क्या डूबेगा?
कभी कुछ वक्त के लिए,
नदी भी समुन्दर बन जाती है,
तो वह सिर्फ,
पानी की ताकत बताती है,
ऐसे में कुछ नहीं करना है,
बस किनारों को,
थामकर रखना है,
ए दोनों तेरे अपने हैं,
इन्हीं के बीच रहना है,
अभी बरसात का मौसम है,
ए भी गुजर जाएगा,
तूँ फिर वही नदी हो जाएगा,
जो सबकी प्यास बुझाती है।
फिर क्यों इतना परेशान है?
जो अपनी प्यास बुझाने को,
इधर उधर भटकता है,
जबकि तूँ... खुद नदी है,
पानी से बना है
लबालब भरा है।
जिसे दर बदर ढूँढता फिर रहा है,
वो कहीं और नहीं है?
बस थोड़ा चुप बैठ,
गौर से देख,
अब सुन,
जो तुझसे कुछ
कह रहा है।
कमबख्त!
वह कोई और नहीं है,
तेरा ही कुछ है,
जो तुझमें टूट गया है,
अब भी जुड़ना चाहता है,
कब से कह रहा है,
पर! तूँ कहाँ?
सुनना चाहता हैं?
बस चुप रहकर,
उसे महसूस करना है,
तूँ दरिया है,
ए किसी से कहना,
थोड़ी पड़ता है।
rajhansraju

कुछ बात तो है

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मै यूँ ही नहीं हूँ,  जो हर बार उठ खड़ा होता हूँ
कुछ बात हममें जरूर है,
जो बढ़के एक दूसरे को थाम लेता हूँ।
जब आग लगती है बस्ती में,
तो मै भी डरता हूँ,
अपनों की फिक्र में,
हर वक्त रहता हूँ,
ऐसे में सिर्फ,
घर की छप्प़र नजर आती है
दूर उठती चिंगारी,
एक दूसरे के भरोसे को
अजमती है,
कभी-कभी य़कीं करने पर
डर भी लगता है,
मगर वह शख्स,
"हूबहू"
मेरे जैसा है।
वैसे हमारे पास वो ताकत नहीं है,
कि हम हवाओं का रुख बदल दें,
और गंगा यहीं से बहने लगे,
बस इतना जानता हूँ,
हार नहीं मानता हूँ,
घास फूस की एक छत फिर ड़ालूँगा,
क्यों कि मेरे जैसों की तादात कम नहीं है,
और चिंगारियों से उनका वास्ता भी नहीं है,
हाँ! ए सच है,
आग से लड़ना हमें नहीं आता,
पर! शायद! 
उन लोगों को पता नहीं है,
हमें बुझाने की तरकीब मालुम है,
बस एक दूसरे के साथ खड़े है,
और छोटे-छोटे बरतनों में
कुछ भर रखा है।
हमारे सभी घर एक जैसे हैं,
और पानी में फर्क नहीं है।
जब सभी घरों से,
ए बूँद-बूँद कर रिसती है,
तब दरिया बनने में, देर कहाँ लगती है,
फिर उठता हूँ, जुड़ जाता हूँ
नए पत्तों के साथ, हरा-भरा हो जाता हूँ,
मै कटता हूँ, मै …

काफिर?

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अगर वह सिर्फ तेरा है,
तो मुझको ए बता,
मेरा वाला कौन है,
तुम्ही तो कहते हो,
सब उसकी मर्ज़ी है,
फिर मेरा होना,
क्यों खटकता है,
हाँ मै काफिर हूँ,
किसी बुत के आगे,
नहीं झुकता,
पर दोस्त तुम्हें पता है,
मेरी तस्वीर,
बंदूक से नहीं बनती,
उसका रंग लाल नहीं है..
rajhansraju

तेरा हिस्सा है

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बुजुर्ग दोस्तों ने,
आज के हालात पर,
नाखुशी जाहिर की।
ए क्या हो रहा है?
वो कौन है जो हर तरफ,
जहर भर रहा है?
वह तो एक है,
जिसका नाम हमने,
अलग-अलग रखा हैं।
आँख खोलकर देख,
कहाँ कौन रहता है?
पर ए तो समझ ले
देखना कहाँ, क्या है?
बस मौन रहकर,
खुद में झाँकना है।
अब .. जरा गौर से देख,
कहीं से कोई आया नहीं है,
और कोई आएगा भी नहीं,
यही समझना है,
जिस से लड़ रहा है,
कोई और नहीं "तूँ" खुद हैं,
बस यकीन करना है,
जिसे गैर समझकर नफरत करता हैं,
वो तेरे बदन का हिस्सा है,
बस तेरी सियासत कुछ ऐसी है,
जो कुछ और बात कहती है,
काटके फिर बाँट के टुकड़ों में,
सब पर राज करती है,
लोगों को ऐसे ही जाति धरम पर
यकीं हो जाता है,
फिर किसी और की खातिर,
तूँ कभी हिन्दू,
कभी मुसलमान,
हो जाता है।
rajhansraju

कहानी है!

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वह खास अंदाज से अपनी बात कहता रहा,
धीरे-धीरे उसकी कहानियों पर यकीं होने लगा,
अब उसके अलावा कोई चर्चा नहीं होती,
कहानी वाला सच हर तरफ बिखरा है,
कुछ और जानने की जरूरत नहीं है
क्यों कि जो सच है,
इतना हसीन नहीं है
फिर वो ख़ाब से क्यों जागे?
और किसी के खाब को,
झूँठा कह दे?
चलो कुछ तो है,
जिसके लिए,
उसे नींद आ जाती है,
उन्हीं कहानियों के सपने,
अपने हिसाब से बुन लेता है,
ऐसे ही पूरे दिन की थकान,
बस! एक नींद से
मिटा देता है।
rajhansraju

रहने दो

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अब जो लोग बातें कर रहे,
या कुछ और कर रहे हैं,
उनमें ज्यादातर,
अंदर से एकदम खाली हैं।
उनके पास देने के लिए,
कुछ भी नहीं है।
ऐसे में नफरत और गाली,
के जवाब में,
वही वापस लौट आती हैं,
सब गंदा नजर आने लगता है।
चलो कुछ बात करते हैं,
अरे! तुम खाली हो,
ए बताने की जरूरत क्या है?
तुम्हें कुछ ठीक करने की,
जरूरत भी नहीं है।
बस चुप हो जाओ,
ए गंदगी,
अपने आप,
कम हो जाएगी।
rajhansraju

लेखा-जोखा

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लेखा जोखा बड़े गौर से देखा,
नफ़ा नुकसान एक खेल है,
तेरा अच्छा होना,
तेरे लिए ठीक नहीं है।
क्यों कि तेरा कोई मोल नहीं है
तूँ बाजार के लायक नहीं है,
फिर जो बिकता नहीं,
सच में बेकार है।
वैसे खरीदार कौन है,
ए ठीक से पता नहीं है,
सभी एक जैसे,
लम्बी कतार में,
कैसे भी?
कुछ मिल जाएँ,
बिकने को तैयार हैं।
rajhansraju

एक माँ एक बेटा

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यह एक प्यारे से बच्चे की कहानी है
शायद उसे डाट कम पड़ी
या प्यार बहुत मिला
जिसकी वजह से उसमें
एक ऐब आ गया।
वह पानी किसी और चीज को
समझने लग गया।
माँ जिसे वह बुढ़िया कहता है
वह भी बेटे पर हद से
ज्यादा यकीन करती है।
बेटे को भी अपना रोग मालूम है,
ऐसे में वह भी न जाने खुद को
कहाँ-कहाँ ढूँढता रहता है।
जब फुर्सत से किसी आइने में
खुद को देखता है
तो हर बार उसका अक्श
यही जवाब देता है- 
तूँ पूरा है इसका यकीन कर,
खुद की तलाश में,
कुछ और हो जाना,
क्या ठीक है?
कौन किसको पी रहा,
ए कहाँ पता चलता है?
सच कहूँ तेरा हारना
एक जाम से
अच्छा नहीं लगता।
तेरे पास तो वो
चाँद वाली बुढ़िया भी है,
जो अब भी तेरे पास रहती है
तुझमे भी तो जिंदगी का
भरपूर नशा है,
फिर तुझे
इन मामुली चीजों की जरूरत
क्यों पड़ती है?
अच्छा है!
तुझे मालूम है
तूँ जिंदा है
जानते हो क्यों?
किसी की उम्मीद हो,
नाज  हो तुम,
अरे! लगता है ..
अपनी बुढ़िया के
आसपास
हो तुम।
बस उसकी सूरत देखकर
खुद से पूँछो
कौन किसको देखकर
जिंदा है अब?
क्या कहूँ देखकर इनको,
अब भी यही लगता है
सबसे मुश्किल काम है,
माँ-बाप होना।
rajhansraju

कातिल?

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अरे!! जरा गौर से देखो कातिल कौन है?
कहीं तुम्हारे हाथ में ही खंजर तो नहीं है?? अब सबको यकीन हो गया है,
जिसका कत्ल हुआ है,
वही कातिल है,
अगर ऐसा नहीं होता,
तो गुनहगार पकड़े जाते,
उन्हें सजा होती।
हमारे यहाँ नारों का अजब चलन है,
जो ए जाति, धरम वाला झंडा है,
एक बड़े से खंजर में लटकता है,
वो हमें नजर नहीं आता,
जिसे हमने खुद थाम रखा है,
हम बड़े ही शातिर, बदमाश हैं,
जमके मातम भी मना लेते हैं,
कुछ आदत ही ऐसी है,
जल्द ही सब भूलकर,
फिर किसी झंडे को,
थाम लेते हैं।
rajhansraju

इंतजार

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उनका क्या दोष है,
जो सिर्फ माँ-बाप है,
हर बार उनके हारने की,
रश्म चल पडी है
पिछली बार भी,
जो जनाज़ा निकला था,
वह उन्ही के बेटे का था,
और इस बार भी,
न जाने यह दौर,
कितना और लम्बा चलेगा,
फिर मरने वाले का,
कोई मज़हब तो रहेगा ही,
लोग ऐसे ही उसका तमाषा बना देंगे,
अगली लाश?
कहीं किसी और की होगी,
कोई फौज़ी होगा, कोई काफिर होगा,
कैसा भी होगा?
इसी मिट्टी का बना होगा,
वही गम होगा, वही आँसू होंगें,
वैसा ही घर सूना होगा,
फिर कौन?
किसका इंतज़ार करेगा?
इन हारे माँ-बाप को,
भला कौन?
याद रखेगा..
rajhansraju

मुसाफिर

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अरे मुसाफिर ए बता,
क्या तूँ उसी शहर में है?
जहाँ के लिए निकला था,
सफर कैसा रहा?
राह कैसी थी?
कितने शहर गुजरे,
क्या वो तेरे शहर जैसे थे,
या कुछ और थे?
अजनबी को देखकर चौके,
या फिर हँसते रहे,
क्या दूसरे शहर का हाल पूँछा,
या अपने में  खोए रहे,
खैर अपना खयाल रखना,
सुना है वो शहर बड़ा,
शानदार है,
लोग उसकी चमक में खो जाते हैं,
फिर कभी,
अपने शहर,
लौटकर नहीं आते हैं।
rajhansraju

वो??

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उसके मरने से पहले,
ए तसल्ली जरूरी थी,
मरने वाले का मजहब क्या है?
क्यों कि तमाम लोग आज भी,
इंसानियत पर भरोसा करते हैं,
कभी-कभी ऐसे लोगों की,
शक्ल, पोशाक और नाम,
मजहबी खाँचो से मैच नहीं करती।
ऐसे में हत्यारों को बड़ी दिक्कत होती है,
मरने वाला कहीं,
अपनी मजहब का न हो?
फिर जो इनसे पिट रहा,
वह भी,
बड़ा ही जिद्दी है,
वह किस जाति का है,
इसके बारे में कुछ नहीं कह रहा।
इस दरमियान भी,
वह लोगों पर हँस रहा,
वैसे कहता भी क्या?
राम, बुद्ध, ईसा और मूसा,
जब सब वही है,
तब अपना मजहब,
किसको क्या बताए?
ऐसे में यूँ ही चुपचाप,
मर जाना ही सही है।
वैसे भी बंदो को ए पता नहीं है,
उनके हाथों किसका कत्ल हो रहा?
खंजर पर जो लहू लगा है,
किसके बदन से रिस रहा?
जबकि,
सामने कोई और नहीं है,
शक्ल से धोखा खा गया,
गौर से देख तड़प तेरी है,
आँसू और आह में क्या फर्क है?
अब तेरी आँख बंद क्यों है?
खुद को देखना अच्छा नहीं लगता?
क्या अब भी तुझको पता नहीं है,
धीरे-धीरे जो मर रहा है,
वो तूँ है,
कोई और नहीं है।
rajhansraju

जय सियाराम

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राम सबके,
क्यों कि राम हम सब में हैं,
राम को भी यही पता था,
यहाँ सिर्फ इंसान हैं।
पर!!
एक दिन अदालत का सम्मन आया,
तब उनको मालूम हुआ,
जिसका पूरा जहाँ है,
उसके लिए भी,
जमीन का विवाद है।
खैर! अच्छा हुआ,
उनको भी पता चला,
मंदिर-मस्जिद में फर्क है,
इंसान??
इंसान के अलावा बहुत कुछ है,
जिसने सब कुछ बनाया,
उसके लिए?
लड़ने का दावा करते हैं,
पर!
इसके लिए,
पता नहीं क्यों?
खुद को,
हिन्दू-मुसलमान,
कहते हैं।
rajhansraju

आदमी मोबाइल है

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कहता तो यही है कि वो "है"
पर पता नहीं चलता,
हलाकि उनके पास आँख है,
पर देखना नहीं आता,
एकदम कैमरा,
बस click click.
सुना है कान भी है,
पर जो सुनना चाहिए,
वो सुनाई नहीं देता।
smart तो बहुत है,
एक ही कमी है
अपनी अक्ल नहीं है।
अरे वो आदमी नहीं,
पूरा मोबाइल है।
rajhansraju

चाय

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फुर्सत के लम्हों में,
चाय की चुस्की का अपना ही मजा है।
इसी थोड़े से वक्त में दोस्तों के साथ,
किसी बात पर बेमतलब खिलखिला उठना,
सारी थकान का पल में खत्म हो जाना,
फिर अपने काम में, बिना शिकायत 
हँसते हुए लग जाना ....
rajhansraju

यहाँ कौन रहता है?

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सुना है,
वो हर जगह रहता है
उसे मिट्टी-सोने से
कोई फर्क नहीं पड़ता है
पूरी कुदरत वही रचता है
फिर इन शानदार इमारतों में
भला कौन रहता है?
वैसे इन दरवाजों पर
दस्तक भी जरूरी है
लोगों के आने-जाने से,
न जाने कितनों की,
रोजी-रोटी चलती है।
पत्थर तो हर जगह,
बिखरे हैं।
मगर!
कारीगरी का हुनर,
बगैर पैसे के नहीं दिखता।
चलो माना,
खुदा हर जगह है,
मगर जिंदा रहने के लिए,
रोटी कमानी पड़ती है।
rajhansraju

नींव की ईंट

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उसे कोई अफसोस नहीं है,
खुद के दफ़न होने से।
न तो कोई चिढ़ है,
उन ईंटो से,
जो उसके ऊपर हैं,
उन्हीं से बना ढाँचा,
इमारत को आकार देता है।
जिस पर इतना कुछ टिका है,
किसी को कहाँ नजर आती है,
वो नींव की ईंटे।
शायद! कुछ लोग
यह बात समझते हैं,
तभी! बड़े अद़ब से,
बुजुर्गों के सामने,
झुक जाते हैं।
rajhansraju

शहर जिंदा है

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सड़क पर आते जाते,
कुछ यूँ  हुआ कि,
आमने सामने आ गए,
दोनों जल्दी में थे।
एक का रास्ता गलत था,
पहला नाराज हुआ,
उसके गलत होने की शिकायत की,
दूसरा शरीर से मजबूत था,
भड़क गया गाली देने लगा,
जाति धरम की बात आने लगी।
तभी लगा कोई चिंगारी कैसे?
शोलों में बदलती है,
फिर हवा चलती है,
और एक पूरे शहर पर,
बदनुमा दाग लग जाता है।
अच्छा हुआ शहर वाले,
समझदार निकले
दोनों को फटकार लगायी।
ताकत का फैसला करना है,
चलो किसी अखाड़े में कर लो,
कमबख्ततों!
जो हरदम रिसता हो,
शहर को,
वो घाव मत दो,
उसे तकलीफ होती है,
क्यों कि यह शहर,
जिसमें हम रहते है,
जिंदा है।
rajhansraju

नालायक

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वह घर लौट कर आया,
हर तरफ सन्नाटा पसरा है। सभी कुछ अपनी जगह पर,
बड़े सलीके से रखा है।
पिछले हफ्ते कुछ सामान
इस कमरे में छूट गया था,
वह अब भी,
वेसे ही पड़ा है।
भला वह नाराज किससे हो,
जब घर में अकेला हो।
सब कहते हैं,
वह बड़ा खुश नसीब है
उसके सभी बच्चे,
बडे काबिल निकले।
जो उससे दूर,
किसी और शहर में रहते हैं।
सभी सक्षम हैं
किसी को किसी और की,
जरूरत ही नहीं है।
कोई शिकायत करने
सुनने वाला भी नहीं है।
फिर क्यों कुछ सही नहीं है,
एक बाप
और तन्हा उदास हो जाता है
क्यों कि
जो
बच्चे जिद करते
अब साथ नहीं हैं।
ऐसे में तो यही लगता है
काश कोई संतान
थोड़ी सी नालायक होती,
दिन-रात, लड़ता-झगड़ता,
जिद करता,
मगर साथ होता। 
rajhansraju