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Showing posts from 2017

वह पत्थर का है

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हाँ! मैने
बहुत मिन्नतें की,
और लोगों ने भी
तमाम जतन किए
पर! उसने,
न तो कुछ सुना
और न कुछ देखा,
उसकी हर चौखट पर,
बड़ी उम्मीद से गया,
शायद! अबकी
दुआ कबूल हो जाय,
यह दुनिया थोड़ी सी,
उसके लिए हसीन हो जाय,
सारी कोशिश नाकाम रही
कोई तरकीब काम नहीं आयी
वह वैसे ही अपनी जगह कायम रहा
न कुछ देखता है, न सुनता है
इसमें भी उसका कोई दोष नहीं है
आखिर जिसको हमने खुदा कहा है
उसको हमने ही पत्थर से गढ़ा है।
rajhansraju

अग्नि-परीक्षा

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ए भी तो सच है,  बनवास तो राम को हुआ,
पर! बेघर हमेशा सीता हुई,
चाहे वह राधा बनी,
या फिर मीरा हुई,
आग में गुजरना पड़ा,
विष का प्याला उसने पिया,
आँच राम को न लग जाए कहीं,
ए समझकर,
हर काल में जलती रही,
सदा मर्यादा पुरुषोत्तम रहें वो,
सब तजके भी,
हर दम,
राम-राम कहती रही। पर क्या मिला इसका सिला?
अब तो यही लगता है,
उस वक्त बात मानकर,
तुमने अच्छा नहीं किया,
काश!
अग्नि परीक्षा से इंकार कर देती,
या फिर दोनों भाइयों से कहती,
आओ इस आग से तीनों गुजरते हैं,
देखते हैं फिर भला?
कितने कुंदन निकलते हैं,
सवाल जब राम पर नहीं उठा,
फिर सीता पर क्यों उठे?
जो लांक्षन किसी स्त्री पर लगे,
उसीसे भला?
कोई पुरुष क्यों बचे? जब!
वो भी तो हाड मांस का है,
और देह धारण करता हो,
फिर जिस्मानी दोष से,
कैसे बच सकता है? अच्छा होता कि कह देते,
तुम इंसान नहीं हो,
और सीता भी कोई आम औरत नहीं है,
पर तुमको तो मर्यादा पुरुषोत्तम बनना था,
जिसके लिए सब कुछ,
सीता को सहना था।
वो चुप रहकर  सहने वाली सीता,
सबको भाती है,
घरों में आज भी सबके,
तुम्हारे साथ पूजी जाती है।
अब भी वही आदर्श मानते हैं,
अपनी आवाज में बोलने वाली औरत,
क…

निकम्मा😀😀

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यूँ खुश होकर,  तालियाँ मत बजाओ,
यहाँ सवाल खुद को, 
पाने और खोने का है,
दर्द ए है कि खुद के मरने का, 
मातम भला कैसे मनाए?
जबकि अब भी,
गरदन बहुत कसके दबी है,
मुँह टेढ़ा हो गया है,
और जीभ ऐंठ गयी है,
सिर्फ एक ही कमी है
मरने वाली feeling नहीं दिखती,
कमबख्त शक्ल ही ऐसी है,
लगता है हँस रहा,
वैसे ही जैसे बिना चेहरे वाले,
कंकाल होते हैं,
जो चेहरों पर हंसते है,
वो न तो अपना,
न तो दूसरों का चेहरा देखते हैं,
अब उन्हें ए मालूम है,
असल में जो है,
उसमें आँख नहीं है,
और चेहरों में कोई फर्क नहीं है,
अब वह चेहरे के साथ भी हंसता है
हश्र चेहरे का,
उसने, जबसे जाना,
उसके चेहरे पर,  अनायास हंसी रहने लगी,
उसके यूँ हँसते रहने पर,
उस पर बेहया होने का इलजाम,
लगता है,
कैसा निकम्मा है,
देखो,
अब भी,
कैसे हँस रहा है। 😁😁😁😁😁
rajhansraju

धागों का इंद्रधनुष

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धागों का, टूटना और छूटना,
कभी चटक जाना
कभी छटक जाना
फिर उन्हें समेट लेना
पूरा धागा बना लेना
उसका एक सिरा,
कभी कसके पकड़ लेना, किसी गाँठ का पड़ जाना, किसी वजह से कुछ उलझ जाना, ऐसे में एक दूसरे को, थोड़ा वक्त देना,
बस! किसी उंगली से थाम लेना,
ए उम्मीद की डोर,
जो अब भी बंधी है,
उसके किसी उंगली में,  हो सकता है, सिर्फ फॅसी हो,  जबकि दूसरा सिरा,
अब भी मेरी तरफ है,
तो इसकी वजह यही है,
ए डोर अब भी कायम है।
वैसे भी जो कच्ची मिट्टी,
कच्चे धागे से बना हैं,
उनके कुछ भी बनने का सिलसिला,
कभी खत्म नहीं होता,
उसे तो सिर्फ वो कुम्हार, 
वो जुलाहा चाहिए, 
जो उसे गढ़ दे,
और रंगो से ऐसे रंग दे, बस यूँ ही,
हर बार नया हो जाए,
शायद! इसी इंतजार में,
वह एक सिरे पर,
बिना रंग, बिना धागे के,
खाली हाथ बैठा रहा।
जबकि दूसरे सिरे पर,
आज उसके हाथ में,
इंद्रधनुष है,
हालाँकि,  उसे इस बात की उम्मीद नहीं थी, कोई रंग आकर उसे छू लेगा, वह आज सतरंगी हो जाएगा,
पर ए भी सच है!
सुबह अपनी कलाई पर,
उसने "छः रंग"
खुद ही बाँधे थे, बस एक की कमी थी। rajhansraju

बे-चेहरा

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हलाँकि,
उसे यही लगता है,
उसने मुझे,
ऐसो आराम का हर सामान दिया है,
मुझे महफूज रखने की सारी व्यवस्था की है,
और लोगों से,
मुझे समझने का दावा करता है,
ए लिबास और दीवार,
मेरे लिए तो है,
देखो कितनी खूबसूरत है,
ए जंजीर सोने की है,
इसमें हसीन पत्थर जड़े हैं,
सब कुछ बहुत कीमती है,
मुझको सर से पाँव तक,
हर तरह की रंगीन बेडियों से जकड़ा है,
जिसे कभी कोई लिबास, जेवर,
या कुछ और कह देता है,
उसका दावा अब भी यही है,
वह,
मेरे सहूलियत,
मेरे हक की बात करता है,
ए और है कि उसने कभी,
मेरी आवाज नहीं सुनी,
मुझे सिर्फ बुत समझते रहे,
और मै,  बिना किसी पहचान के,
हरदम बेचेहरा रही,
rajhansraju

खोटे सिक्के- बाजार में

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मेरी जरूरत का हर सामान
बाजार में मिलता है,
दुकानों में क्या कुछ नहीं है,
इंसानी शक्लों की पूरी तह लगी है,
खरीदने, बेचने और बिकने वाले,
हर जगह,
जैसे एक ही आदमी हो,
कौन, किस तरफ, क्या है?
कुछ भी समझना,
बहुत मुश्किल है।
तभी अलग शक्ल लिए,
कुछ लोग,
दुकान की चौखट पर आए,
अपने खास होने का,
एक अजीब सा उलझा हुआ,
कुछ?  यकीन जैसा लगा? जैसे खुद को थोड़ा बहुत पहचानते हों,
पर यह क्या?
दुकान का दरवाजा खुलते ही,
उसकी चमक ने सबको,
अपनी आगोश में ले लिया,
ऐसे ही, जो भी यहाँ आया,
अपनी सूरत खोता रहा,
जिसकी पहली शर्त यह है,
इसकी कीमत,
उसे खुद ही चुकाना है,
असली काम?  जिनके जेब में सिक्के है,
उन्हें दुकान तक लाना है।
जबकि, अब भी उसे अपनी जरूरत का,
ठीक से अंदाजा नही है,
बस वह खरीद सकता है,
इसलिए खरीदता रहता है।
ऐसे में कभी-कभी लगता है,
शायद!  वो ज्यादा खुश नसीब हैं,
जो बाजार से,
अक्सर?
खाली हाथ लौट आते हैं,
या तो उनको ए बाजार
समझ नहीं आता,
या फिर एकदम कड़के हैं,
मतलब इनकी जेबें खाली हैं,
जिसमें शायद!
इनकी पूरी मर्जी नहीं है,
पर ऐसे ही,
कुछ अपनी सूरत के साथ,
बचे रह जाते हैं।
शायद! थोड़े जिद्दी हैं, 
या फिर…

बेनाम, लावारिस, .... कत्ल?

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चर्चा तो यहाँ भी है कत्ल का
जो कि नया नहीं है
हलांकि ए कत्ल किसने किया?
इसका कोई चश्मदीद नहीं है,
उसको किसी और ने मारा
या फिर वह खुद ही कातिल था
ए किसी को पता नहीं है।
सच ए है कि
वो जिंदा नहीं है,
यकीनन कत्ल तो हुआ है।
इसमें कोई शक नही है,
ऐसे ही मुर्दों के मिलने का सिलसिला
न जाने कब से चलता रहा।
ए बिना नाम
बिना पहचान के लोग।
अरे! नहीं!
ए पूरा सच नहीं है
इनका भी घर है
बस थोड़ा सा ढूँढना है
न जाने कितनो का
अब भी कोई पता नहीं है
कैसे किस हाल में होंगे
पर! अक्सर गुमनाम, लावारिस, बेजान
जो किसी को नहीं मिलते
यूँ ही धीरे-धीरे गुम हो जाते हैं
उन्हें न तो श्मशान मिलता है
और न ही कब्रिस्तान,
उनके जाने की
किसी को खबर नहीं होती,
कोई मातम भला कैसे होगा?
वो जिस घर का शख्स है,
इससे अनजान,
उसके इंतजार में रहता है,
यह उम्मीद अच्छी है कि बुरी,
क्या कहें?
पर! उसके होने का भरोसा
सब में,
बहुत कुछ जिंदा रखता है।
आज बहुत कुछ टूटा,
घर के हर शख्स में
कुछ खाली सा हो गया।
क्या जरूरत थी
जो उसके जाने के वर्षों बाद
किसी लावारिस के शिनाख्त की,
उसके घर वालों की,
वो जो लौटने की
उम्मीद थी
अब,
सदा के लि…

शब्द जो हमने गढ़े हैं

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जो स्वाभाविक है
उसे ही तो होना है
ए खुद का अल्फाज बनकर,
किसी कागज पर बिखर जाना,
कुछ ऐसा ही है।
जहाँ अलग से कोई प्रयास नहीं होता,
ए जो,
कुछ खाली खाली सा है
उसी में खुद को
भर देता है।
किसी के वक्त का,
एक कतरा नहीं लेता,
वह तो सिर्फ खाली लम्हों को,
खामोशी से,
न जाने कौन सी,
जुबान दे जाता है।
जो उसके परतों की ही खोलते हैं,
सब कुछ बयाॅ करके भी,
न जाने कैसे?
उन परतो को भी बनाए रखते हैं।
ए कुछ सुबह की नींद जैसी है,
जब वह जाग कर भी,
बिस्तर नहीं छोड़ पाता,
सुबह को इंकार करने की चाहत तो है,
मगर ए सूरज बहुत हठी है,
भोर होते ही,
सबसे आँख मिलाता है,
जो काले शब्द पूरी रात,
हमने गढे,
हर एक का मतलब,
बताता है।
ए शब्दों का अजब खेल है,
इसे चुपचाप खेलना है,
पर! सूरज ने उंगली पकड़ कर
जो समझाया,
वो किसी से नहीं कहना है,
और शब्दों को यूँ ही मजे से,
गढ़ते रहना, 
यह तो नशा-ए-लुत्फ है
जिसको पाने के लिए,
न तो कुछ देना है,
और कहीं जाना भी नहीं,
बस दौर-ए-जिंदिगानी की तमाम,
परीक्षाओं को हँसकर बिता देना है,
जो महज,
आगे बढ़ने का फलसफा है,
ए तो चंद शब्दों में,
खुद को दर्ज करने का तरीका है,
जो कभी किसी …

इच्छाधारी

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इच्छाधारी नाग-नागिन की कहानियाँ,
तो हम सबने सुनी है,
जिसमें वो कोई भी रूप धारण कर लेते,
बचपन!
अगर गाँव में बीता हो तो,
सिनेमा वाला दृश्य, 
हर जगह मौजूद होता है,
बस कल्पना को,
डर वाली कहानियों के रंग से भरना है,
ऐसे ही साँप से डरने पूजने,
और मौका मिलते ही,
मार देने का,
अजब व्यवहार करते रहे,
इसमें किसी के लिए कुछ भी गलत नहीं,
हर आदमी अपनी आस्था और कहानी गढ़ता है,
पर साँप का जहर?
बड़ा अजीब है,
जो उसकी पहचान है
इंसान उसी से डरता है,
इसी डर से,
तमाम विषहीन साँपो,
की जान खतरे में पड़ जाती है,
क्यों कि हमको पता नहीं चलता,
किसमे जहर नहीं है,
अक्सर इस अफरा तफरी में,
बिना जहर वालों की जान चली जाती है,
उनका सांप होना,
उनके लिए सजा बन जाती है।
खैर! अब तो शहर का जमाना है
पर साँप के होने पर संदेह नहीं करना,
आस-पास हमारे,
अब सिर्फ,
इच्छाधारी रहते हैं,
जो हर वक्त रंग बदलते हैं,
हमारे ही आस्तीनों में रहते हैं,
जो खुद बीन बजाता है,
दूध पूरा पी जाता है।
उन सीधे साधे साँपो को,
नाहक बदनाम करता है,
जो बिना कान का,
जिसमें विष भी नहीं है,
सारा इल्जाम उस पर लग जाता है,
जबकी उस तक बीन की आवाज,
ज…

कितना समझता है?

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कहीं कुछ भी तो नहीं है
जो तुझसे जुदा हो
यहाँ वहाँ जो भी बिखरा है
या हाथ में
सिमटा है,
जिसे अपना,
या किसी और का,
कहता है।
ए सिर्फ दायरा है
जो बताता है
कौन कितना समझता है।
पर उमने जो बनाया है
वह किसी एक का तो नहीं है,
और सिर्फ लेना ही?
मेरा काम तो नहीं है
शायद! हकीकत कुछ और है
जिसे हम देखना नहीं जानते,
जबकि मै भी उसी की रचना हूँ
जिसमें वह व्यक्त होता है
जैसे नदी और पहाड़ वह गढ़ता है
फिर हमारी आँखों से सब देखता है
कुदरत में सारे रंग भरता है,
उसके आगे दुनिया में,
कोई नहीं जा पाता है।
तब भी,
कुछ लोग,
अपनी समझ का दावा करते हैं,
किस से क्या जुदा है,
ए बताते फिरते हैं,
जबकि हकीकत ए है,
कौन किससे बना है,
और कितना गहरा है,
कभी पता,
चलता नहीं है।
rajhansraju

तूँ नदी है

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बस यही करना है, जो कुछ?
अच्छा या बुरा हुआ,
उसे भुला कर,
कत्ल न तो करना है,
और न होना है।
फिर जो दरिया है,
वो भला क्या डूबेगा?
कभी कुछ वक्त के लिए,
नदी भी समुन्दर बन जाती है,
तो वह सिर्फ,
पानी की ताकत बताती है,
ऐसे में कुछ नहीं करना है,
बस किनारों को,
थामकर रखना है,
ए दोनों तेरे अपने हैं,
इन्हीं के बीच रहना है,
अभी बरसात का मौसम है,
ए भी गुजर जाएगा,
तूँ फिर वही नदी हो जाएगा,
जो सबकी प्यास बुझाती है।
फिर क्यों इतना परेशान है?
जो अपनी प्यास बुझाने को,
इधर उधर भटकता है,
जबकि तूँ... खुद नदी है,
पानी से बना है
लबालब भरा है।
जिसे दर बदर ढूँढता फिर रहा है,
वो कहीं और नहीं है?
बस थोड़ा चुप बैठ,
गौर से देख,
अब सुन,
जो तुझसे कुछ
कह रहा है।
कमबख्त!
वह कोई और नहीं है,
तेरा ही कुछ है,
जो तुझमें टूट गया है,
अब भी जुड़ना चाहता है,
कब से कह रहा है,
पर! तूँ कहाँ?
सुनना चाहता हैं?
बस चुप रहकर,
उसे महसूस करना है,
तूँ दरिया है,
ए किसी से कहना,
थोड़ी पड़ता है।
rajhansraju

कुछ बात तो है

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मै यूँ ही नहीं हूँ,  जो हर बार उठ खड़ा होता हूँ
कुछ बात हममें जरूर है,
जो बढ़के एक दूसरे को थाम लेता हूँ।
जब आग लगती है बस्ती में,
तो मै भी डरता हूँ,
अपनों की फिक्र में,
हर वक्त रहता हूँ,
ऐसे में सिर्फ,
घर की छप्प़र नजर आती है
दूर उठती चिंगारी,
एक दूसरे के भरोसे को
अजमती है,
कभी-कभी य़कीं करने पर
डर भी लगता है,
मगर वह शख्स,
"हूबहू"
मेरे जैसा है।
वैसे हमारे पास वो ताकत नहीं है,
कि हम हवाओं का रुख बदल दें,
और गंगा यहीं से बहने लगे,
बस इतना जानता हूँ,
हार नहीं मानता हूँ,
घास फूस की एक छत फिर ड़ालूँगा,
क्यों कि मेरे जैसों की तादात कम नहीं है,
और चिंगारियों से उनका वास्ता भी नहीं है,
हाँ! ए सच है,
आग से लड़ना हमें नहीं आता,
पर! शायद! 
उन लोगों को पता नहीं है,
हमें बुझाने की तरकीब मालुम है,
बस एक दूसरे के साथ खड़े है,
और छोटे-छोटे बरतनों में
कुछ भर रखा है।
हमारे सभी घर एक जैसे हैं,
और पानी में फर्क नहीं है।
जब सभी घरों से,
ए बूँद-बूँद कर रिसती है,
तब दरिया बनने में, देर कहाँ लगती है,
फिर उठता हूँ, जुड़ जाता हूँ
नए पत्तों के साथ, हरा-भरा हो जाता हूँ,
मै कटता हूँ, मै …

काफिर?

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अगर वह सिर्फ तेरा है,
तो मुझको ए बता,
मेरा वाला कौन है,
तुम्ही तो कहते हो,
सब उसकी मर्ज़ी है,
फिर मेरा होना,
क्यों खटकता है,
हाँ मै काफिर हूँ,
किसी बुत के आगे,
नहीं झुकता,
पर दोस्त तुम्हें पता है,
मेरी तस्वीर,
बंदूक से नहीं बनती,
उसका रंग लाल नहीं है..
rajhansraju

तेरा हिस्सा है

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बुजुर्ग दोस्तों ने,
आज के हालात पर,
नाखुशी जाहिर की।
ए क्या हो रहा है?
वो कौन है जो हर तरफ,
जहर भर रहा है?
वह तो एक है,
जिसका नाम हमने,
अलग-अलग रखा हैं।
आँख खोलकर देख,
कहाँ कौन रहता है?
पर ए तो समझ ले
देखना कहाँ, क्या है?
बस मौन रहकर,
खुद में झाँकना है।
अब .. जरा गौर से देख,
कहीं से कोई आया नहीं है,
और कोई आएगा भी नहीं,
यही समझना है,
जिस से लड़ रहा है,
कोई और नहीं "तूँ" खुद हैं,
बस यकीन करना है,
जिसे गैर समझकर नफरत करता हैं,
वो तेरे बदन का हिस्सा है,
बस तेरी सियासत कुछ ऐसी है,
जो कुछ और बात कहती है,
काटके फिर बाँट के टुकड़ों में,
सब पर राज करती है,
लोगों को ऐसे ही जाति धरम पर
यकीं हो जाता है,
फिर किसी और की खातिर,
तूँ कभी हिन्दू,
कभी मुसलमान,
हो जाता है।
rajhansraju

कहानी है!

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वह खास अंदाज से अपनी बात कहता रहा,
धीरे-धीरे उसकी कहानियों पर यकीं होने लगा,
अब उसके अलावा कोई चर्चा नहीं होती,
कहानी वाला सच हर तरफ बिखरा है,
कुछ और जानने की जरूरत नहीं है
क्यों कि जो सच है,
इतना हसीन नहीं है
फिर वो ख़ाब से क्यों जागे?
और किसी के खाब को,
झूँठा कह दे?
चलो कुछ तो है,
जिसके लिए,
उसे नींद आ जाती है,
उन्हीं कहानियों के सपने,
अपने हिसाब से बुन लेता है,
ऐसे ही पूरे दिन की थकान,
बस! एक नींद से
मिटा देता है।
rajhansraju

रहने दो

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अब जो लोग बातें कर रहे,
या कुछ और कर रहे हैं,
उनमें ज्यादातर,
अंदर से एकदम खाली हैं।
उनके पास देने के लिए,
कुछ भी नहीं है।
ऐसे में नफरत और गाली,
के जवाब में,
वही वापस लौट आती हैं,
सब गंदा नजर आने लगता है।
चलो कुछ बात करते हैं,
अरे! तुम खाली हो,
ए बताने की जरूरत क्या है?
तुम्हें कुछ ठीक करने की,
जरूरत भी नहीं है।
बस चुप हो जाओ,
ए गंदगी,
अपने आप,
कम हो जाएगी।
rajhansraju

लेखा-जोखा

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लेखा जोखा बड़े गौर से देखा,
नफ़ा नुकसान एक खेल है,
तेरा अच्छा होना,
तेरे लिए ठीक नहीं है।
क्यों कि तेरा कोई मोल नहीं है
तूँ बाजार के लायक नहीं है,
फिर जो बिकता नहीं,
सच में बेकार है।
वैसे खरीदार कौन है,
ए ठीक से पता नहीं है,
सभी एक जैसे,
लम्बी कतार में,
कैसे भी?
कुछ मिल जाएँ,
बिकने को तैयार हैं।
rajhansraju

एक माँ एक बेटा

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यह एक प्यारे से बच्चे की कहानी है
शायद उसे डाट कम पड़ी
या प्यार बहुत मिला
जिसकी वजह से उसमें
एक ऐब आ गया।
वह पानी किसी और चीज को
समझने लग गया।
माँ जिसे वह बुढ़िया कहता है
वह भी बेटे पर हद से
ज्यादा यकीन करती है।
बेटे को भी अपना रोग मालूम है,
ऐसे में वह भी न जाने खुद को
कहाँ-कहाँ ढूँढता रहता है।
जब फुर्सत से किसी आइने में
खुद को देखता है
तो हर बार उसका अक्श
यही जवाब देता है- 
तूँ पूरा है इसका यकीन कर,
खुद की तलाश में,
कुछ और हो जाना,
क्या ठीक है?
कौन किसको पी रहा,
ए कहाँ पता चलता है?
सच कहूँ तेरा हारना
एक जाम से
अच्छा नहीं लगता।
तेरे पास तो वो
चाँद वाली बुढ़िया भी है,
जो अब भी तेरे पास रहती है
तुझमे भी तो जिंदगी का
भरपूर नशा है,
फिर तुझे
इन मामुली चीजों की जरूरत
क्यों पड़ती है?
अच्छा है!
तुझे मालूम है
तूँ जिंदा है
जानते हो क्यों?
किसी की उम्मीद हो,
नाज  हो तुम,
अरे! लगता है ..
अपनी बुढ़िया के
आसपास
हो तुम।
बस उसकी सूरत देखकर
खुद से पूँछो
कौन किसको देखकर
जिंदा है अब?
क्या कहूँ देखकर इनको,
अब भी यही लगता है
सबसे मुश्किल काम है,
माँ-बाप होना।
rajhansraju

कातिल?

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अरे!! जरा गौर से देखो कातिल कौन है?
कहीं तुम्हारे हाथ में ही खंजर तो नहीं है?? अब सबको यकीन हो गया है,
जिसका कत्ल हुआ है,
वही कातिल है,
अगर ऐसा नहीं होता,
तो गुनहगार पकड़े जाते,
उन्हें सजा होती।
हमारे यहाँ नारों का अजब चलन है,
जो ए जाति, धरम वाला झंडा है,
एक बड़े से खंजर में लटकता है,
वो हमें नजर नहीं आता,
जिसे हमने खुद थाम रखा है,
हम बड़े ही शातिर, बदमाश हैं,
जमके मातम भी मना लेते हैं,
कुछ आदत ही ऐसी है,
जल्द ही सब भूलकर,
फिर किसी झंडे को,
थाम लेते हैं।
rajhansraju

इंतजार

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उनका क्या दोष है,
जो सिर्फ माँ-बाप है,
हर बार उनके हारने की,
रश्म चल पडी है
पिछली बार भी,
जो जनाज़ा निकला था,
वह उन्ही के बेटे का था,
और इस बार भी,
न जाने यह दौर,
कितना और लम्बा चलेगा,
फिर मरने वाले का,
कोई मज़हब तो रहेगा ही,
लोग ऐसे ही उसका तमाषा बना देंगे,
अगली लाश?
कहीं किसी और की होगी,
कोई फौज़ी होगा, कोई काफिर होगा,
कैसा भी होगा?
इसी मिट्टी का बना होगा,
वही गम होगा, वही आँसू होंगें,
वैसा ही घर सूना होगा,
फिर कौन?
किसका इंतज़ार करेगा?
इन हारे माँ-बाप को,
भला कौन?
याद रखेगा..
rajhansraju

मुसाफिर

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अरे मुसाफिर ए बता,
क्या तूँ उसी शहर में है?
जहाँ के लिए निकला था,
सफर कैसा रहा?
राह कैसी थी?
कितने शहर गुजरे,
क्या वो तेरे शहर जैसे थे,
या कुछ और थे?
अजनबी को देखकर चौके,
या फिर हँसते रहे,
क्या दूसरे शहर का हाल पूँछा,
या अपने में  खोए रहे,
खैर अपना खयाल रखना,
सुना है वो शहर बड़ा,
शानदार है,
लोग उसकी चमक में खो जाते हैं,
फिर कभी,
अपने शहर,
लौटकर नहीं आते हैं।
rajhansraju

वो??

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उसके मरने से पहले,
ए तसल्ली जरूरी थी,
मरने वाले का मजहब क्या है?
क्यों कि तमाम लोग आज भी,
इंसानियत पर भरोसा करते हैं,
कभी-कभी ऐसे लोगों की,
शक्ल, पोशाक और नाम,
मजहबी खाँचो से मैच नहीं करती।
ऐसे में हत्यारों को बड़ी दिक्कत होती है,
मरने वाला कहीं,
अपनी मजहब का न हो?
फिर जो इनसे पिट रहा,
वह भी,
बड़ा ही जिद्दी है,
वह किस जाति का है,
इसके बारे में कुछ नहीं कह रहा।
इस दरमियान भी,
वह लोगों पर हँस रहा,
वैसे कहता भी क्या?
राम, बुद्ध, ईसा और मूसा,
जब सब वही है,
तब अपना मजहब,
किसको क्या बताए?
ऐसे में यूँ ही चुपचाप,
मर जाना ही सही है।
वैसे भी बंदो को ए पता नहीं है,
उनके हाथों किसका कत्ल हो रहा?
खंजर पर जो लहू लगा है,
किसके बदन से रिस रहा?
जबकि,
सामने कोई और नहीं है,
शक्ल से धोखा खा गया,
गौर से देख तड़प तेरी है,
आँसू और आह में क्या फर्क है?
अब तेरी आँख बंद क्यों है?
खुद को देखना अच्छा नहीं लगता?
क्या अब भी तुझको पता नहीं है,
धीरे-धीरे जो मर रहा है,
वो तूँ है,
कोई और नहीं है।
rajhansraju

जय सियाराम

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राम सबके,
क्यों कि राम हम सब में हैं,
राम को भी यही पता था,
यहाँ सिर्फ इंसान हैं।
पर!!
एक दिन अदालत का सम्मन आया,
तब उनको मालूम हुआ,
जिसका पूरा जहाँ है,
उसके लिए भी,
जमीन का विवाद है।
खैर! अच्छा हुआ,
उनको भी पता चला,
मंदिर-मस्जिद में फर्क है,
इंसान??
इंसान के अलावा बहुत कुछ है,
जिसने सब कुछ बनाया,
उसके लिए?
लड़ने का दावा करते हैं,
पर!
इसके लिए,
पता नहीं क्यों?
खुद को,
हिन्दू-मुसलमान,
कहते हैं।
rajhansraju

आदमी मोबाइल है

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कहता तो यही है कि वो "है"
पर पता नहीं चलता,
हलाकि उनके पास आँख है,
पर देखना नहीं आता,
एकदम कैमरा,
बस click click.
सुना है कान भी है,
पर जो सुनना चाहिए,
वो सुनाई नहीं देता।
smart तो बहुत है,
एक ही कमी है
अपनी अक्ल नहीं है।
अरे वो आदमी नहीं,
पूरा मोबाइल है।
rajhansraju

चाय

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फुर्सत के लम्हों में,
चाय की चुस्की का अपना ही मजा है।
इसी थोड़े से वक्त में दोस्तों के साथ,
किसी बात पर बेमतलब खिलखिला उठना,
सारी थकान का पल में खत्म हो जाना,
फिर अपने काम में, बिना शिकायत 
हँसते हुए लग जाना ....
rajhansraju

यहाँ कौन रहता है?

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सुना है,
वो हर जगह रहता है
उसे मिट्टी-सोने से
कोई फर्क नहीं पड़ता है
पूरी कुदरत वही रचता है
फिर इन शानदार इमारतों में
भला कौन रहता है?
वैसे इन दरवाजों पर
दस्तक भी जरूरी है
लोगों के आने-जाने से,
न जाने कितनों की,
रोजी-रोटी चलती है।
पत्थर तो हर जगह,
बिखरे हैं।
मगर!
कारीगरी का हुनर,
बगैर पैसे के नहीं दिखता।
चलो माना,
खुदा हर जगह है,
मगर जिंदा रहने के लिए,
रोटी कमानी पड़ती है।
rajhansraju

नींव की ईंट

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उसे कोई अफसोस नहीं है,
खुद के दफ़न होने से।
न तो कोई चिढ़ है,
उन ईंटो से,
जो उसके ऊपर हैं,
उन्हीं से बना ढाँचा,
इमारत को आकार देता है।
जिस पर इतना कुछ टिका है,
किसी को कहाँ नजर आती है,
वो नींव की ईंटे।
शायद! कुछ लोग
यह बात समझते हैं,
तभी! बड़े अद़ब से,
बुजुर्गों के सामने,
झुक जाते हैं।
rajhansraju

शहर जिंदा है

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सड़क पर आते जाते,
कुछ यूँ  हुआ कि,
आमने सामने आ गए,
दोनों जल्दी में थे।
एक का रास्ता गलत था,
पहला नाराज हुआ,
उसके गलत होने की शिकायत की,
दूसरा शरीर से मजबूत था,
भड़क गया गाली देने लगा,
जाति धरम की बात आने लगी।
तभी लगा कोई चिंगारी कैसे?
शोलों में बदलती है,
फिर हवा चलती है,
और एक पूरे शहर पर,
बदनुमा दाग लग जाता है।
अच्छा हुआ शहर वाले,
समझदार निकले
दोनों को फटकार लगायी।
ताकत का फैसला करना है,
चलो किसी अखाड़े में कर लो,
कमबख्ततों!
जो हरदम रिसता हो,
शहर को,
वो घाव मत दो,
उसे तकलीफ होती है,
क्यों कि यह शहर,
जिसमें हम रहते है,
जिंदा है।
rajhansraju

नालायक

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वह घर लौट कर आया,
हर तरफ सन्नाटा पसरा है। सभी कुछ अपनी जगह पर,
बड़े सलीके से रखा है।
पिछले हफ्ते कुछ सामान
इस कमरे में छूट गया था,
वह अब भी,
वेसे ही पड़ा है।
भला वह नाराज किससे हो,
जब घर में अकेला हो।
सब कहते हैं,
वह बड़ा खुश नसीब है
उसके सभी बच्चे,
बडे काबिल निकले।
जो उससे दूर,
किसी और शहर में रहते हैं।
सभी सक्षम हैं
किसी को किसी और की,
जरूरत ही नहीं है।
कोई शिकायत करने
सुनने वाला भी नहीं है।
फिर क्यों कुछ सही नहीं है,
एक बाप
और तन्हा उदास हो जाता है
क्यों कि
जो
बच्चे जिद करते
अब साथ नहीं हैं।
ऐसे में तो यही लगता है
काश कोई संतान
थोड़ी सी नालायक होती,
दिन-रात, लड़ता-झगड़ता,
जिद करता,
मगर साथ होता। 
rajhansraju

तूँ वो नहीं है

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आज
कई दिनों बाद
आइना देखा
हाँ! पहचानता हूँ
शक्ल तो तकरीबन 
वैसी ही है
जैसा देखा था
फिर यकीन क्यों नहीं होता?
अब भी लग रहा
तूँ वो नहीं है..

a temple in the moll

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इमारत बहुत ही शानदार
आसमान तक ऊँची है,
भव्यता, ऐश्वर्य
कोई मामुली चीज नजर आती है।
सब कुछ सोने की तरह,
महिमा मंडित हो रहा है,
इतनी ज्यादा रोशनी है कि,
कुछ नजर नहीं आता।
राधे राधे की आवाज हर जगह है,
पर यह कान्हा की पुकार तो नहीं है।
भला कृष्ण, राधा को
इतनी बार आवाज क्यों देंगे?
जबकि कान्हा से ही राधा बनी है,
और राधा में पूरे कृष्ण बसते हैं,
इस चमक दमक में,
जमुना की माटी और पानी नहीं है,
मेरे कान्हा की,
कोई निशानी नहीं है।
यहाँ सबकुछ है,
बस कान्हा नहीं है।
rajhansraju

बेमकसद

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जब वह
कहीं खामोशी से बैठे होता हैं,
उनको लगता है
वो बेमकसद और बेकार हैं,
तब काम आती है
हुनर आवारगी की,
वह निकल पड़ता है
अनजानी राहों पर,
भटकता रहता है,
उसे भी पता नहीं होता,
वह रोज क्या ढूँढता रहता है?
इन रास्तों से लौटना नहीं चाहता,
पर क्या करे थक जाता है,
क्यों कि कुछ मिलता नहीं है,
फिर वही पछतावा क्यों निकला घर से।
जब सब कुछ पास में होता है,
वह नजर नहीं आता है,
जिस चीज को आदमी बाहर ढूँढता है,
वह अंदर बेकार पड़ी है,
थोड़ा सुकून से बैठो,
इतनी जल्दी भी क्या है?
गौर से देखो
इस वक्त पास में क्या है?
तूँ है!
तूँ जिंदा है!
ए एहसास
बहुत है।
rajhansraju

कौन किसको पी गया?

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मैंने देखा है,
दोस्त को फ़ना होते,
उसको जाते,
घर वालों को विदा करते,
कौन किसको पी गया,
किससे क्या कहूँ?
आज भी,
उसके जैसा,
जब किसी को देखता हूँ,
बेब़स, उदास हो जाता हूँ,
उसको याद करके।
मेरे सामने होता है,
वो चेहरा आज भी,
हाँ! नाराज था,
पर ए नहीं सोचा था,
इसके बाद,
अब मिलना नहीं होगा कभी।
उसके जाने का वक्त था,
हमारी नजरें मिली,
एक दूसरे से,
कुछ छुपाया हमने,
आँसू थे,
आँख में हमारे,
अब नस़ीहत नहीं थी कोई,
बस यही कहना था,
यूँ  मत जाओ,
सबको छोड़कर।
वह मुस्करया,
जैसे कहना चाहता हो,
कहीं नहीं जाऊँगा,
किसी को छोड़कर।
हाथ थामे बैठे रहे बहुत देर तक,
जो बहुत बोलता था,
आज कुछ कह न सका,
खामोश ऐसे हुआ,
जैसे कुछ जानता नहीं,
कंधे पर बैठकर हमारे,
न जाने क्यों रुखसत हुआ?
अब भी यही सोचता हूँ,
किससे क्या कहूँ?
कौन किसको पी गया?
अब तक समझ पाया नहीं ..
rajhansraju

मेरा शहर

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कितना मुश्किल है
खुद को बचाए रखना,
खासतौर पर उन परिंदे को
जिनमें थोड़ी गोश्त होती है,
हमारे शहर भी कुछ ऐसे ही हैं,
जो अब भी इंसान की तरह जीते हैं,
तभी तो उनके  नाम बदल जाते हैं,
और उसका कत्ल भी होता है,
उसका लहू बहता है, मातम पसर जाता है,
उसके श्मशान बन जाने का शोर भी होता है,
सुना है आज वो मर गया,
जिसके जश्न की खबर भी छपी है,
वह किसी गैर मजहब या बिरादरी का शहर था,
उसमें अब भी कुछ गोश्त बाकी है,
शायद इस वजह से,
धमाके कुछ रुक-रुक के हो रहे हैं,
दूसरे शहर के लिए नारे लग रहे हैं,
अब यहाँ पूरी खामोशी है,
कहते हैं अमन कायम हो गया,
पर वो शहर अब नहीं रहा,
कुछ भी सही सलामत नहीं है,
जो जिस्म जिंदा हैं,
वो पूरी तरह खाली है,
उनके सामने पूरा शहर मर गया,
और न जाने कितनों का वजूद भी खत्म हो गया,
शहर कभी तन्हा नहीं होता,
वह अपने हर शख्स के साथ रहता है,
तभी तो जब कोई किसी दूसरे शहर जाता है,
उसकी पहचान में उसके शहर का नाम आता है,
अब हम हर उस शहर के लिए दुआ करते हैं,
जो पूरा जिस्म है
जिसकी सांसे चल रही है,
उससे मिलना तो बस यही कहना,
तेरे चाहने वालों की अब भी कमी नहीं है…

Delhi=Bangaluru

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शर्म के सिवा सब है
फक्र करने की वजह
क्या अब भी बची है?
अब किसी के मजहब का
जिक्र मत करना
बेहयायी में
सब एक जैसे हैं
कफन ओढ ली है
जमीर मरे
एक अर्षा हो गया।
फिर वजह का जिक्र होगा
कोई सियासत, कोई मजहब का,
अजीब सा वजूद गढ़ रहा होगा।
ए सही है यही होगा
ठेकेदार चिल्ला रहा होगा
फिर जो सबसे कमजोर होगा
सारा इल्जाम उसी पर लगेगा
बहुत होगा
कुछ देर शोर मचेगा
जल्द ही
बोर हो जाएंगे
सब भूल जाएंगे
उसी मरे ज़मीर में
लौट जाएंगे।
Rajhansraju

तूँ कैसा है?

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रंग तेरा आसमनी है
हमको लगता है
दिन-रात के साथ तूँ बदलता है
चटख लाल, काला भी दिखता है
बेरंग रहकर रंगों को रचता है।
चलो हम भी एक काम करते हैं
उसकी बनायी दुनिया में
खूबसूरत रंग भरते हैं
थोड़ा नाराज होकर साथ चलते हैं
अच्छा होता है बेवजह मुस्करा लेना
रंग से सरोबार होकर
चेहरों को भुला देना
किसकी शक्ल कैसी है
परेशाँ क्यों है?
वैसे भी तूँ
न तो पानी है
न आइना है।
थोड़ा सा रंग हाथों में लेकर
सबसे पहले अपना चेहरा भुला दे
फिर धुलकर देखना क्या मिलता है
पहले जैसा कुछ बचता है?
या वही बेरंग चेहरा है
जिस पर कोई रंग चढ़ता नहीं है
rajhansraju

मै हूँ

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सच सिर्फ इतना है
मेरे नाकाम होने का
मै जैसा हूँ,
हर बार वैसा ही होता हूँ,
मेरा रंग,
नहीं बदलता गिरगिट की तरह
छुप नहीं पाता हूँ
औरों की तरह
क्या करूँ मै
सिर्फ दिखता ही नहीं हूँ
अब तलक इंसान हूँ
rajhansraju

सब एक जैसे हैं

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सोचता हूँ
रहने दूँ दफ्न उनको
या पड़ा रहूँ अपनी कब्र में
मगर क्या करूँ?
एक एहसास कायम है
यह भी लगता है
अभी तक जिंदा हूँ
और उसकी भी साँस
चल रही है
rajhansraju

पिंजडा

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आजाद बंदों को अपनी,
एक दुनिया चाहिए
परिंदे को, पिंजडा छोड़कर,
उड़ जाना चाहिए।
पर! भूल गया है उड़ना
अब बेचारा क्या करे?
रोशनी इतनी है कि आँख खुलती नहीं
शोर चारों तरफ है, कुछ सुनाई देता नहीं
भीड़ में अकेला हैं, कोई दिखाई देता नहीं
फिर शिकायत भला किससे करे
ए रास्ता,
उसने खुद चुना है
सुनहरे
पिंजडे
के लिए ।।
rajhansraju

हाँ मै भी हूँ

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वो अकेली
यूँ  ही चली जा रही थी
हर नजर उसकी तरफ बढ़ रही थी
आँख सबके हाथ है
वो जिस्म के सिवा कुछ नहीं थी
हलाँकि उस औरत से
सभी का एक रिश्ता था
शायद! घर पे जिन्हें वो छोड़ आया था
तभी उसे याद आया
बिटिया के साथ बाजार जाना था
उसके पीछे अब भी उसी के चर्चे हैं
ए जंगल बडा अजीब  है
कहने को यहाँ
सिर्फ इंसान रहते हैं
भीड़ तो बहुत है
पर
आज भी आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
rajhansraju