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Showing posts from 2010

मै ही हूँ

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जब कभी,
कहीं तुम अकेले होना, खुद में मुझे महसूस करना. रोने का मन करे, 
उदास होना अच्छा लगे,  अपनी सिसकियों में मुझे ढूँढना,  जब अँधेरे के सिवा कुछ नहीं होगा,  एक दीपक तुम्हें मिलेगा. मेरी लौ होगी उसमे, मै तुम्हारे लिए जलूँगा . तुम्हारे हर एहसास कि,  छोड़ी हुई परछाइयाँ मेरी हैं. तुम्हारा यह अकेलापन भी,  मैं ही हूँ,  तुम कहाँ,तन्हा, कभी रह सके,  तुम्हारा वजूद,  मेरे होने कि पहचान है. तुम्हारी हर बात मेरे साथ है ,  यह सांस मेरी ही सांस है.  तुम मुझे कैसे ढूंढोगे ? जब मै तुम्ही में रहता हूँ,  तुम्हीं में बसता हूँ. भूलाने परेशान होने कि आदत !  पुरानी है, वैसे हम तुम जुदा ही कब थे ?.... 

माँ पुरानी है

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उसने हर किसी से ,  अपने बेटे को पूँछा ,  कोई तो उसे जानता होगा , वह इतना बड़ा आदमी है ,  बड़े मकान में रहता है, बेटे का रंग-रूप, घर के पास कि निशानियाँ भी बताई, जिसमे एक पुराना पेड़, छोटी दुकान थी .  वह जिन चीज़ों को जानती थी,  सबका जिक्र किया , कुछ पता नहीं चला , क्योंकि ऐसा तो हर शहर में होता है , कोई किसी को नहीं जानता। वह पढ़ना-लिखना नहीं जानती ,  दुनिया कि चालाकी नहीं समझती . बेटे के प्यार में शहर आई थी, लाडले ने खूब फुसलाया था, गाँव में जो भी बचा था, उसे बेचना था। जल्द ही बोझ बन गयी, बुढ़ापे का भार उठाना मुश्किल हो गया, बेटे को पढ़ाने लिखाने में क्या-क्या सहा था, कितने दिन भूखे रहकर, उसे खिलाया था। आज मुन्ना बड़ा आदमी बन गया, वह सब कुछ देखता है, बस माँ नज़र नहीं आती। शायद! कमज़ोर बूढी "माँ" अच्छी नहीं लगती,  ऊंची सोसाइटी के  फैशन में नहीं जँचती। आखिर उसकी भी तो कोई इज्ज़त है, लोग क्या कहेंगे? अरे! यही साहब की माँ है? बेटे को इज्ज़त प्यारी है, उसे माँ की ज़रुरत ही कहाँ है? वह तो सबसे बेकार,
पड़े फर्नीचर से भी पुरानी है, बेटे ने एक अच्छी तरकीब निकाली, माँ को थोडा सा फुसलाया, कहीं घूमने के लिए मनाया, थोड़ी द…

दो दूनी ?

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दो का चार तो हो जाता, पर किसी का हक, मारा जाता है .  चोरी करना क़ाबलियत बन गयी , मज़हब दलालों का अखाडा बन गया,  पैसे का ही सब तमाशा हो गया.  उसे कैसे भी पाना इमान है , बेइमानी भी आज भगवान है , यह नया दौर आया है,  व्यापारियों को खूब भाया है . "डर" का कारोबार बढाया है,  इंसानों को बेचकर, खूब माल कमाया है, ऐसे में , रोज़ जीने वालों का क्या होगा ?  जब घर से निकलना ही मुश्किल होगा ! जानें कहाँ कब धमाका हो जाए, इंतजार में बच्चे ,बिना खाए सो जाएँ . कोई पिता सड़क पर बिखरा होगा,  घर में खाने को कुछ नहीं होगा , मातम भी कैसे मनाएगे, जो बिखरा है,  उसका पता कौन बताएगा ? फिर दो का चार करने में , कितनों का हक मारा जाएगा , एक दिन खुद बिखर जाएँगे तो , कोई नहीं उठाएगा.       

अक्स

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कुछ कहूं अपनी, कुछ सुनूं आपकी, यही सोच कर मैं यहाँ पर हूँ . पर! क्या कहूं, क्या सुनूं, कुछ नया नहीं है . सबकी एक ही दासता, जो मैंने महसूस की, 
वही सबने की है , कुछ शब्द बदल जाते हैं, बात वही रह जाती है . मैंने भी सोचा, किसी चहरे को, नजदीक से पढ़ा जाए, कुछ दिल की बात की जाए , वह चेहरा जो दूर से, काफी अच्छा लग रह था. नजदीक गया तो, मेरे जैसा ही था. थोड़ी रोशनी हुई तो , पता चला ,
मेरा ही अक्स था.  

दीपावली

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हर अँधेरी राह में, 
एक छोटा सा दीप जलाएँगे,
प्यार की तेल बाती से,
 एक नया सूरज उगाएँगे.
वह सबके हिस्से आएगा , 
अपनी रोशनी घर-घर ले जाएगा .
जब दीप से दीप मिल जाएँगे , 
यह सूरज थोडा बड़ा हो जाएगा .
आज अमावास की बेला में ,
सबको यह जगाएगा.
उमंगों और खुशियों को लपेटे ,
बड़ी सुबह उठ जाएगा .
हम सब की आँखों में ,
गुनगुनाता, हँसता ,
एक नया सवेरा ,
बस जाएगा .. 

गिरगिट

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एक ही ड़ाल पर बैठे,  कई दिन बीत गए थे.  सोचा ! इस आलस को छोड़ा जाए, कुछ नए फूल और पत्तों को परखा जाए , कुछ नहीं तो,  एक डाल से ,दूसरी पर ही जाया जाए.  अपना रंग भी बदला जाए,
काफी दिन हो गए, एक डाल ही पर, एक पत्ते के साथ रहते . उनमे ही खो गया था ,उन जैसा हो गया था , इस आलस ने रंग कुछ ,पक्का कर दिया.  लगता है, एक रिश्ता बन गया . पर रंग तो बदलना होगा , जिन्दा रहने को,  नए डाल, नए पत्तों पर जाना होगा . उन्ही के रंग में रंगना होगा . यहाँ तो रोज़ पुराने पत्ते गिरते हैं , नए लगते हैं. 
उसे भी रोज़ बदलना होगा , जो उसकी पहचान है , सबकी रंग में रंग जाना , हर फूल-पत्ती में मिल जाना , उनके जैसा हो जाना . जिससे वह खुद को ढूंढ न पाए, कोई उसे देख न पाए . वैसे भी, 
गिरगिट का तो स्वभाव ही है,  रंग बदलना....... 

a journey

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जिंदगी किसे, किस मोड़ पर लाएगी , कब कहाँ छोड़ जाएगी .  बरसाती नदी जैसे , कभी ए उफनाएगी . पतवार नहीं, किनारा नहीं , किसी मांझी की, ए नाव नहीं . जीवन की सरिता कैसी,  हरदम ए बहती रहती . चाहे हम, या ना चाहें , अपनी राह ए चलती रहती .  नदी नाव का मांझी कौन , किनारों से है रिश्ता क्या ? जीवन पथ पर चलने वाले,   बिना रुके ही चलते जाते , कहीं राही ,कहीं किनारा , पतवारों की बातें क्या ? नदी जब उफनाती है,  पतवारों से नाता क्या ? जीवन की बातें कैसी ?  नदी-नाव का रिश्ता कैसा ? सूरज -चाँद की बातें होती , नदिया हरदम बहती रहती .  जीवन की किस बेला में , धूप-छावं कब आएगा ? न जाने राही यह,  कदम बढाता जाए वह .  जीवन की अबूझ पहेली , मांझी ने तो हरदम खेली . चप्पू, नाव, नदी का रिश्ता ,  बिना इसके सभी अधूरा . बीच नदी में आते ही  , सारे रिश्ते जुड़ जाते हैं . मांझी कौन ? नाव कहाँ ?  नदिया में है धर कहाँ ?  चप्पू, नाव ,नदी की बातें , साँसों तक ही रिश्ते नाते .... 

बेटियाँ

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मौसम कितनी जल्दी बदल जाते हैं , जब एक आता है , दूसरा चला जाता है . यादें ही बची रह जाती है , एक मौसम में दूसरे की . बेटियाँ कितनी जल्दी बड़ी हो जाती हैं , बीते मौसम की तरह यादों में रह जाती है , वक्त के साथ चल देती हैं , सब कुछ स्वीकार कर लेती हैं . वह भी इतनी सहज , जैसे कुछ बदला ही नहीं . ऐसे ही हरदम , किसी अनजाने घर में  , प्यार से ,  एक परिवार बनाती है ||

बंधन

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क्या कहीं कोई आज़ाद है ? सब कुछ एक नियम से,  एक व्यवस्था में बंधा है . जन्म लेते ही ,बंधन में बंधना है . पहले माँ का प्यार ,पिता का दुलार . थोडा वक्त गुजरा , रिश्तों की डोर बड़ी हो जाती है . चारों तरफ से जकड लेती है , हर इच्छा ,हर जरूरत, एक बंधन है . इसमें बंधना ही नियति है  ,  इसी से रिश्ते- नाते,  देश -समाज बनता है . पहली सांस से,  आखरी सांस तक, सब बंधा है , कोई आज़ाद कहाँ है ?

india - an idea

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कैसे होगी मेरी पहचान,
बिना सम्मान के , एक भाव मेरे होने का,
एक राग मेरे जीवन का, जो ताल है जीने का।  मेरे साथ, 
मेरी आह में जो रहता है , भारत नाम है उसका, जो मेरी सांस में बसता है।  हर रंग भर जाता है, 
खुश हो जाता हूँ , यह दिल, 
इसकी गोद में सकून पाता है, जब भी नाम लबों पर आता है , धड़कन तेज हो जाती है . यह जमीन, 
हमारा जीवन है , इसे हरदम हरा रखना है , हर कोने को खुशियों से भरना है . इसकी हरियाली, 
हर घर तक जाए , नदिया सबकी प्यास बुझाए . कुछ इस तरह आज, गलें मिलें  जब हम चले,  पहाड़, नदिया, रेत, समंदर,
सबको अपना कहे।  उड़ने को पूरा आकाश हो , सारे रंग एक हो जाए , भारत सिर्फ नाम नहीं ,  पहचान है , हम एक रंग में,
 रंग जाएँ,  सबमे भारत भाव,
 भर जाए .....

sunrise

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रात की चादर ओढ़ के , जब दुनिया सो जाती है .  कुछ आँखे अलसाई सी , किसी की याद में खोई सी . तन्हाइयों में रोई सी , तलाश में अपनों के निकल पड़ती हैं , दूर अँधेरे में ,दीवारों से टकराती हैं . थक कर कमरे की दीवारों तक जाती हैं ,  कदम वहीँ रुक जाते हैं , सपनों को, खिडकियों में ढूँढता है ,  बंद दरवाजे को बार -बार देखता है . शायद कोई दस्तक ,बिछड़े यादों से मिला दे . आसमान भी कितना छोटा है उसका , अँधेरे में काला ही नज़र आता है , कोई चाँद सितारें नहीं इसमें . सूरज भी ,लगता है,  किसी कोने में चादर ओढ़के सो गया . वह तन्हाइयों से बातें करता है , उदास ,कमरे को देखता है . पता नहीं कब, आँख लग जाती है . लगता है, सबेरा होने वाला है , खिड़की से, सुनहरी धूप झाँक रही है , सूरज ने दरवाजा खटखटाया है , साथ चलने को बुलाया है . 

untouchable

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तुम कैसे हो, मै कैसा हूँ.  जीवन का रंग क्यों ऐसा है , सबका रंग सबकी जात , कहती है कुछ ऐसी बात . जीवन पथ पर पर ,चलते साथ , दूर रह जाते क्यों हाथ .  एक स्पर्श की होती चाह , पर रंग जात आती है राह . एक राह पर चलते जाते , दूर कदम, मिल न पाते .  मै जीतूंगा ,मै बड़ा हूँ , चाहे तन्हा ही खड़ा हूँ .  न बढ़े कदम ,न बढ़े हाथ , तन्हा कोई नहीं साथ , जात रंग का भेद न छूटा, अहंकार क्यों न टूटा . मानके तुमको सूत , बना रहा मै अछूत . मेरी पवित्रता इतनी कमजोर , स्पर्श मात्र से हो जाती चूर . भागता रहा मै, लिए जात , तुम रहे स्थिर निर्विकार . बिना जात , बिना रंग . हर दम सबके साथ ||     

स्त्री

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मै वसुधा ,मै ही नारी ,  रचना मै करती हूँ .  सबको सींचा करती हूँ , सृजन मेरी पहचान , नवीनता का मै आधार , धर्म जाति से हीन .  परंपरा,धर्म ,मुझ तक ही सीमित , कैसे रहना ,कैसे दिखना ही संस्कृति . हर धर्म ने मुझको मारा है , हर जाति ने मुझको तोड़ा है. कुछ भी नाम दिया हो, कोई भी काल रहा हो .  तब भी मै ऐसी ही रही , सबसे यूँ ही जुड़ती रही . ममता लिए खड़ी रही , बच्चों के बनाए नियम से बांधती रही . नारी जागरण का ज़माना आया . कदम से कदम मिलाकर चलना है , ऐसे  नहीं ऐसे रहना है . आगे बढ़ाना ,आगे रहना , यही आज का कदम ताल है . भला कोई कब तक आगे रह सकता है , जब पाने को पूरा आसमान है .  फिर भी ,नए नियम का बोझ,  मुझ मुझे ही सहना है . मैंने भी सोचा !  मै भी बदलूंगी ,दुनिया के साथ चलूंगी . मेरा भी आकाश है , मेरे पंख बेक़रार हैं ,धरती मुझे बुला रही . समुन्दर में बहना है ,  रेत पर चलना है , मुझे भी उड़ना है . लोगों ने कहा  "अभी दुनिया देखी कहाँ ?" मैंने कहा  "यह तो बस शुरुआत है " 

ayodhya - hey ram!

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 अल्लाह क्या अपने बन्दों पर नाज करेगा ? इंसानों के क़त्ल को माफ़ करेगा ? राम बिना मर्यादा रह पाएँगे ? इंसानों में अंतर कर पाएँगे ? यह हिन्दू, वह मुसलमान,कौन बताएगा ? उनकी रक्षा को लड़ते हैं,  कैसे समझाएगा  ?  राम को मंदिर अल्लाह को मस्जिद,हम बनाएगे. वह कहाँ है यह बताएँगे,  बस यह नहीं जान पाए,वह कहाँ नहीं है .  बना सके न एक घर खुद की खातिर, मंदिर-मस्जिद हम चिल्लाएँगे. मरते भूख से बच्चे खुद के, पर मूरत को भोग लगाएँगे. दाता को किया भिखारी, मंदिर बना बने ब्यापारी. कमजोर किया ईश्वर को,  इंसानों  पर किया है आश्रित. सर्वशक्तिशाली को दीवारों में कैद किया,  नाम उसका लेकर दंगा और फसाद किया. राम-रहीम को बेवजह बदनाम किया, कभी तीरथ, कभी ब्रत का नाम कर दिया. पर मरते बेबस लोगों की, फ़िक्र कितनी बार किया ? कशी और काबा पर न्योछावर क्या न किया, रोते नंगे बच्चों को हरदम दुत्कार दिया. कायनात की ख्वाइश में, मंदिर-मस्जिद का निर्माण किया. 
खुद की खातिर लोगों को, बेघर कितनी बार किया...?...

कोशिश

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ऐसी कोशिश  ताउम्र होनी चाहिए, कोई कुछ भी कहे कोई फर्क न पड़े .  औरों जैसा होने की चाहत न रहे , इस दौड़ से दूर, एक मुकाम हो, अपनी कुछ अलग पहचान हो . कुछ अजीब लोग भी इस दुनिया को चाहिए , जो महसूस करें हर दर्द, हर आह को . अपने से परों की भी परवाह हो , बिना कहे बिना सुने ,
 किसी को देख के ,मुस्करा देना . थोड़ी देर रुक जाना ,साथ बैठ जाना . अनजाना सा कुछ बाँट लेना,साथ होने का भरोसा , एहसास अपने पन का ,कितना कुछ दे जाता है .  एक पल में भरोसा -प्यार ,और न जाने क्या -क्या . अनकही बातें भी समझ ली जाती हैं ,
एक दिलासा दे जाती हैं . किसी के पास चुपचाप ,यूँ ही बैठे रहें . बिना शब्दों के, खुद का एहसास होने दें .  कुछ देर के लिए दुनिया का गुढा गढ़ित भूल जाएं . दुनिया को खूबसूरत निगाहों से देख पाएं ,  किसी के काम आए ,इसी में सकूं पाएं . शिकवा शिकायत की आदत भूल जाएं , एक कोशिश ,यह भी करें , औरों के खुश होने पर ,  हम भी खुश हो जाएँ .

छोटी सी बात

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अक्सर बातें बेवजह शुरू हो जाती हैं , काफी दूर तक जाती है .  कुछ अपने कुछ पराए हो जाते हैं, कितना अजीब होता है , एक छोटी सी बात, कहाँ से कहाँ तक जाती है , क्या -क्या हो जाता है ,  कोई जीत कर हार जाता है .  कुछ का कुछ हो जाता है , कहीं हिंदुस्तान,   कहीं पाकिस्तान हो जाता है .

सब ठीक है !

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वैसे ही सब कुछ अगाध, अविरल गति से चलता रहा . बिना रुके , एक पल  लगा था . सब कुछ ठहर गया है . पर ! ऐसा कुछ नहीं, सब तब जैसा ही सामान्य है, भावना शून्य ,मूक . सभी कदम अब भी चल रहें है, आँखें हाथ सब हिल रहे हैं,
हाँ ए सब अब भी जिन्दा है .
आज फिर कोई अमानवीयता के भेंट चढ़ गया, पर कुछ खाश नहीं हुआ ! कुछ पल, कुछ दिन, कुछ लोग मुरझाए रहे . आखिर सब्र टूट ही गया , फिर सब उसी तरह चलने लगा, किसी के साथ कुछ भी हो, क्या फर्क पड़ता है, सब सामान्य ही  दिखता है, एक  आदत हो गयी है . चुप रहना , कुछ न कहना ,सब का जड़ हो जाना , आज हम भी, जिन्दा लाशों के बीच जिन्दा हैं , खुद को अपने कंधे पर ढोते हैं , सिर्फ अपने ही बोझ से दब जाते हैं , सब सामान्य रहे, इसलिए खुद को भूल जाते हैं . भीड़ में शामिल होते ही,

जीवन

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जीवन की परिभाषा , क्या दे सकती है कोई भाषा । आशा और निराशा के बीच , निरंतर चलते जाना । जैसे जीवन जीना , जीवन और मृत्यु के बीच । कुछ पा लेने की ख्वाइश , या फिर छूट जाने का डर । निरंतर दुविधा और संशय के साथ , अहर्निश चलते जाना,
नए शब्द और भाषा के साथ । यह सच है या वह झूठ, 
सब कुछ जान लाने का भ्रम । वह जीवन जीता निरंतर , सच और झूठ का ना कोई अंतर । वह सही है वह जानता है , क्या अर्थ है जीवन का । गढ़ लेता है नित नए, 
शब्द और भाषा । पर कभी पुष्ट नहीं हो पाती, 
उसकी परिभाषा । दुःख, प्रेम, ईर्ष्या, 
तक ही सीमित, हो जाती है उसकी भाषा । कौन अपना, कौन पराया, जीवन भर यही सीख पाया । खूब रोया, खूब चिल्लाया, पर ! जीवन को न समझ पाया । क्योंकि वह कभी, 
निःशब्द, 
नहीं हो पाया , अर्थात मौन न हो पाया , शब्द और भाषा से ही, 
परिभाषा रचता रहा । अगर कभी बाहर से,
 मौन हुआ भी तो, अन्दर सब चलता रहा ।।

कलयुग

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बड़े झूंठ हैं ,बड़ी बेवफाई है ,दुनिया में , कहतें हैं , घोर कलयुग आ गया ,कोई किसी का नहीं ।
सब धोखे बाज दिखते हैं ,हर कोई यही कहता ,
भगवान भरोसे ही आज सब चलता ।
मै कितना अच्छा हूँ ,वह कितना बुरा है ,
मै कितना कुछ जानता हूँ ।
अपने को अध्यात्म और आदर्श का प्रतीक भी मनाता हूँ ,
पर छोटी सी भी पहचान क्यों नहीं बन पाती ।
मै भी दुनिया को औरों की तरह ,देखता और ठगता रहा ,
झूंठी बेबसी दिखाता रहा , दूसरों के गिरने पर हँसता रहा ।
खुद के अच्छा होने का ढोंग करता रहा ,
पर एक बार भी अपने गिरेबान में नहीं देखा । ...

सूरज की थकान

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सूरज दिन भर जलता है , प्रकाशित सारी दुनिया करता है ।
पर ! एक दम तन्हा दिखता है ,
लगता है घर से दूर काम पर निकला है ।
दिन भर तन्हाइयों में जीता है,

फिर कैसे ?
इतनी ऊर्जा, अपने अन्दर भरता है ।
रोज़ ख़ुशी - ख़ुशी क्यों? 

जलने चल पड़ता है ।
वह भी जिम्मेदार ही लगता है ,
जो परिवार के लिए जीता है ।
इसलिए हर सुबह,

समय से काम में लग जाता है ।
हाँ! जलते-जलते वह भी ,थकता है ।
शाम की गोद में वह भी ढलता है ,
माँ का आँचल वह भी ढूँढता है ।
अपने भाई बहन,

चाँद सितारों संग गुनगुनाता है , चांदनी के संग नाचता है ।
उसकी माँ रात, 

पूरे आसमान पर छा जाती है , बेटे को प्यार से सुलाती है ।
सूरज के दिन भर की थकान ,
शाम की मुस्कराहट, 

रात की हंसी, भोर की खिलखिलाहट,
से ही मिट जाती है ।
सूरज नई ऊर्जा, नई आग ले, 

खुद को जलाने, चल पड़ता है ,
हर सुबह, 

सारे जहाँ को रौशन करने ।
सूरज की तरह हमें भी,

नई ऊर्जा नई आग भरनी है ,
चंद राहें ही नहीं,

 हर घर को रौशन करना है ।
खुद को जलाकर कर ही, 

हम सूरज बन पाएंगे।
दुनिया में हम ही नया प्रकाश लाएंगे ।
अपने आकाश में हमें भी, 

सूरज की तरह जलना होगा ,
बिना रुके हर पल चलना होगा ।
सारे जहाँ को रौशन कर…

बचपन

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मैंने देखा है मन की आँखों से ,
महसूस किया है हाथों से । हर पत्ते में एहसास उसी का ,
 बचपन तो है नाम उसी का ।
निश्छल प्यारा नाम रखूँ ,
 बचपन तुझको क्या कहूं ।
मिट्टी में ढूंढ ली दुनिया, 
मुट्ठी में बांध ली खुशियाँ ।
बस! ऐसे ही मुस्करा देना, 
 बाहें फैला के रोक लेना ।
छोटी सी जिद पे अड़ जाना ,
 एक हंसी में सब पा लेना ।
कुछ आँखे ऐसी होती है ,
जो सोई सी होती हैं ।
दुनिया को एक रंग से भरती है ,
बिना अंतर देखा करती है ।
पंख लग जाते हैं ,
आसमान में उड़ जाते हैं ।
ख़याल उसके जब , नए रंग ले आते हैं ।
एक छोटी सी हंसी , होठों पर,
 अनायास आ जाती है ।
अंधियारी दुनिया भी तब,
 रौशन हो जाती है ।