आशिक

एक आशिक माशूक के गम में, 
दफ़न था. 
अब किसी को नहीं चाहेगा, 
ऐसा कसम था.
तभी एक फूल पास से गुज़रा, 
दिल झूम उठा, लगा बहार आ गई. 
कब्र छोड़ के भागा.
जैसे सालों बाद नींद से जागा, 
आदत से लाचार प्रेमी, 
हर फूल को अपना समझ लेता है.
उसके पीछे दिल का गुलदस्ता, रख देता है,  
फूल को पता ही नहीं. उसका बीमार आशिक,
कहाँ पड़ा है, 
आशिक हर मुस्कराहट पर, 
रोज़ फ़िदा होता है. 
माशूक अपनी राह चल देती है,
हँसना उसकी आदत है, 
बस हँस देती है. 
वह आशिकों को जानती है,
फूल के शिकार में बैठे है, 
खूब समझती है. 
ऐसा करते-करते आशिक न जाने कब, 
खुद शिकार हो गया, 
देवदास का दूसरा अवतार हो गया.
अपना जनाजा लिए रोज़ निकलता है,
दुःख-गम का तालाब लगता है, 
नया फूल अब नहीं खिलेगा,
यह वादा रोज़ करता है.
अब डूब जाएगा ऐसा लगता है, 
 नहीं उठ पाएगा, यह भी सोचता है.
ऐसे में अचानक दुनिया बदल गयी, 
एक खिल खिलाता फूल पास से गुज़रा,
जनाजा छोड़ के दीवाना बन गया, 
कफ़न उसका शामियाना बन गया.
हालाँकि वह मुर्दा था, 
खुद को झूठ से ढक रखा था. 
तभी न जाने कहाँ से, 
एक आइना दिखा !
अब कुछ नहीं था,
न वह था, 
न माशूक थी, 
सिर्फ आइना था.

Comments

स्मृतियाँ

सक्षम

अग्नि-परीक्षा