यज्ञ के अनधिकारी से यज्ञ कराने और शात्रोक्त कर्मों में नास्तिक बुद्धि रखने से एवं वेदाध्ययन रहित हो जाने से कुल शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। अल्प धन वाले कुल यदि वेदाध्ययन से समृद्ध हैं तो उनकी गणना भी अच्छे कुलों में होती है और वे यशस्वी कहलाते हैं।
ManuSmriti में बहुत कुछ ऐसा लिखा है जो आज के समय में सर्वथा तिरस्कार योग्य, त्याज्य दिखता है। वर्ण व्यवस्था के आधार पर बहुत कठोरता और कई स्थानों पर आज के सन्दर्भ में घृणित दिखने वाली बातें कही गई हैं, उनको नकारना ही उचित है, लेकिन मनु स्मृति में बहुत कुछ है जिससे किसी भी व्यक्ति का जीवन आचरण श्रेष्ठ हो सकता है। मनु स्मृति पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
अत: स्त्रियों को सदैव भूषण, वसन और भोजन से संतुष्ट करना चाहिए। समृद्धि की इच्छा रखने वाले को मंगलकार्य और उत्सवों में स्त्रियों को भूषण, वस्त्रादि से संतुष्ट रखना चाहिए। जिस कुल में पत्नी से पति और पति से पत्नी प्रसन्न रहती है, उस कुल में सदैव कल्याण ही होता है।
यदि हि स्त्री न रोचेतं पुमांसं न प्रोमोदयेत् ।
अप्रमोदात्पुन: पुंस: प्रजनं न प्रवर्तते।।६१।।
स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम्।
तस्या त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते।।६२।।
अर्थात्
यदि पत्नी प्रसन्नचित्त न हो तो वह पति को आनंदित नहीं कर सकती है और स्वामी प्रसन्न न हो तो सन्तानोत्पादन (वंश वृद्धि) नहीं होता। अलंकारादि में स्त्री की रुचि होने से सारा कुल दीप्तिमान होता है, परन्तु स्त्री के असंतुष्ट होने पर सारा कुल मलिन हो जाता है।
ManuSmriti में बहुत कुछ ऐसा लिखा है जो आज के समय में सर्वथा तिरस्कार योग्य, त्याज्य दिखता है। वर्ण व्यवस्था के आधार पर बहुत कठोरता और कई स्थानों पर आज के सन्दर्भ में घृणित दिखने वाली बातें कही गई हैं, उनको नकारना ही उचित है, लेकिन मनु स्मृति में बहुत कुछ है जिससे किसी भी व्यक्ति का जीवन आचरण श्रेष्ठ हो सकता है। मनु स्मृति पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
मनुस्मृति तृतीयोध्याय:
पितृभिर्भातृभिश्चैता: पितिभिर्देवरैस्तथा।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभि:।।५५।।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सार्वास्तत्राफला: क्रिया:।।५६।।
अर्थात्
विशेष कल्याण कामना युक्त, माता-पिता, भाई, पति और देवरों को उचित है कि कन्या का सत्कार करें और वस्त्रालंकारादि से भूषित करें। जिस कुल में स्त्रियां सम्मानित होती हैं, उश कुल से देवतागण प्रसन्न होते हैं और जहां स्त्रियों का तिरस्कार होता है, वहां सभी क्रियाएं (यज्ञादिक कर्म भी) निष्फल होते हैं।
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यात्सु तत्कुलम।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।५७।।
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिता:।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्तत:।।५८।।
अर्थात्
जिस कुल में बहू-बेटियां क्लेश पाती हैं, वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है, किन्तु जहां इन्हें किसी प्रकार का दुख नहीं होता है, वह कुल सर्वदा वृद्धि को प्राप्त होता है। अपमानित होने के कारण बहू-बेटियां जिन घरों को शाप देती हैं, कोसती हैं, वे घर अभिचारादि से नष्ट होकर हर तरह से नाश को प्राप्त होते हैं।
ManuSmriti में बहुत कुछ ऐसा लिखा है जो आज के समय में सर्वथा तिरस्कार योग्य, त्याज्य दिखता है। वर्ण व्यवस्था के आधार पर बहुत कठोरता और कई स्थानों पर आज के सन्दर्भ में घृणित दिखने वाली बातें कही गई हैं, उनको नकारना ही उचित है, लेकिन मनु स्मृति में बहुत कुछ है जिससे किसी भी व्यक्ति का जीवन आचरण श्रेष्ठ हो सकता है। मनु स्मृति पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मन:।।२२६।।
अर्थात्
दुखी होने पर भी आचार्य, माता, पिता और ज्येष्ठ भ्राता, इन लोगों का अपमान नहीं करना चाहिए, विशेषकर ब्राह्मणों का तो कभी भी नहीं करना चाहिए। आचार्य ब्रह्म-मूर्ति होता है। पिता ब्रह्मा की, माता पृथ्वी की और भाई अपने आत्मा की मूर्ति होता है
ManuSmriti पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
प्राणियों के कल्याण हेतु अहिंसा से ही अनुशासन करना श्रेष्ठ है, धार्मिक शासक को मधुर और नम्र वचनों का प्रयोग करना चाहिए। जिसकी वाणी और मन शुद्ध और सदैव सम्यक रीति से सुरक्षित है वह वेदान्त में कहे हुए सभी फलों को प्राप्त करता है।
ManuSmriti पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
मनुस्मृति द्वितीयोध्याय:
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृग:।
यश्च विप्रोनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति।।१५७।।
यथा षण्ढोफल: स्त्रीयु यथा गौर्गवि चाफला।
यथा चाज्ञेफलं दानं तथा विप्रोनृचोफल:।।१५८।।
अर्थात्
जैसे काठ का हाथी और चमड़े का मृग होता है वैसे ही बिना पढ़ा ब्राह्मण केवल नामधारी होता है। स्त्रियों के मध्य जिस प्रकार नपुंसक निष्फल होता है जैसे गौओ में गौ निष्फल होती है और जैसे मूर्ख को दिया हुआ दान निष्फल होता है वैसे ही वेद ऋचाओं को न जानने वाले ब्राह्मण निष्फल होता है।
ManuSmriti पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
मनुस्मृति द्वितीयोध्याय:
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृग:।
यश्च विप्रोनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति।।१५७।।
यथा षण्ढोफल: स्त्रीयु यथा गौर्गवि चाफला।
यथा चाज्ञेफलं दानं तथा विप्रोनृचोफल:।।१५८।।
अर्थात्
जैसे काठ का हाथी और चमड़े का मृग होता है वैसे ही बिना पढ़ा ब्राह्मण केवल नामधारी होता है। स्त्रियों के मध्य जिस प्रकार नपुंसक निष्फल होता है जैसे गौओ में गौ निष्फल होती है और जैसे मूर्ख को दिया हुआ दान निष्फल होता है वैसे ही वेद ऋचाओं को न जानने वाले ब्राह्मण निष्फल होता है।
ManuSmriti पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवां स्थिवरं विदु: ।।१५६।।
अर्थात्
ब्राह्मणों का ज्ञान से, क्षत्रियों का बल से, वैश्यों का धनधान्य से और शूद्रों का जन्म से बड़ापन होता है। केवर सिर के बाल पक जाने से ही कोई वृद्ध नहीं होता है, जो वेद वदांग का ज्ञाता है, वह युवा होते हुए भी वृद्ध होता है, यह देवताओं का वचन है
ManuSmriti पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
अर्थात् यज्ञ के अनधिकारी से यज्ञ कराने और शात्रोक्त कर्मों में नास्तिक बुद्धि रखने से एवं वेदाध्ययन रहित हो जाने से कुल शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। अल्प धन वाले कुल यदि वेदाध्ययन से समृद्ध हैं तो उनकी गणना भी अच्छे कुलों में होती है और वे यशस्वी कहलाते हैं।
#ManuSmriti में बहुत कुछ ऐसा लिखा है जो आज के समय में सर्वथा तिरस्कार योग्य, त्याज्य दिखता है। वर्ण व्यवस्था के आधार पर बहुत कठोरता और कई स्थानों पर आज के सन्दर्भ में घृणित दिखने वाली बातें कही गई हैं, उनको नकारना ही उचित है, लेकिन मनु स्मृति में बहुत कुछ है जिससे किसी भी व्यक्ति का जीवन आचरण श्रेष्ठ हो सकता है। मनु स्मृति पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
जो दरिद्रता वश अतिथि सत्कार में असमर्थ हो तो वह नित्य स्वाध्याय करे, क्योंकि दैव कर्म में लगा हुआ पुरुष इस चराचर को धारण कर सकता है। सम्यक रूप से अग्नि में दी हुई आहुति सूर्य को प्राप्त होती है। सूर्य से वर्षा होती है, वर्षा से अन्न उपजता है, उससे प्रजा की उत्पत्ति होती है।
वायु के आश्रय से जिस प्रकार सब प्राणी जीते हैं, वैसे ही गृहस्थाश्रम के आश्रय से सब आश्रमों का निर्वाह होता है। तीनों आश्रमी (ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी) गृहस्थों का द्वारा नित्य वेदांत की चर्चा और अन्नदान से उपकृत होते हैं, इस कारण गृहस्थाश्रम ही सर्व आश्रमों में सबसे बड़ा होता है।
ManuSmriti में बहुत कुछ ऐसा लिखा है जो आज के समय में सर्वथा तिरस्कार योग्य, त्याज्य दिखता है। वर्ण व्यवस्था के आधार पर बहुत कठोरता और कई स्थानों पर आज के सन्दर्भ में घृणित दिखने वाली बातें कही गई हैं, उनको नकारना ही उचित है, लेकिन मनु स्मृति में बहुत कुछ है जिससे किसी भी व्यक्ति का जीवन आचरण श्रेष्ठ हो सकता है। मनु स्मृति पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
इस लोक में भी सुख चाहने वाले और अक्षय स्वर्ग पाने की इच्छा वाले को यत्नपूर्वक ऐसे गृहस्थाश्रम का पालन करना चाहिए। गृहस्थास्रम का पालन दुर्बल इंद्रियों से नहीं होता है। ऋषि, पितर, देवता, जीवजन्तु और अतिथि, ये कुटुम्बियों से कुछ पाने की इच्छा रखते हैं। शास्त्रज्ञ पुरुष उन्हें संतुष्ट करें।
स्वाध्यायेनार्चयेतर्षीन्होमैर्देवान्यथाविधि।
पितृन्श्राद्धैश्च नृनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा।।८१।।
कुर्यादहरह: श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।
पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्य: प्रीतिमावहन्।।८१।।
अर्थात्
ऋषियों का वेदाध्ययन से, देवताओं का होम से, श्राद्ध और तर्पण से पितरों का, अन्न से अतिथियों और बालिकर्म से प्राणियों का सत्कार करना चाहिए। अन्नादि या जल से दूध से या फलादि से पितरों के प्रसन्नार्थ नित्य श्राद्ध करें।
#ManuSmriti में बहुत कुछ ऐसा लिखा है जो आज के समय में सर्वथा तिरस्कार योग्य, त्याज्य दिखता है। वर्ण व्यवस्था के आधार पर बहुत कठोरता और कई स्थानों पर आज के सन्दर्भ में घृणित दिखने वाली बातें कही गई हैं, उनको नकारना ही उचित है, लेकिन मनु स्मृति में बहुत कुछ है जिससे किसी भी व्यक्ति का जीवन आचरण श्रेष्ठ हो सकता है। मनु स्मृति पढ़ने से आचरण-व्यवहार कुछ बेहतर ही होगा और जो आपको ठीक नहीं लगता, उसे नकार दीजिए। सभ्य, स्वस्थ समाज ऐसे ही बनता है।
चीन में एक बहुत बड़ा फकीर हुआ। वह अपने गुरु के पास गया तो गुरु ने उससे पूछा कि तू सच में संन्यासी हो जाना चाहता है कि संन्यासी दिखना चाहता है? उसने कहा कि जब संन्यासी ही होने आया तो दिखने का क्या करूंगा?
होना चाहता हूं। तो गुरु ने कहा, फिर ऐसा कर, यह अपनी आखिरी मुलाकात हुई। पाँच सौ संन्यासी हैं इस आश्रम में तू उनका चावल कूटने का काम कर। अब दुबारा यहां मत आना। जरूरत जब होगी, मैं आ जाऊंगा।
कहते है, बारह साल बीत गए। वह संन्यासी चौके के पीछे, अंधेरे गृह में चावल कूटता रहा। पांच सौ संन्यासी थे।
सुबह से उठता, चावल कूटता रहता।
रात थक जाता, सो जाता। बारह साल बीत गए।
वह कभी गुरु के पास दुबारा नहीं गया।
क्योंकि जब गुरु ने कह दिया, तो बात खतम हो गयी।
जब जरूरत होगी वे आ जाएंगे, भरोसा कर लिया।
कुछ दिनों तक तो पुराने खयाल चलते रहे,
लेकिन अब चावल ही कूटना हो दिन-रात तो पुराने खयालों को चलाने से फायदा भी क्या?
धीरे-धीरे पुराने खयाल विदा हो गए।
उनकी पुनरुक्ति में कोई अर्थ न रहा।
खाली हो गए, जीर्ण-शीर्ण हो गए।
बारह साल बीतते-बीतते तो उसके सारे विदा ही हो गए विचार। चावल ही कूटता रहता। शांत रात सो जाता,
सुबह उठ आता, चावल कूटता रहता। न कोई अड़चन,
न कोई उलझन। सीधा-सादा काम, विश्राम।
बारह साल बीतने पर गुरु ने घोषणा की कि मेरे जाने का वक्त आ गया और जो व्यक्ति भी उत्तराधिकारी होना चाहता हो मेरा, रात मेरे दरवाजे पर चार पंक्तियां लिख जाए जिनसे उसके सत्य का अनुभव हो। लोग बहुत डरे, क्योंकि गुरु को धोखा देना आसान न था। शास्त्र तो बहुतों ने पढ़े थे। फिर जो सब से बडा पंडित था, वही रात लिख गया आकर। उसने लिखा कि मन एक दर्पण की तरह है, जिस पर धूल जम जाती है। धूल को साफ कर दो, धर्म उपलब्ध हो जाता है। धूल को साफ कर दो, सत्य अनुभव में आ जाता है। सुबह गुरु उठा, उसने कहा, यह किस नासमझ ने मेरी दीवाल खराब की? उसे पकड़ो।
वह पंडित तो रात ही भाग गया था, क्योंकि वह भी खुद डरा था कि धोखा दें! यह बात तो बढ़िया कही थी उसने, पर शास्त्र से निकाली थी। यह कुछ अपनी न थी। यह कोई अपना अनुभव न था। अस्तित्वगत न था। प्राणों में इसकी कोई गुंज न थी। वह रात ही भाग गया था कि कहीं अगर सुबह गुरु ने कहा, ठीक! तो मित्रों को कह गया था, खबर कर देना; अगर गुरु कहे कि पकड़ो, तो मेरी खबर मत देना।
सारा आश्रम चिंतित हुआ। इतने सुंदर वचन थे। वचनों में क्या कमी है? मन दर्पण की तरह है, शब्दों की, विचारों की, अनुभवों की धूल जम जाती है। बस इतनी ही तो बात है। साफ कर दो दर्पण, सत्य का प्रतिबिंब फिर बन जाता है। लोगों ने कहा, यह तो बात बिलकुल ठीक है, गुरु जरा जरूरत से ज्यादा कठोर है। पर अब देखें, इससे ऊंची बात कहां से गुरु ले आएंगे। ऐसी बात चलती थी, चार संन्यासी बात करते उस चावल कूटने वाले आदमी के पास से निकले। वह भी सुनने लगा उनकी बात। सारा आश्रम गर्म! इसी एक बात से गर्म था।
सुनी उनकी बात, वह हंसने लगा। उनमें से एक ने कहा, तुम हंसते हो! बात क्या है? उसने कहा, गुरु ठीक ही कहते हैं। यह किस नासमझ ने लिखा? वे चारों चौंके। उन्होंने कहा, तू बारह साल से चावल ही कूटता रहा, तू भी इतनी हो गया! हम शास्त्रों से सिर ठोंक-ठोंककर मर गए। तो तू लिख सकता है इससे बेहतर कोई वचन? उसने कहा, लिखना तो मैं भूल गया, बोल सकता हूं अगर कोई लिख दे जाकर। लेकिन एक बात खयाल रहे, उत्तराधिकारी होने की मेरी कोई आकांक्षा नहीं। यह शर्त बता देना कि वचन तो मै बोल देता हूं अगर कोई लिख भी दे जाकर--मैं तो लिखूंगा नहीं, क्योंकि मैं भूल गया, बारह साल हो गए कुछ लिखा नहीं--उत्तराधिकारी मुझे होना नहीं है। अगर इस लिखने की वजह से उत्तराधिकारी होना पड़े, तो मैंने कान पकड़े, मुझे लिखवाना भी नहीं। पर उन्होंने कहा, बोल! हम लिख देते है जाकर। उसने लिखवाया कि लिख दो जाकर--कैसा दर्पण? कैसी धूल? न कोई दर्पण है, न कोई धूल है, जो इसे जान लेता है, धर्म को उपलब्ध हो जाता है।
आधी रात गुरु उसके पास आया और उसने कहा कि अब तू यहां से भाग जा। अन्यथा ये पांच सौ तुझे मार डालेंगे। यह मेरा चोगा ले, तू मेरा उत्तराधिकारी बनना चाहे या न बनना चाहे, इससे कोई सवाल नही, तू मेरा उत्तराधिकारी है। मगर अब तू यहां से भाग जा। अन्यथा ये बर्दाश्त न करेंगे कि चावल कूटने वाला और सत्य को उपलब्ध हो गया, और ये सिर कूट-कूटकर मर गए।
जीवन में कुछ होने की चेष्टा तुम्हें और भी दुर्घटना में ले जाएगी। तुम चावल ही कूटते रहना, कोई हर्जा नहीं है।
कोई भी सरल सी क्रिया, काफी है। असली सवाल भीतर जाने का है। अपने जीवन को ऐसा जमा लो कि बाहर ज्यादा उलझाव न रहे। थोड़ा--बहुत काम है जरूरी है, कर दिया, फिर भीतर सरक गए। भीतर सरकना तुम्हारे लिए ज्यादा से ज्यादा रस भरा हो जाए। बस, जल्दी ही तुम पाओगे दुर्घटना समाप्त हो गयी, अपने को पहचानना शुरू हो गया।
अपने से मुलाकात होने लगी। अपने आमने-सामने पड़ने लगे। अपनी झलक मिलने लगी। कमल खिलने लगेंगे।बीज अंकुरित होगा।
अनशन मैं सोच रहा हूंँ अब अनशन पर बैठ ही जाऊं मेरी भी कुछ मांगे हैं सरकार से नाराज बहुत हूंँ हालांकि जो Paper leak हुआ था वो फिर से अच्छे से हो गया है 🌹🌹🌹💐💐🌹🌹 एक छात्र अपने बाप से नाराज बहुत है क्यों नहीं उसके लिए अबकी Paper खरीद सका प्रोफेसर साहब जेल में हैं जिन्होंने कोचिंग से मिलकर यह काम किया था सोचने की बात बस इतनी है इसका जिम्मेदार हम कितने हैं क्योंकि हममे से ही कोई हर जगह पर है ❤️❤️💐💐❤️❤️ फिर सोचा अनशन क्यों करूं BBC CNN वाले आए नहीं हैं बस इतने से काम नहीं चलेगा ए मुद्दा पर्याप्त नहीं है और बहुत कुछ ले आओ जो जो जिसको ठीक लगे 🌹🌹🌹 ए अच्छा है ऐसे ही होता है यूपी चुनाव से पहले पिछली बार किसान आंदोलन हुआ था याद नहीं है क्या? इस बार भी चुनाव नजदीक है सारा खेल उसी का है और कुछ नहीं है Rajhans Tiwari 💐💐💐💐 आंदोलन में एक लाचार आदमी *****🌹🌹🌹🌹**** मुझे मालूम नहीं था ए खबर है क्योंकि मेरे शहर में न ज...
आडंबर से मुक्ति सनातन का शाश्वत प्रवाह: काल, कर्मकांड और नव-परिष्कार भारतीय चिंतन परंपरा और सनातन समाज की सबसे विलक्षण शक्ति रही है— देश, काल और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को पुनःपरिभाषित करने की क्षमता। दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताएं और संस्कृतियां समय के थपेड़ों, आक्रांताओं के भय अथवा अपनी जड़ता के कारण इतिहास के पन्नों में सिमट गईं; किंतु हम आज भी जीवित हैं। खंडित होकर और अनेक ऐतिहासिक आघात सहकर भी यदि हमारी अस्मिता अक्षय रही, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने जड़ता के स्थान पर गतिशीलता को चुना। हमारे दार्शनिकों, ऋषियों और समाज-सुधारकों ने समय-समय पर पुरानी मान्यताओं को परिमार्जित किया और धर्म के शाश्वत तत्त्व को अक्षुण्ण रखते हुए उसकी बाहरी व्यवस्थाओं को युगीन आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला। किंतु आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ संकट केवल बाह्य नहीं, आंतरिक भी हैं। आधुनिक युग में तर्क, विज्ञान और आर्थिक व्यावहारिकताओं के धरातल पर नई पीढ़ी हर व्यवस्था का मूल्यांकन कर रही है। यदि हमने अपनी सामाजिक और धार्मिक पद्धतियों का समय रहते परिष्कार नहीं किया, तो हम अनजाने में ही अपन...
भारतबोध की यात्रा: भूगोल, दार्शनिक विरासत और औपनिवेशिक विमर्श से मुक्ति का प्रश्न लेखक: राजहंस राजू १. भारत को जानना: भूगोल और भारतवर्ष की ऐतिहासिक चेतना किसी भी राष्ट्र को उसकी ऐतिहासिक जड़ों और दार्शनिक विकास को समझे बिना जानना असंभव है। जब हम 'भारत' की बात करते हैं, तो उसका दायरा केवल वर्तमान सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह 'भारतवर्ष' की उस वृहद संकल्पना से जुड़ता है जिसे आज भारतीय उपमहाद्वीप कहा जाता है। भौगोलिक विस्तार: अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे क्षेत्र ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से इसी भूगोल की चेतना से जुड़े रहे हैं। समय की विभाजक रेखा: १५ अगस्त १९४७ और २६ जनवरी १९५० की तिथियां राजनीतिक सीमाओं के निर्धारण का प्रस्थान बिंदु हैं। १९५० से पूर्व का इतिहास मूलतः समूचे 'भारतवर्ष' का साझा सांस्कृतिक इतिहास है, जबकि उसके बाद का समय अलग-अलग संप्रभु राष्ट्रों की राजनीतिक यात्रा का कालखंड है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और राष्ट्रों की संप्रभुता का सम्मान करते हुए भी, यदि इस पूरे क्षेत्र के समाज को अपनी म...
कॉकरोच कॉकरोच तुम चेहरा हो कि मुखौटा किस बजबजाती नाली से निकले हो उसका नाम क्या है यह भी तो बता दो अपने बारे में समझा दो बड़े लोग अपने अनुभव से बहुत सी बात करते हैं जिसमें सब सही हो या सब गलत हो यह जरूरी तो नहीं है हमारे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने जो कुछ कहा है वह सोच समझकर ही कहा होगा हालांकि उन्हें सच बोलने से बचना था काकरोच को काकरोच नहीं कहना था पर सच में उन्होंने किस संदर्भ में क्या क्यों कहा? उनकी पूरी बात सबको सुनना चाहिए मुझे तो संदेह नहीं है उन्होंने तो सिर्फ यही कहा था कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ गंदगी करते हैं उनकी बात का मतलब यही था जिनसे जब कुछ भी बेहतर और अच्छा नहीं होता क्योंकि जहां साफ-सुथरा अच्छा कुछ हो रहा हो वह वहां नहीं रह सकते उन्हें बदबूदार गंदी नाली चाहिए क्योंकि कॉकरोच वहीं रहते हैं ऐसे में वह अपने मन माफिक हर चीज ढूंढते लेते हैं अरे भाई यह देश ...
कॉकरोच कॉकरोच तुम चेहरा हो कि मुखौटा किस बजबजाती नाली से निकले हो उसका नाम क्या है यह भी तो बता दो अपने बारे में समझा दो बड़े लोग अपने अनुभव से बहुत सी बात करते हैं जिसमें सब सही हो या सब गलत हो यह जरूरी तो नहीं है हमारे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने जो कुछ कहा है वह सोच समझकर ही कहा होगा हालांकि उन्हें सच बोलने से बचना था काकरोच को काकरोच नहीं कहना था पर सच में उन्होंने किस संदर्भ में क्या क्यों कहा? उनकी पूरी बात सबको सुनना चाहिए मुझे तो संदेह नहीं है उन्होंने तो सिर्फ यही कहा था कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ गंदगी करते हैं उनकी बात का मतलब यही था जिनसे जब कुछ भी बेहतर और अच्छा नहीं होता क्योंकि जहां साफ-सुथरा अच्छा कुछ हो रहा हो वह वहां नहीं रह सकते उन्हें बदबूदार गंदी नाली चाहिए क्योंकि कॉकरोच वहीं रहते हैं ऐसे में वह अपने मन माफिक हर चीज ढूंढते लेते हैं अरे भाई ...
सत्ता संघर्ष सत्ता के लिए राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नए हथियार निरंतर आजमाते रहते हैं कि कैसे, किससे अपने विरोधी को मात दिया जाए और जब विरोध करने की सीधे सामर्थ्य नहीं होती, तब मुखैटे लगा लिए जाते हैं और बात होती है पर्यावरण, बच्चे, महिला, बेरोजगारी, शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य .. मतलब ए ऐसे मुद्दे हैं कि दुनिया के किसी भी देश/सरकार को इस पर आसानी से घेरा जा सकता है क्योंकि इसके अंतिम बिंदु तक पहुंचा ही नहीं जा सकता है। इस पर आप हमेशा आंदोलन कर सकते हैं और अपने लिए सहानुभूति बड़ी आसानी से पैदा कर सकते हैं और इतिहास बोध से दूर लोगों को तो आप तुरंत अपना फैन बना सकते हैं, जिन्हें पचीस-पचास साल के अंदर देश में कैसे, क्या हुआ यह जानने की न तो इच्छा और न ही सामर्थ्य है उनसे भला देश के इतिहास और दर्शन जानने की उम्मीद करना, उनके साथ अन्याय होगा, जो रील को अपनी जानकारी का प्रामाणिक स्रोत मानते हैं .. खैर हैं तो अपने ही लोग, मुखौटा हटते ही असली चेहरा भी सामने आ जाएगा, बस समय ज्यादा लगता है। क्योंकि सामान्य लोग भावुक होकर मुखौटे को असली चेहरा समझ लेते हैं...
सोनम वांगचुक मेरे गांव के लोगों ने सरकार से यह मांग की, गांव में उन्हें अपनी university चाहिए जिसके लिए सरकार को तुरंत फंड देना चाहिए, यह मांग शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव के लिए बहुत जरूरी है पर यह निकम्मी सरकार सुनती ही नहीं, पिछले पचहत्तर साल से हमारा अदृश्य आंदोलन चल रहा है जिसमें मनमाफिक, नियमानुसार, अनुकूल समय पर पर्याप्त खा पीकर, सभी लोग सुविधा अनुसार भूख हड़ताल पर बैठ जाते हैं और समय पर हो रहे चुनाव में भागीदारी भी करते हैं, पर पता नहीं क्यों जनता को इन आंदोलन कारियों पर यकीन नहीं है और इनके चुनाव हारते ही लोकतंत्र खतरे में आ जाता है .. हम लोगों ने सपने में एक प्रस्ताव पारित किया है कि जब तक हम नहीं चुने जाएंगे, तब तक यहां की जनता निकम्मी, नासमझ, साम्प्रदायिक कही जाएगी, हमारी एक सबसे महत्वपूर्ण मांग जो हमारे छात्रहित से जुड़ी कि हमारे होनहार छात्र जिन परीक्षाओं में सम्मिलित होंगे, उसके पेपर वह खुद बनाएंगे और उसका मूल्यांकन भी वही करेंगे, इससे लीक होने का न केवल खतरा समाप्त हो जाएगा, बल्कि किसी और की, हर तरह की जिम्मेदारी भी खत्म हो जाएगी। अब तो मेरे गां...
बुलबुल अपनी उड़ान जानती है
ReplyDeleteवह आसमान को कुछ-कुछ समझती है
उसकी तरफ देखकर गाती है
फिर खुद पर हंसी आ जाती है
हर ऊँचाई
उसके सामने शून्य हो जाती है
©️Rajhansraju
उसने भी समझ लिए हैं
ReplyDeleteशायद सही गलत के मायने
शांत एक कोने में बैठा है
या फिर अपना सफर
पूरा कर चुका है
सही गलत का
अब कोई फर्क नहीं पड़ता
सही गलत का
©️RajhansRaju
नालायक तो बहुत लायक है
ReplyDeleteबुलबुल की समझ में गहराई है
ReplyDeleteखुद को ढूँढने और पाने की कोशिश कि शानदार अभिव्यक्ति
ReplyDeleteबुलबुल अपनी उड़ान जानती है
ReplyDeleteवह आसमान को कुछ-कुछ समझती है
उसकी तरफ देखकर गाती है
फिर खुद पर हंसी आ जाती है
हर ऊँचाई
उसके सामने शून्य हो जाती है
बुलबुल खुद की तलाश में
ReplyDelete