Rakshababdhan

रक्षाबंधन 

(1)

 सड़क पर दिन रात 

अवारगी करने वालों के 

हाथ में भी राखी बंधी है, 

उसके माथे पर घाव का 

ताजा निशान है

किसी ने उसकी बहन को 

बस कुछ कह दिया था 

भला भाई को कैसे बर्दाश्त होता 

वह लफंगा है नाकाम है 

इस बात में कोई संदेह नहीं है 

इन सबके बाद भी 

अपनी मां बहन बेटी के लिए 

दुनिया से लड़ने को तैयार है

पर दुनिया ऐसी क्यों है?

जो तुझे यूंँ लड़ना पड़े

खुद को गौर से देख 

तूंँ ही तो जिम्मेदार है 

©️ Rajhans Raju 

🌹🌹🌹🌹🌹


(2)

चलिए कुछ बात करते हैं 

खुद से शुरुआत करते हैं 

शिक्षा पर बड़ी चर्चा है 

पर हकीकत क्या है?

छात्र, अभिभावक और शिक्षक 

यही तीन इसके आयाम है 

बिल्डिंग कैसी है कहां है 

अच्छी है बुरी है 

यह सारी बात जायज है 

इस पर बात करने में हर्ज नहीं है 

पर मूल में यह समस्या 

इतनी बड़ी नहीं है 

क्योंकि पढ़ेंगे तो छात्र 

पढ़ाएगा अध्यापक ही

जिसमें अभिभावक 

दोनों के बीच की कड़ी है 

तीनों की भूमिका समाज में कैसी है 

नैतिक मूल्य क्या इनमें बचे हैं 

असली सवाल यही है 

जिसका जवाब ढूंढ़ना है 

क्योंकि कटघरे में हमीं हैं 

©️ Rajhans Raju 

🌹🌹🌹🌹

(3)

एक लाचार आदमी 

*****🌹🌹****

मुझे मालूम नहीं था 

ए खबर है 

क्योंकि मेरे शहर में 

न जाने कितने ऐसे लोग हैं 

जो ठेला खोमचा लगाते हैं 

ए अचरज करने वाले 

क्या इन्हें देखते नहीं हैं

इन्हीं से तो सब्जी खरीदते हो 

या फिर कुछ और सामान लेते हो 

जीवन के संघर्ष आसान नहीं है 

कुछ भी आसानी से नहीं बनता 

ऐसी और कहानी सुननी हो तो 

अपने शहर के किसी भी 

सरकारी अस्पताल में चले जाओ

कुछ कर पाएं तो अच्छी बात है 

नहीं तो कोई बात नहीं है 

जब कही भी किसी से मिलिए 

बस थोड़ा सा नरम रहिए 

आपकी सहानुभूति नहीं चाहिए 

क्योंकि ए

अपनी नींव के पत्थर हैं

©️ Rajhans Raj

🌹🌹🌹🌹


(4)

यात्रा

******

वह उसे यूं ही निहारता रहा 

एक टक देखता रहा 

एक भी शब्द नहीं कहा 

बस गुमसुम बैठा रहा 

कब से 

इसका एहसास नहीं है 

ऐसे ही वक्त 

फासला तय करता रहा 

कौन कहां गया 

किसी को पता नहीं चला 

सदियां गुजर गई 

वह इंतजार में था 

या ठहरा हुआ था 

किसके लिए 

उसे भी मालूम नहीं 

नदी अब भी वैसे ही बह रही है 

उसका नाम गंगा है 

सुना है 

उसने न जाने कितनों को 

उस पार पहुंचाया है 

बस वह नाव 

जो इस पार से उस पार जाती है 

शायद उसी की राह देख रहा है 

न जाने कब से?

भगीरथ उसे यहां लाए थे 

अपने पूर्वजों के लिए 

उनकी प्यास मिटाने 

जिन्होंने इंतजार में 

अपनी काया इस सौंप दी थी 

तब से न जाने कितने लोग 

गंगा के साथ 

अपनी-अपनी यात्रा पर गए 

और यह यात्रा ऐसी है 

जिसकी कोई कहानी कहता नहीं 

क्योंकि गंगा 

गंगा सागर में जाकर मिल जाती हैं 

और सागर से भला 

कौन लौट कर आना चाहेगा 

जो खुद सागर बन गया हो 

लौटकर किसको 

अपनी कहानी सुनाएगा 

वह किनारे बैठा हुआ है 

बंजारगी से थक गया है 

दिन ढ़ल रहा है 

सूरज को घर पहुंचने की जल्दी है 

अरे बहुत हो गया 

मैं भी थोड़ा आराम चाहता हूं 

वह जैसे 

अपने दरवाजे पर कुंडी लगा रहा है 

अब कल सुबह मिलते हैं 

चलो अपने घर को चलते हैं 

रात काफी हो चली 

किनारे अब भी वैसे ही हैं 

अंधेरे के सिवा कोई रंग नहीं है 

तभी एक उल्कापिंड 

टूट कर बिखर गया 

उसकी यात्रा यहीं तक थी 

ऐसे ही न जाने कितने 

धूमकेतु धरती से बहुत दूर 

अपनी अंतहीन यात्रा में लगे हुए हैं 

और हमें उनका कोई एहसास नहीं है

बस जो टूटकर बिखर जाते हैं 

कभी कभी कुछ पल के लिए 

नजर आ जाते हैं 

उन्हें जो अनायस

इस अनंत आकाश को 

निहारते रहते हैं 

©️ RajhansTiwari


🌹🌹🌹💐💐🌹🌹

(5)
आम आदमी 

*************

मैं भारत का नागरिक हूंँ

स्वतंत्र हूंँ

सवाल पूछता हूंँ 

जवाब चाहिए 

ऐसी हालत क्यों है 

मुझे पता होना चाहिए 

सरकार से हरदम 

सवाल करता हूंँ

पर ए सरकार 

कौन है किसने बनाई ?

कैसे बनी ? 

और कौन-कौन से 

अधिकार चाहिए ?

ए भी तो सवाल है 

किसी और से न सही 

खुद से पूछ्ना चाहिए 

शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य 

सब कुछ चकाचक चाहिए 

कौन चला रहा है 

इसका भी जवाब चाहिए 

उस देश जैसा यहां क्यों नहीं है 

एकदम वैसी ही व्यवस्था 

शानदार चाहिए 

पर ऐसा क्यों नहीं होता है 

कभी थोड़ा रुक कर,

ठहर कर सोचा है 

हर समय अधिकार की बात 

और सवाल पर सवाल है ?

अनुशासन, उत्तरदायित्व और कर्तव्य 

जैसे शब्दों का अर्थ क्या तुम्हें पता है 

इसके बिना 

कहीं कोई स्वतंत्रता होती है 

और कोई देश बनता है क्या ?

असली सवाल तो यही है 

जिससे हम बच रहे हैं 

हम आजाद हैं 

यह कह रहे हैं 

अनुशासन 

किस चिड़िया का नाम है 

यह भी तो सवाल है 

आखिर इसका जवाब कौन देगा?


चलिए कुछ बात करते हैं 

खुद से शुरुआत करते हैं 

शिक्षा पर बड़ी चर्चा है 

पर हकीकत क्या है?

छात्र, अभिभावक और शिक्षक 

यही तीनों इसके आयाम है 

बिल्डिंग कैसी है कहां है 

अच्छी है बुरी है 

यह सारी बात जायज है 

इस पर बात करने में हर्ज नहीं है 

पर मूल में यह समस्या 

इतनी बड़ी नहीं है 

क्योंकि पढ़ेंगे तो छात्र 

पढ़ाएगा अध्यापक ही

जिसमें अभिभावक 

दोनों के बीच की कड़ी है 

तीनों की भूमिका समाज में कैसी है 

नैतिक मूल्य क्या इनमें बचे हैं 

असली सवाल तो यही है 

जिसका जवाब ढूंढ़ना है 

क्योंकि कटघरे में हमीं हैं 


यह पेपर लीक हुआ, 

वह पेपर लीक हुआ 

नहीं होना चाहिए 

बात एकदम सही है 

लेकिन यह रुकेगा कैसे 

जब भ्रष्टाचार की गुंजाइश है 

जिम्मेदार कौन है?  

वह छात्र 

जो नकल करता है 

वह अभिभावक 

जो मोटी रकम लिए तैयार है

या फिर अध्यापक 

जिसके हाथ में सारी बागडोर है 

पूरी व्यवस्था में जो बैठे हैं 

हमारे ही घर के अपने लोग हैं 

फिर ए जो बुरा है 

उसका कौन जिम्मेदार है ?

सरकारी अस्पताल की हालत 

बड़ी खराब है 

यह बात 

उसी अस्पताल का डॉक्टर कह रहा है 

जिसके हाथ में सारा अख्तियार है 

शाम को क्लीनिक पर 

बैठने की बहुत जल्दी है 

उसकी फीस वहां कई हजार है 

ऐसे में सरकारी अस्पताल में 

मन भला कैसे लगे 

तभी तो अस्पताल बीमार है 

जिन्हें ठीक करना था 

वही समस्या का मूल आधार हैं

ऐसे ही बात आगे बढ़ी 

स्कूल पर फिर आ पड़ी 

सरकारी स्कूल के मास्टर साहब 

बच्चों की फीस से परेशान हैं

बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं

50 ₹ वाली किताब 500 में लेते हैं 

और न जाने 

कैसे-कैसे खर्च की भरमार है 

रोज एक नया फरमान आता है 

स्कूल नहीं लाला की दुकान है 

जबकि वही पढ़ाई 

उन्हीं के स्कूल में मुफ्त है 

लेकिन वह बेकार है 

क्योंकि मास्टर साहब के हाथ में 

स्कूल की बागड़ोर है 

मोटी तनख्वाह है

यह तो अधिकार है 

उनको शिकायत बहुत है 

इसे गिनने गिनाने में 

पूरा दिन निकल जाता है 

क्या-क्या होना चाहिए 

उनसे क्या काम नहीं लेना चाहिए 

दिन-रात इसी का सरोकार है 

जबकि उनके हर काम का

सरकारी मानदेय है 

पुलिस में जो हमारे भैया हैं 

वह भी परेशान हैं 

दिन-रात की ड्यूटी है 

बहुत शोषण होता है 

देश तो यही चलाते हैं 

सारा काम उन्हीं के जिम्मे है 

पुलिस है कि गुलाम है 

उन्हें भी समाज से शिकायत है 

उनकी भी बेटी के साथ 

अभी छेड़खानी हुई थी 

वह भी लाचार हैं

आज कल किसी पर भी 

भरोसा करना बेकार है 

हर जगह 

चोर उचक्कों का राज है 

हालांकि उनके पास भी 

बड़ी गाड़ी

आलीशान मकान हैं 

बच्चों के पास हर चीज बेशुमार है 

फिर भी शिकायत है 

इस नौकरी से 

जिससे यह रौब और रुतबा है 

आखिर और कितना चाहिए 

फिर तो ...

अपराधी और पुलिस में 

अंतर करना बेकार है 

यही हाल प्रशासन का है 

वह भी दुखी हैं 

जिनके पास दौलत बेशुमार है 

कैसे कमाया यह भी तो बताओ 

नाराज क्यों होते हो 

सवाल ही तो है 

जवाब दो 

UPSC पास करके आए हो 

काबिल हो समझदार हो 

तुम्हीं से तो उम्मीद थी 

तुम भी बिकने को तैयार हो


और तभी मिले एक मित्र हमारे 

Dress लल्लनटाप खादी 

सफ़ेद रंग का कुर्ता है 

आपको क्या लगता है 

नेता या ठेकेदार है 

नहीं नहीं व्यवसाई है 

अरे नहीं तीनों वही है 

एक ही आदमी

अलग-अलग वक्त में 

भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है 

मायावी मारीच है 

अपना काम में माहिर 

मंत्री बनने के करीब है 


वह भी मेरे घर का ही 

मेरा रिश्तेदार है 

कोई अस्पताल चलाता है 

कोई स्कूल,

किसी की बड़ी एजेंसी है 

कोई बड़ा ठेकेदार है 

और जब 

सब कुछ हासिल कर लेता है 

तब वही नेता बन जाता है 

क्योंकि सारे धंधे की 

उसे सुरक्षा चाहिए 

जो सत्ता के बिना संभव नहीं है 


सोचिए मेडिकल और स्कूल का धंधा 

कितना बड़ा है 

कमीशन 5 से 10 गुना है 

और इसके बगैर 

किसी का काम नहीं चलता है 

इसमें घाटा नहीं होता है 

अब आते हैं क्रांतिकारी 

आंदोलनकारियों पर 

अरे वही जो अपने जेंजी है 

अच्छे कपड़े हैं 

हाथ में महंगा फोन है 

इन्हें शिकायत हर चीज से है 

सब कुछ अपने अनुकूल चाहिए 

समस्या यह है कि बाकी लोगों की भी 

यही ख्वाहिश है 

उन्हें भी अपने अनुसार सब चाहिए 

अब यह कैसे संभव है 

जो इन्हें चाहिए वह उन्हें नहीं चाहिए 

फिर आजादी की बात चली 

सवालों की झड़ी लगी 

किसी के पास कोई जिम्मेदारी नहीं थी 

कर्तव्य, अनुशासन की कोई बात नहीं हुई 

सारे बच्चे खाते कमाते घर से थे 

जिनके घर वाले ही पुलिस में थे

अफसर, नेता, ठेकेदार उन्हीं के घर में हैं 

ए बच्चे उन्हीं के दम पर यहां पर हैं 

सवाल कहां किससे करना था?

यह समझना 

इतना मुश्किल तो नहीं है 

मतलब 

पहले खुद से करना है 

अपने घर में करना है 

अपनों से करना है 

सारे जवाब मिल जाएंगे 

शुरुआत खुद से करना है 

©️ Rajhans Raju 

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Comments

  1. खुद को गौर से देख
    तूंँ ही तो जिम्मेदार है
    ©️ Rajhans Raju

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  2. चलिए कुछ बात करते हैं
    खुद से शुरुआत करते हैं

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