Adambar se mukti

 आडंबर से मुक्ति 


सनातन का शाश्वत प्रवाह: काल, कर्मकांड और नव-परिष्कार

भारतीय चिंतन परंपरा और सनातन समाज की सबसे विलक्षण शक्ति रही है—देश, काल और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को पुनःपरिभाषित करने की क्षमता। दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताएं और संस्कृतियां समय के थपेड़ों, आक्रांताओं के भय अथवा अपनी जड़ता के कारण इतिहास के पन्नों में सिमट गईं; किंतु हम आज भी जीवित हैं। खंडित होकर और अनेक ऐतिहासिक आघात सहकर भी यदि हमारी अस्मिता अक्षय रही, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने जड़ता के स्थान पर गतिशीलता को चुना। हमारे दार्शनिकों, ऋषियों और समाज-सुधारकों ने समय-समय पर पुरानी मान्यताओं को परिमार्जित किया और धर्म के शाश्वत तत्त्व को अक्षुण्ण रखते हुए उसकी बाहरी व्यवस्थाओं को युगीन आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला।

किंतु आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ संकट केवल बाह्य नहीं, आंतरिक भी हैं। आधुनिक युग में तर्क, विज्ञान और आर्थिक व्यावहारिकताओं के धरातल पर नई पीढ़ी हर व्यवस्था का मूल्यांकन कर रही है। यदि हमने अपनी सामाजिक और धार्मिक पद्धतियों का समय रहते परिष्कार नहीं किया, तो हम अनजाने में ही अपनी भावी पीढ़ी को अपनी ही जड़ों से विरक्त कर देंगे।

प्रदर्शन का दबाव और शास्त्रों का मर्म

आज समाज में कर्मकांडों और संस्कारों का जो स्वरूप बन गया है, वह श्रद्धा कम और सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रदर्शन का माध्यम अधिक दिखता है।

आर्थिक विषमता और हीनभावना: समाज का संपन्न वर्ग जब अपने संस्कारों को भव्यता, शक्ति और धन-प्रदर्शन का अखाड़ा बना देता है, तब विपन्न और मध्यम वर्ग के भीतर एक अवांछित हीनभावना घर करने लगती है। लोग समाज में 'नाक कटने' के भय से कर्ज लेकर या अपनी आर्थिक सीमा लांघकर वही करने को विवश होते हैं।

शास्त्रीय सत्य: हमारे किसी भी प्रामाणिक शास्त्र में यह नहीं लिखा है कि मोक्ष अथवा संस्कारों की सिद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि आपने कितना धन व्यय किया। शास्त्र सदैव भाव, शुद्धि और सामर्थ्य को प्रधानता देते हैं, आडंबर को नहीं।

अंतिम संस्कार और श्राद्ध: सामाजिक दायित्व व सरलीकरण

मृत्यु जीवन का सबसे दुखद सच है, किंतु वर्तमान व्यवस्था ने शोक की घड़ी को भी एक आर्थिक संकट में बदल दिया है। जब भारत एक कृषि प्रधान समाज था और संचार व परिवहन के साधन सीमित थे, तब 10 से 13 दिनों के अनुष्ठानों की व्यवस्था संभवतः दूर-दराज के परिजनों के एकत्र होने और सामूहिक व्यवस्था के लिए उपयुक्त रही होगी। आज त्वरित संचार के युग में इस पूरी व्यवस्था को व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है:

सामुदायिक श्मशान और निःशुल्क सहयोग: किसी भी परिवार में मृत्यु होने पर श्मशान या अंतिम संस्कार का व्यय उस शोकाकुल परिवार पर भार नहीं बनना चाहिए। स्थानीय समाज, ट्रस्ट अथवा नगर व्यवस्था को ऐसा उत्तरदायित्व लेना चाहिए कि अंतिम क्रिया सम्मानजनक और निःशुल्क (या न्यूनतम लागत में) संपन्न हो।

श्राद्ध व पिंडदान की समयबद्ध व्यवस्था: अंतिम संस्कार से लेकर 11 दिनों के भीतर, किसी भी उपयुक्त दिन, पीपल वृक्ष के समीप अथवा तीर्थ पर एक निश्चित समय (लगभग एक घंटा) में पूरे वैदिक विधान से पिंडदान और शांति पाठ संपन्न किया जा सकता है।

मृत्यु भोज के स्थान पर रचनात्मक सरोकार: तेरहवीं और विशाल भोज के नाम पर लाखों रुपये के अपव्यय की जगह उस राशि का उपयोग समाजोपयोगी कार्यों में हो सकता है। उदाहरण के लिए, उसी श्मशान या ट्रस्ट में अगले 10-20 निर्धन परिवारों के अंतिम संस्कार का व्यय उठाना, किसी विद्यालय या चिकित्सालय में दान देना, अथवा केवल निकटतम परिजनों के साथ एक सादा, भावपूर्ण स्मरण आयोजित करना।

विवाह और उत्सव: मंदिरों की पुनर्प्रतिष्ठा

विवाह उत्सवों में जिस प्रकार अनावश्यक चमक-दमक, विशाल पंडालों और अपव्यय का चलन बढ़ा है, उसने मध्यमवर्गीय परिवारों को भारी मानसिक तनाव में डाल दिया है।

मंदिर प्रांगणों की भूमिका: हमारे प्राचीन समाज में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र थे। विवाह जैसे पुनीत संस्कारों को दिन के समय मंदिर के प्रांगण में परिवार और आत्मीय लोगों की उपस्थिति में गरिमापूर्ण ढंग से संपन्न कराने की परंपरा को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।

सांस्कृतिक चेतना: लाखों रुपये मात्र एक दिन के दिखावे में नष्ट करने के बजाय उस धन का उपयोग नवदंपति के आर्थिक स्थायित्व अथवा समाज के सशक्तिकरण में होना चाहिए।

पुरोहित वर्ग का उत्तरदायित्व: पारदर्शिता और सम्मान

किसी भी धार्मिक सुधार में हमारे पुरोहित वर्ग की भूमिका केंद्रीय है। आज पठन-पाठन और सामाजिक परिवेश के प्रभाव से स्वयं पुरोहित वर्ग के युवाओं में भी एक असमंजस और हीनभावना देखी जा रही है। इसका समाधान व्यवस्था को पारदर्शी और सम्मानित बनाने में है:

पारदर्शिता और निश्चित शुल्क: किसी भी अनुष्ठान—चाहे वह रुद्राभिषेक हो, सत्यनारायण कथा हो या गृहप्रवेश—का समय और सेवा-शुल्क स्पष्ट होना चाहिए। जब यजमान को पहले से ज्ञात होगा कि पूजा में 1-2 घंटे लगेंगे और इसका एक सम्मानजनक निश्चित शुल्क है, तो वह संकोच मुक्त होकर नियमित रूप से धार्मिक अनुष्ठान करा सकेगा।

सामग्री का सरलीकरण: लंबी और अनावश्यक सामग्री सूचियों से यजमान भयभीत हो जाता है। पुरोहित वर्ग को आगे बढ़कर सामग्री को न्यूनतम और सुलभ रखना चाहिए, ताकि पूजा का भाव प्रधान रहे, सामग्री का बोझ नहीं।

दक्षिणा की स्वतंत्रता: निश्चित सेवा-शुल्क के अतिरिक्त यजमान अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जो भी दक्षिणा या उपहार देना चाहे, उसके लिए वह स्वतंत्र रहे। इससे पुरोहित का मान भी सुरक्षित रहेगा और यजमान का विश्वास भी बढ़ेगा।

अस्तित्व की पुकार

यदि हम अपने संस्कारों को आडंबर, ऋण और औपचारिकता से मुक्त कर पुनः भाव, अध्यात्म और सुगमता की ओर नहीं ले गए, तो नई पीढ़ी इन प्रक्रियाओं से पूरी तरह कट जाएगी। जब कोई अपनी ही संस्कृति के मूल से कटता है, तो धीरे-धीरे समाज अपनी सामूहिक शक्ति और पहचान खो बैठता है।

अपनी कमियों पर विचार करना और समय रहते उन्हें सुधारना कमजोरी नहीं, बल्कि जीवंतता का प्रमाण है। आज पुरोहित वर्ग, बौद्धिक समाज और प्रत्येक सनातन धर्मावलंबी को अपने स्तर पर यह जिम्मेदारी तय करनी होगी कि धर्म किसी के लिए आर्थिक संकट न बने, बल्कि वह संबल, शांति और एकता का आधार बने।

©️ राजहंस राजू 

💐💐🌹🌹💐💐


हमारे बच्चे

बच्चों की पसंद पर शिकायत करने से पहले अपने माहौल को देखिए


आज अक्सर बड़े लोग कहते हुए मिल जाते हैं कि “आज के बच्चों की पसंद खराब हो गई है”, “उन्हें अच्छे गाने सुनना नहीं आता”, “उनकी भाषा और सोच बिगड़ गई है।” लेकिन शायद हम शिकायत करने से पहले एक सवाल खुद से पूछना भूल जाते हैं—हम बच्चों को सुनने, देखने और सीखने के लिए आखिर दे क्या रहे हैं?


क्या हमारे घरों में कभी अच्छे गीत बजते हैं?

क्या गाड़ी में सफर करते समय संगीत सिर्फ शोर नहीं, बल्कि संवेदना और समझ का माध्यम भी होता है?

क्या शादी-ब्याह और अन्य कार्यक्रमों में हम गीतों के चयन को लेकर कोई जिम्मेदारी महसूस करते हैं?

या फिर हम भी उसी भीड़चाल का हिस्सा बन चुके हैं, जहाँ जो सबसे ज्यादा बज रहा है, वही सबसे ज्यादा बजाना जरूरी समझा जाता है?


बच्चे केवल हमारी बातों से नहीं सीखते, वे हमारे माहौल से सीखते हैं। वे देखते हैं कि घर में क्या सुना जा रहा है, किस तरह की भाषा का इस्तेमाल हो रहा है, मनोरंजन के नाम पर क्या परोसा जा रहा है और बड़े लोग किस चीज को खुशी और उत्सव का प्रतीक मानते हैं।


अगर घर में कभी कबीर नहीं गूंजते, अगर किसी सफर में पुराने गीत, लोकगीत, गजल या अर्थपूर्ण संगीत की जगह सिर्फ तेज आवाज और क्षणिक उत्तेजना को ही मनोरंजन मान लिया जाता है, तो फिर बच्चों से अचानक बेहतर पसंद की उम्मीद कैसे की जा सकती है?


यह बात किसी एक तरह के संगीत को अच्छा और दूसरे को बुरा साबित करने की नहीं है। हर पीढ़ी का अपना संगीत होता है और हर दौर अपनी अभिव्यक्ति लेकर आता है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हम बच्चों को विकल्प दे रहे हैं?


अगर किसी बच्चे को जीवन भर सिर्फ एक ही तरह की चीज दिखाई जाएगी, तो वह उसी को सामान्य मानेगा। लेकिन अगर उसके सामने संगीत की विविधता होगी—लोकगीत होंगे, शास्त्रीय संगीत होगा, गजलें होंगी, कविता होगी, अच्छे फिल्मी गीत होंगे, अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों का संगीत होगा—तो उसके पास अपनी पसंद विकसित करने का अवसर होगा।


आज समस्या बच्चों की पसंद से ज्यादा हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी की है। हम खुद जिस चीज को लोकप्रिय बनाते हैं, जिस पर पैसे खर्च करते हैं, जिसे हर समारोह में बजाते हैं और जिसे सोशल मीडिया पर लगातार बढ़ावा देते हैं, वही धीरे-धीरे समाज की पसंद बन जाती है।


फिर कुछ वर्षों बाद हम उसी समाज और उसी नई पीढ़ी को देखकर कहते हैं—

“आज के बच्चों को क्या हो गया है?”


सवाल बच्चों से पहले हमसे होना चाहिए।


क्योंकि बच्चे हमारे भाषणों से कम और हमारे व्यवहार से ज्यादा सीखते हैं।

आप उन्हें किताब पढ़ने को कह सकते हैं, लेकिन अगर वे आपको कभी पढ़ते नहीं देखते तो आपकी बात का असर सीमित होगा।

आप उन्हें अच्छा संगीत सुनने की सलाह दे सकते हैं, लेकिन अगर आपके घर, गाड़ी और कार्यक्रमों में हमेशा वही चीजें बजती हैं जिनकी आप बाद में आलोचना करते हैं, तो विरोधाभास साफ दिखाई देगा।


नई पीढ़ी को दोष देना आसान है, लेकिन उसे बेहतर विकल्प देना मुश्किल और जिम्मेदारी भरा काम है।


इसलिए अगली बार जब आपको लगे कि आज के बच्चों की पसंद, भाषा या मनोरंजन का स्तर बदल गया है, तो एक बार अपने घर के स्पीकर, अपनी गाड़ी की प्लेलिस्ट और अपने कार्यक्रमों की संगीत सूची को भी देखिए।


हो सकता है समस्या सिर्फ बच्चों में नहीं,

बल्कि उस वातावरण में भी हो जिसे हमने मिलकर सामान्य बना दिया है।


बच्चे वही नहीं बनते जो हम उन्हें बनने के लिए कहते हैं,

वे बहुत हद तक वही बनते हैं जो हम अपने जीवन में सामान्य बनाकर जीते हैं।

©️ Rajhans Raju 


 🌹❤️🙏🙏🌹🌹

**********
👇👇👇

click Images
**********

*************

**********
 🌹❤️🙏🙏🌹🌹

******

🌹❤️🙏🙏🌹🌹
*****************



***********
facebook profile 
************

***************
 🌹❤️🙏🙏🌹🌹

*********************
my 
Youtube channels 
**************
👇👇👇



**************************
my Bloggs
***************
👇👇👇👇👇



******************
****************

****************
***********


*************


**********



*************

Comments

  1. आइए अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें

    ReplyDelete
  2. कोई भी बदलाव इतना आसान नहीं होता पर कहीं न खाईं से उसकी शुरुआत करनी होती है

    ReplyDelete
  3. भारत की मूल भावना समझने की आवश्यकता है

    ReplyDelete

Post a Comment

स्मृतियाँँ

anshan

cockroach

Satta Sangharsh

Sonam wangchuk

Gadha

The Door

UGC Guideline

Bharat

Kaal Chakr