anshan

 अनशन 


मैं सोच रहा हूंँ 

अब अनशन पर बैठ ही जाऊं 

मेरी भी कुछ मांगे हैं 

सरकार से नाराज बहुत हूंँ

हालांकि जो Paper leak हुआ था 

वो फिर से अच्छे से हो गया है 

🌹🌹🌹💐💐🌹🌹

एक छात्र अपने बाप से नाराज बहुत है 

क्यों नहीं उसके लिए 

अबकी Paper खरीद सका 

प्रोफेसर साहब जेल में हैं 

जिन्होंने कोचिंग से मिलकर 

यह काम किया था 

सोचने की बात बस इतनी है 

इसका जिम्मेदार हम कितने हैं

क्योंकि हममे से ही कोई 

हर जगह पर है 

❤️❤️💐💐❤️❤️

फिर सोचा अनशन क्यों करूं 

BBC CNN वाले आए नहीं हैं

बस इतने से काम नहीं चलेगा 

ए मुद्दा पर्याप्त नहीं है 

और बहुत कुछ ले आओ

जो जो जिसको ठीक लगे

🌹🌹🌹

ए अच्छा है ऐसे ही होता है 

यूपी चुनाव से पहले 

पिछली बार किसान आंदोलन हुआ था 

याद नहीं है क्या?

इस बार भी चुनाव नजदीक है 

सारा खेल उसी का है 

और कुछ नहीं है 

Rajhans Tiwari

💐💐💐💐


आंदोलन में

एक लाचार आदमी 

*****🌹🌹🌹🌹****

मुझे मालूम नहीं था 

ए खबर है 

क्योंकि मेरे शहर में 

न जाने कितने ऐसे लोग हैं 

जो ठेला खोमचा लगाते हैं 

ए अचरज करने वाले 

क्या इन्हें देखते नहीं हैं

इन्हीं से तो सब्जी खरीदते हो 

या फिर कुछ और सामान लेते हो 

जीवन के संघर्ष आसान नहीं है 

कुछ भी आसानी से नहीं बनता 

ऐसी और कहानी सुननी हो तो 

अपने शहर के किसी भी 

सरकारी अस्पताल में चले जाओ

कुछ कर पाएं तो अच्छी बात है 

नहीं तो कोई बात नहीं है 

जब कही भी किसी से मिलिए 

बस थोड़ा सा नरम रहिए 

आपकी सहानुभूति नहीं चाहिए 

क्योंकि ए

अपनी नींव के पत्थर हैं

©️ Rajhans Raju 

🌹🌹🌹🌹🌹


फुटपाथ पर सोते लोग 

******

आंदोलन कारी युवाओं को 

रात में सड़क पर सोता देख 

एक पत्रकार दुखी हो गया 

और बड़बड़ाने लगा ....

हमने कहा सरकार के खिलाफ 

आंदोलन करने वाले 

रात में गहरी नींद सो रहे हैं 

अब इससे अच्छी सरकार 

मुमकिन है क्या?

हमें भी बताइए 

मतलब सरकार पर ऐतबार है 

कुछ नहीं होगा, हम सुरक्षित हैं

फिर मैंने अपने उसी मित्र से पूछा 

फुटपाथ पर सोने वालों को, 

इससे पहले 

लगता है नहीं देखा?

यही हाल है हमारे खबर नवीसों का, 

जरूरी है हमारे बच्चे इसे भी समझे,

आंदोलन के बहाने ही सही 

अपना ए वाला सच जानें 

वो लोग जिनका घर ही फुटपाथ है,

उनकी संख्या इनसे ज्यादा,

हर शहर के फुटपाथ पर है 

किसी रात किसी भी शहर में 

आहिस्ता से निकल कर देखिए 

तेज रफ्तार 

गुजरती गाड़ियों के शोर में 

कैसे इतनी गहरी नींद 

आ जाती है 

इसको समझिए 

बस फर्क इतना है 

ए कोई खबर नहीं है

क्योंकि ए किसी 

आंदोलन का हिस्सा नहीं हैं

©️ Rajhansraju 


🌹🌹🌹

आंदोलन जारी है

मेरे शहर में भी समर्थन/विरोध के नाम पर 

जो शहर की मुख्य सड़क है 

उसके पास में ही एक छोटा सा मैदान है 

वहां लोग इकट्ठे हुए 

निश्चित रूप से हम एक समूह थे 

जिसमें जाति और मजहब वाला भी एंगल था 

हम पहले जिसके समर्थन विरोध में रहा करते थे 

हम अभी भी उसके समर्थन विरोध में है 

यही समर्थन विरोध हमारा मुख्य मुद्दा है 

हमारे समूह में कुछ बुद्धिजीवी भी हैं 

जो हमें समझाते रहते हैं 

कैसे हमको किससे कब खतरा है 

अब हमारा जो जातीय मजहबी समूह है 

अपने जातीय समूह के 

नेताओं की बात बड़ी अच्छी लगती है 

क्योंकि कई सालों से हमारा जो नेता है 

हमारी जो विचारधारा का आदमी है 

वह सत्ता से दूर है और 

उसका NGO वाला बिजनेस भी कमजोर हो गया है 

ऐसे में उसका सत्ता में आना बहुत जरूरी है 

जबकि सामने वाला जो सरकार में है 

वह बड़ा ही होशियार, शातिर और चालक है 

वह भी यही पैंतरे आजमाता है

इन्हीं से सीख कर सत्ता में आया है

हर समय उसे माहौल गर्म रखना है 

क्योंकि यहां अपने मतदाता को 

अपने पक्ष में तैयार रखना होता है 

कहीं वह  ठंडा न पड़ जाए 


क्योंकि चुनाव का जो परिणाम 

इसी से आता है कि 

उसके मतदाता समूह को लगे 

उसका नेता उसके लिए कुछ कर रहा है 

कई साल बीत गए 

मेरा नेता अब भी सत्ता से बाहर है 

अब वह नए-नए आइडिया आजमाता रहता है 

कैसे दूसरे तरफ के जो मतदाता है 

उनको तोड़ा जाए 

क्योंकि सिर्फ अपने जाति और मजहब वाले 

मतदाताओं से काम नहीं होगा 

तब कुछ ऐसे जरुरी मुद्दे होते हैं 

जिन्हें उठाया जाता है 

जो सबको अच्छे लगते हैं

उनसे कोई इनकार नहीं कर सकता है 

जैसे शिक्षा पर्यावरण महिला बेरोजगारी 

सुरक्षा स्वास्थ्य और भी दो-चार होते हैं 

जो छूट गए होंगे निश्चित रूप से 

जो सबको भाते हैं 

भाई यह कितने बेहतर हो

पहले से और अच्छा हो 

यह बात किसे नहीं भाएगी 

पर इसमें जो गिरावट है 

या फिर और बेहतर जो हो सकता है 

इसकी कोई सीमा नहीं है 

पूरी दुनिया में यही मुद्दा है 

जब कोई मुद्दा नहीं रह जाता है 

तब यह चलता है 

और जो पार्टी सत्ता में है 

उसको घेरने का यह एक बेहतर तरीका है 

जबकि वास्तव में यह मुद्दा 

कोई मुद्दा नहीं है 

सत्ता में आने का बस एक रास्ता है 

एक दिन या एक दशक में 

इनमें कोई बहुत सुधार हो जाए 

यह संभव नहीं है 

जब तक अनुशासन और नैतिक मूल्य 

नहीं समझ में आएंगे 

इनमें से कुछ भी बेहतर नहीं हो पाएगा 

कोई भी सरकार हो 

अब खुद आप करें फैसला 

जब मैंने 

अपने जाति मजहब वालों से 

कुछ सच्चे सवाल किये

जिसका सच सबको मालूम है 

पर एजेंडा के अनुरूप नहीं है 

मैं उस रैली का तब से हिस्सा नहीं हूंँ

और कोई मेरे साथ नहीं है 

अछूत बहिष्कृत बन जाओगे 

जब सच्ची बात करोगे 

किसी पार्टी का झंडा लेकर 

तब तुम नहीं चलोगे

©️ Rajhans Raju

🌹🌹🌹🌹


नेताजी 

सफल नेता बनकर 

कोई तभी निकलता है 

जब आंदोलन में लाठी चार्ज हो 

उससे पहले नेता सुरक्षित हो ले 

मनमाफिक फोटो video मिल जाए, 

अब सहानुभूति,बयानबाजी का नम्बर है 

नेता बाहर आएगा, कई दौर की वार्ता होगी, 

किस बात के लिए आंदोलन हो रहा था, 

अब यह किसी को याद नहीं, 

नेता जी का चेहरा चमक चुका है, 

मार्केट में नया खिलाड़ी आ गया है, 

उसके दोस्त अब उससे जलते हैं 

क्योंकि डर इस बात का है, 

वह उनसे आगे निकल न जाए, 

उनका अपना बच्चा 

कहीं बाप न बन जाए

छात्र राजनीति हो, 

या फिर किसान राजनीति,

नेतागीरी के सबसे पुराने 

अजमाए साधन हैं, 

जिसमें पढ़ाई कैसे हो, 

अभिभावक, अध्यापक की 

नहीं कोई चर्चा है, 

खेती पर भी बात नहीं, 

कैसे खेती करनी है,

बाजार से जुड़ने खातिर,  

बताओ किसान को क्या करना है, 

कैसे बेहतर हो सकते हैं 

उसमें खुद क्या करना है, 

या फिर नेता जी की किस्मत चमके, 

इसके लिए 

डंडा लेकर चलना है 

©️Rajhans Raju


🌹🌹💐💐🌹🌹🌹

GEMINI की व्याख्या 

आपकी यह रचना राजनीति के उस कड़वे सच और अवसरवादिता पर बहुत तीखा और सटीक कटाक्ष करती है, जिसे अक्सर जन-आंदोलनों के ग्लैमर के पीछे छिपा दिया जाता है।

## 📌 काव्य-संवेदना और मुख्य विचार

यह कविता केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि आंदोलनों की आड़ में पनपने वाली **'इवेंट-आधारित राजनीति'** की पूरी क्रोनोलॉजी को उजागर करती है:

 * **परसेप्शन और मीडिया-मंचन:** आंदोलन की मूल वजहों से ध्यान हटाकर कैसे केवल "फ़ोटो, वीडियो और सहानुभूति" को केंद्र में लाया जाता है।

 * **मुद्दों का गायब होना:** शिक्षा, अभिभावक-अध्यापक संवाद, खेती के बाजार-तंत्र या वास्तविक सुधारों की बात करने के बजाय केवल भीड़ और डंडे की राजनीति को बढ़ावा देना।

 * **व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा:** कैसे छात्र या किसान राजनीति कई बार जनसेवा का माध्यम न बनकर सिर्फ एक "नया खिलाड़ी" गढ़ने की प्रयोगशाला बन जाती है।

## 💡 कविता के सशक्त पहलू

> **"लाठी चार्ज से पहले नेता सुरक्षित हो ले / उसे मनमाफिक फोटो video मिल जाए..."**

यह पंक्तियाँ आज के डिजिटल और मीडिया-संचालित युग के उस यथार्थ को दर्शाती हैं जहाँ संघर्ष से अधिक संघर्ष का "दृश्य" (Visual) महत्वपूर्ण हो गया है।

> **"किस बात के लिए आंदोलन हो रहा था / अब यह किसी को याद नहीं है..."**

यहाँ आंदोलनों के भटकाव और अंततः उनके 'मुद्दा-विहीन' हो जाने की त्रासदी को बहुत सादगी लेकिन गहराई से पकड़ा गया है।

> **"खेती पर भी बात नहीं... / बताओ किसान को क्या करना है... / या फिर नेता जी की किस्मत चमके / इसके लिए डंडा लेकर चलना है"**

कविता का यह हिस्सा सबसे ज्यादा विचारणीय है—यह सीधे-सीधे रचनात्मक राजनीति बनाम विघटनकारी राजनीति के फर्क को रेखांकित करता है।

## 📑 शैली और अभिव्यक्ति

 * **सपाटबयानी में पैनापन:** कविता में बिना किसी भारी-भरकम शब्दजाल के सीधी, सहज और बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है, जो सीधे पाठक को सोचने पर मजबूर करती है।

 * **व्यंग्य की स्पष्टता:** रचना में किसी प्रकार का लाग-लपेट नहीं है; यह जन-आंदोलनों के व्यापारीकरण पर एक बेबाक और यथार्थवादी प्रहार है।

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कुछ साल पहले 

मुझे भी गुस्सा बहुत आता था 

हर बात पर नाराज़ हो जाता था 

किसमें क्या कमी है 

मैं खूब देखता था 

मेरी इन खामियों को नजर अंदाज 

करने वाला कोई मेरे घर में मौजूद था 

मैं कुछ कर सकूंँ 

वह मेरी हिम्मत बन जाता था 

उस शख्स का फोन दिन में 

कम से कम एक बार 

जरूर आता था 

बस इतना पूछता

"खाना खाया ठीक हो"

अब एक अर्सा हो जाता है 

कोई फोन नहीं आता 

बाबू जी को गये तीन साल हो गए 

फो़न पर बाबू जी के नम्बर से भी 

कोई फोन नहीं आता 

वैसे नाराज होना तो 

काफी पहले छोड़ दिया था 

जो मनाते थे फिक्र करते थे 

अब कोई साथ नहीं है 

पता नहीं किस वक्त क्या हो 

बहुत डर लगता है 

अपनों से नाराज होना 

इसलिए छोड़ दिया है 

अक्सर कुछ तूं तूं मैं मैं होती है 

पर उसे उसी क्षण भूल जाता हूंँ 

साथ बैठा अब भी चाय पी रहा हूंँ

कुछ देर पहले ही हमारी लड़ाई हुई थी 

जिंदगी बिना उलझन कहां चलती है 

एक सुलझती नहीं, दूसरी उलझ जाती है 

ऐसे ही तब से सब ठीक लगंने लगा है 

समझाने के बजाय,

समझने की कोशिश करने लगा हूंँ

खूब जी भरकर बातें करता हूंँ

हमें कोई सुने यही चाहता हूंँ

उसकी एक शर्त है 

मैं भी खूब उसकी सुनूं 

वो भी तो यही चाहता है 

जब रोने का मन करे 

जी भरकर रो लेना चाहिए 

इज्जत बनाने के चक्कर में 

घुटना नहीं चाहिए 

मेरे अपने मेरे लिए परेशान हैं 

वो भी एकदम मेरी तरह हैं

उनसे भी सब संभल नहीं पाता 

उनकी गलती यही है 

मेरी तरह वह भी 

मुझसे वैसे ही उम्मीद करते हैं 

जब यह बात ऐसे सोचने लगा

तब से किसी से नाराज नहीं होता 

सिर्फ बतकही होती है 

जिसे भूल जाता हूंँ

खाने में क्या है 

जरा ए बताना 

©️ Rajhans Raju 

💐💐🌹❤️❤️😍💐💐🌹 

Love you jindagi 

अभी तो शुरुआत है, 

बहुत दूर तक चलना है 

बहुत कुछ करना है,

🌹🌹🌹🌹

शरारती बच्चों को पढ़ाना 

आसान काम नहीं होता 

उसके लिए उनसे ज्यादा ...

खैर आपकी खैर तभी तक है 

जब तक उन्हें यह पता न लगे 

उन्हें पढ़ाया जा रहा है 

उनमें से किसी एक को भी 

यह समझ में आ गया तो ..

सफल शिक्षक की पहचान यही है 

रोज नए तरीके ले आए

पढ़ना नहीं 

खिलखिलाकर हंसना है

सिर्फ यही बताना है 

बच्चे ही तो हैं ..

धीरे धीरे जो चाहते हैं 

वह भी सीख जाएंगे 

©️ Rajhans Raju 

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Comments

  1. मैं सोच रहा हूंँ

    अब अनशन पर बैठ ही जाऊं

    मेरी भी कुछ मांगे हैं

    सरकार से नाराज बहुत हूंँ

    हालांकि जो Paper leak हुआ था

    वो फिर से अच्छे से हो गया है

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