Bharat

  भारतबोध की यात्रा: भूगोल, दार्शनिक विरासत

और औपनिवेशिक विमर्श से मुक्ति का प्रश्न

लेखक: राजहंस राजू

१. भारत को जानना: भूगोल और भारतवर्ष की ऐतिहासिक चेतना

किसी भी राष्ट्र को उसकी ऐतिहासिक जड़ों और दार्शनिक विकास को समझे बिना जानना असंभव है। जब हम 'भारत' की बात करते हैं, तो उसका दायरा केवल वर्तमान सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह 'भारतवर्ष' की उस वृहद संकल्पना से जुड़ता है जिसे आज भारतीय उपमहाद्वीप कहा जाता है।

भौगोलिक विस्तार: अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे क्षेत्र ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से इसी भूगोल की चेतना से जुड़े रहे हैं।

समय की विभाजक रेखा: १५ अगस्त १९४७ और २६ जनवरी १९५० की तिथियां राजनीतिक सीमाओं के निर्धारण का प्रस्थान बिंदु हैं। १९५० से पूर्व का इतिहास मूलतः समूचे 'भारतवर्ष' का साझा सांस्कृतिक इतिहास है, जबकि उसके बाद का समय अलग-अलग संप्रभु राष्ट्रों की राजनीतिक यात्रा का कालखंड है।

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और राष्ट्रों की संप्रभुता का सम्मान करते हुए भी, यदि इस पूरे क्षेत्र के समाज को अपनी मूल पहचान तलाशनी है, तो उसे भारतवर्ष के साझा इतिहास-बोध को स्वीकारना ही होगा।

२. भारतीय दर्शन की मूल प्रकृति: विविधता में सहज सह-अस्तित्व

भारत में विकसित दार्शनिक धाराएं—सनातन, बौद्ध, जैन और सिख—किसी केंद्रीय सत्ता या संकीर्ण चौखटे से नहीं बंधी थीं। यह सत्य के अन्वेषण की विभिन्न वैचारिक परंपराएं (Schools of Thought) थीं।

पारिवारिक व सामाजिक स्वतंत्रता: एक ही छत के नीचे शैव, वैष्णव, शाक्त, बौद्ध या नास्तिक बिना किसी आंतरिक संघर्ष के सहज रूप से सह-अस्तित्व में रहते थे।

तर्क और शास्त्रार्थ की परंपरा: काशी जैसी ज्ञान-पीठों की महत्ता इसलिए थी क्योंकि वहां किसी भी नए विचार को प्रमाण और शास्त्रार्थ की कसौटी पर परखा जाता था। आदि शंकराचार्य से लेकर गौतम बुद्ध तक, सभी ने अपनी दृष्टि को शास्त्रार्थ के माध्यम से स्थापित किया। यह चिंतन की असीम स्वतंत्रता का जीवंत उदाहरण था।

३. आक्रांताओं का दौर: भौतिक और सांस्कृतिक विनाश

कालांतर में भारत को बाह्य आक्रांताओं के गंभीर हमलों का सामना करना पड़ा, जिनका उद्देश्य केवल शासन करना नहीं बल्कि यहां की मूल पहचान को नष्ट करना भी था।

प्रतिरोध का विस्मृत इतिहास: पश्चिम के मार्ग से हुए इस्लामी आक्रमणों का भारत के समाज ने शताब्दियों तक कड़ा प्रतिरोध किया। इतिहास के पन्नों में इस दीर्घकालिक संघर्ष और विजय गाथाओं को अक्सर कम स्थान दिया गया।

सांस्कृतिक प्रतीकों का विध्वंस: बामियान की ऐतिहासिक बुद्ध प्रतिमाओं के विनाश से लेकर नालंदा के पुस्तकालय को जलाने और उत्तर भारत के प्रमुख आस्था केंद्रों (अयोध्या, काशी, मथुरा) के विध्वंस तक—यह प्रयास समाज के आत्मसम्मान और ज्ञान-परंपरा को तोड़ने का था।

पहचान का संकट: बल, भय और प्रलोभन के माध्यम से हुआ धर्मांतरण केवल मत का परिवर्तन नहीं था, बल्कि वह अपनी ही मूल जड़ों से अलगाव की एक ऐतिहासिक त्रासदी भी थी।

४. ब्रिटिश शासन: वैचारिक नियंत्रण और आधुनिक विमर्श का खेल

इस्लामी शासन के बाद औपनिवेशिक शक्तियों का आगमन हुआ। अंग्रेजों के पास एक ऐसा साधन था जो पहले के आक्रांताओं के पास नहीं था—छापाखाना और संगठित शिक्षा व्यवस्था।

मानसिक संरचना का औपनिवेशीकरण: मैकाले की शिक्षा नीति का स्पष्ट उद्देश्य समाज के मौलिक चिंतन को नियंत्रित करना था। यदि प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों के मन में यह बैठा दिया जाए कि कौन सी भाषा, वेशभूषा और ज्ञान 'सभ्य' है और कौन सा 'हीन', तो आने वाली पीढ़ियां स्वतः औपनिवेशिक ढांचे की वाहक बन जाती हैं।

हीनभावना का निर्माण: पारंपरिक वेशभूषा (धोती-कुर्ता) और भारतीय ज्ञान-परंपरा को पिछड़ा ठहराया गया, जबकि पश्चिमी जीवनशैली (सूट-बूट) को आधुनिकता का पर्याय बना दिया गया।

संस्थागत विभाजन: समाज के भीतर जाति, वर्ण और क्षेत्र के आधार पर खाई को गहरा करने के लिए व्यवस्थित नैरेटिव गढ़े गए, ताकि सामाजिक सामंजस्य को खंडित किया जा सके।

५. स्वतंत्रता के बाद की निरंतरता और अधूरे सुधार

आजादी के समय सुभाष चंद्र बोस जैसे विचारकों की चिंता यही थी कि कहीं सत्ता का हस्तांतरण केवल 'गोरे अंग्रेजों' से 'काले अंग्रेजों' के हाथ में न रह जाए।

प्रशासनिक व संवैधानिक ढांचा: स्वतंत्रता के बाद भी १९३५ के भारत सरकार अधिनियम की छाप प्रशासनिक तंत्र पर गहरी रही। जिस नौकरशाही ढांचे को औपनिवेशिक नियंत्रण के लिए बनाया गया था, उसे ही स्वतंत्र भारत की मुख्य व्यवस्था के रूप में जारी रखा गया।

चीन से तुलनात्मक दृष्टि: जहां चीन जैसे देशों ने औपनिवेशिक और विदेशी शासनों से मुक्त होते ही अपनी भाषा, शिक्षा और प्रशासनिक प्रतीकों को अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के अनुकूल पुनर्गठित किया, वहीं भारत इस सांस्कृतिक वि-औपनिवेशीकरण (Decolonization) की प्रक्रिया को गति देने में पीछे रहा।

६. समकालीन चुनौतियाँ: लोकतंत्र, नैरेटिव और निरंतर राष्ट्र-निर्माण

राष्ट्र-निर्माण कोई एक बार में पूरी हो जाने वाली प्रक्रिया नहीं है, यह एक सतत अभ्यास है।

संसदीय मर्यादा और विरोध की संस्कृति: ब्रिटिश काल में व्यवस्था को गिराने के लिए तोड़फोड़ और असहयोग उचित साधन थे क्योंकि वह औपनिवेशिक शोषण की सत्ता थी। किंतु आज के लोकतांत्रिक भारत में चुनी हुई सरकारों और जनमत का सम्मान अनिवार्य है। चुनावी हार-जीत को स्वीकार करना ही लोकतंत्र की प्राथमिक कसौटी है।

वैश्विक मीडिया और नैरेटिव युद्ध: आज की मानसिक गुलामी का माध्यम डिजिटल सूचना तंत्र और अंतरराष्ट्रीय मीडिया बन चुका है। भारत की सकारात्मक उपलब्धियों, नवाचारों और सांस्कृतिक शक्ति को नजरअंदाज कर आंतरिक समस्याओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना उसी औपनिवेशिक मानसिकता का विस्तार है।

जब तक कोई समाज अपने इतिहास का मूल्यांकन स्वयं अपनी दृष्टि से नहीं करता, तब तक उसकी स्वतंत्रता अधूरी रहती है। भारत को यदि वास्तविक अर्थों में वैश्विक मंच पर अपनी गरिमा स्थापित करनी है, तो उसे अपनी दार्शनिक जड़ों को पहचानना होगा, औपनिवेशिक हीनभावना से मुक्त होना होगा और शिक्षा से लेकर विमर्श तक 'स्व' के भाव को जागृत करना होगा।

©️ Rajhansraju

🌹🌹🌹🌹💐💐🌹🌹🌹

{2}

आंदोलन का उद्योग, सिलेक्टिव नैरेटिव और हमारा नैतिक पाखंड

हमारे देश में आंदोलन अब सामाजिक चेतना का माध्यम कम और एक सुनियोजित कॉरपोरेट उपक्रम अधिक बन चुका है। लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार सर्वोपरि है, लेकिन जब यह अधिकार सत्ता-वियोग की हताशा को छुपाने और रोजी-रोटी चलाने का जरिया बन जाए, तब आंदोलन अपनी आत्मा खो देता है।

अक्सर देखा जाता है कि जब कोई राजनीतिक दल या विचारधारा सत्ता से बाहर हो जाती है, तो अचानक देश, संविधान, संस्कृति, और स्थानीय पहचान खतरे में दिखने लगते हैं। विडंबना यह है कि सत्ता से बाहर बैठे इन समूहों के पास न तो शिक्षा सुधार का कोई ठोस खाका होता है और न ही सामाजिक विसंगतियों को दूर करने का कोई वैकल्पिक दृष्टिकोण। मूल समस्या केवल इतनी है कि सत्ता में उनकी पसंद का दल या व्यक्ति नहीं है। जनता हर बार बेहतर विकल्प की तलाश करती है, लेकिन बदले में उसे नए विचारों के बजाय घिसे-पिटे राजनीतिक पैंतरे ही मिलते हैं।

'आंदोलनजीवी' उद्योग का आंतरिक ढांचा

यह उपक्रम अब बाकायदा एक स्थापित व्यवसाय का रूप ले चुका है, जहां टूलकिट, सोशल मीडिया मैनेजमेंट और नैरेटिव तैयार करने वाले पेशेवर काम कर रहे हैं। इस पूरे तंत्र को मुख्य रूप से तीन स्तरों पर समझा जा सकता है:

  1. आंदोलन-वट (थिंक-टैंक और नीति-निर्धारक): यह वह शीर्ष 10-15 बौद्धिक चेहरे हैं, जो उम्रदराज और मीडिया-फ्रेंडली होते हैं। ये हर विषय—चाहे वह अर्थव्यवस्था हो, विदेश नीति, पर्यावरण या चुनाव प्रणाली—के विशेषज्ञ बन जाते हैं। बड़े-बड़े एनजीओ, अंतरराष्ट्रीय फंडिंग और विदेशी मीडिया इनके प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। इनका मुख्य काम 100 सामान्य घटनाओं में से उन दो घटनाओं को चुनना (Selective Truth) होता है, जिनमें जाति, लिंग या मजहब का कोण फिट बैठता हो, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को कटघरे में खड़ा किया जा सके।
  2. आंदोलन-रत्न (मैनेजर और ग्राउंड ऑपरेटर): इस श्रेणी में वे लोग आते हैं जो हैशटैग कैंपेन चलाने, भीड़ जुटाने और मंच से भावनात्मक भाषण देने में माहिर होते हैं। इनका काम नैरेटिव को डिजिटल स्पेस में ट्रेंड कराना और जनसमूह को खास भावनात्मक दिशा में धकेलना होता है।
  3. कंटेंट क्रिएटर और डिजिटल दर्शक: आजकल के धरनों में मूल आंदोलनकारियों से अधिक संख्या मोबाइल पत्रकारों, यूट्यूबरों और इन्फ्लुएंसर्स की होती है। 500 लोगों के धरने पर 1500 क्रिएटर पहुंच जाते हैं, जिनका मकसद केवल व्यूज, रीच और टीआरपी बटोरना होता है। यह वर्ग आंदोलन को एक डिजिटल तमाशे में तब्दील कर देता है।
  4. सुविधाभोगी विरोध और संडे एक्टिविज्म

विरोध प्रदर्शनों का स्वरूप अब इतना सुविधाभोगी हो चुका है कि इसके लिए भी 'टाइम स्लॉट' की दरकार महसूस होने लगी है। उत्तर भारत की चिलचिलाती धूप और सुबह की नींद खराब न हो, इसलिए आदर्श स्थिति तो यही लगती है कि हर रविवार दोपहर 12 से 5 बजे के बीच दिल्ली, राज्य की राजधानियों और जिला मुख्यालयों में प्रदर्शन के लिए जगह आरक्षित कर दी जाए। आराम से सोकर उठिए, कोल्ड कॉफी का घूंट भरिए, हाथ में मोबाइल उठाइए और 'लोकतंत्र बचाओ' के नारे लगा दीजिए।

व्यक्तिगत पाखंड बनाम सामाजिक सुधार

इस पूरे परिदृश्य का सबसे चिंताजनक पहलू हमारा व्यक्तिगत दोगलापन है।

  • भ्रष्टाचार विरोधी टी-शर्ट और काली कमाई की छत: भगत सिंह की तस्वीर वाली टी-शर्ट पहनकर भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगाने वाले कई युवा उन परिवारों से आते हैं, जिनके ठाठ-बाट सरकारी पिता की ज्ञात आय से मेल नहीं खाते। अगर घर में खड़ी लग्जरी गाड़ी और आलीशान मकान का स्रोत भ्रष्टाचार है, तो उस सुख-सुविधा का उपभोग करते हुए व्यवस्था को कोसना केवल पाखंड है।
  • पेपर लीक और सामाजिक सहभागिता: परीक्षाओं में पेपर लीक होना निसंदेह एक गंभीर अपराध है, लेकिन क्या यह तंत्र केवल ऊपर से भ्रष्ट है? जब तक अभिभावक पैसे देकर पेपर खरीदने को तैयार रहेंगे, छात्र मेहनत के बजाय शॉर्टकट तलाशेंगे, और परीक्षा केंद्रों पर तैनात शिक्षक व कर्मचारी इसमें हिस्सेदार बनेंगे, तब तक केवल व्यवस्था पर दोष मढ़ने से समाधान नहीं निकलेगा। बिना मांग के आपूर्ति का यह काला बाजार टिक ही नहीं सकता।

. स्वाधीनता संग्राम और आज के लोकतंत्र का अंतर

हमें यह मूलभूत अंतर समझना होगा कि 1947 से पहले हम एक विदेशी सत्ता के खिलाफ लड़ रहे थे। वहां हड़ताल, बहिष्कार और सविनय अवज्ञा एक विदेशी दमनकारी ढांचे को उखाड़ फेंकने के औजार थे।

किंतु स्वतंत्र भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है। यहां जनादेश का सम्मान प्राथमिक शर्त है। यदि कोई विपरीत विचारधारा वाला दल लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव जीतता है, तो उसका उपाय हिंसा, सड़क जाम या राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना नहीं है। सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना राष्ट्रहित के खिलाफ है।

लोकतंत्र में विरोध का सही रास्ता है—अपनी पराजय को स्वीकार करना, जनता के बीच जाना, अपना वैकल्पिक विजन प्रस्तुत करना और अगले पांच साल तक जनसमस्याओं पर ठोस काम करके चुनावी प्रक्रिया के जरिए खुद को बेहतर साबित करना। देश में वास्तविक बदलाव किसी सुनियोजित धरने या टूलकिट से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदारी और संवैधानिक मर्यादाओं के पालन से ही आएगा।

©️ Rajhans Raju

🌹🌹🌹🌹

{3}

वैचारिक विमर्श और नैरेटिव का समाजशास्त्र: एक विश्लेषण

नैरेटिव (कथात्मक विमर्श) का निर्माण कैसे होता है, इस बात को गहराई से समझने की आवश्यकता है। अक्सर कुछ ऐसी बातें और नारे बिल्कुल सामान्य प्रतीत होते हैं, जिन्हें सुनकर पहली नजर में यही लगता है—"इसमें गलत क्या है? यह कह दिया गया तो क्या हर्ज है?" किंतु इनके अर्थ बेहद व्यापक होते हैं, जो आम जनमानस को गहरे स्तर पर प्रभावित करते हैं। जाने-अनजाने लोग इन्हें आत्मसात करने लगते हैं और उनकी विचार-प्रक्रिया उसी दिशा में मुड़ जाती है। सोचने और देखने का नजरिया उसी तय रास्ते पर चलने लगता है।

स्पष्ट है कि मनुष्य के सोचने की दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी चिंतन-प्रक्रिया का ताना-बाना कैसे बुना गया है, और यही निर्माण-प्रक्रिया भविष्य की सामाजिक दिशा तय करती है।

विमर्श का चयन और वैचारिक एकपक्षीयता

जब हम 'ब्राह्मणवाद' या 'मनुवाद' जैसे शब्दों को देखते हैं, तो पहलीदृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक ऐसी व्यवस्था की आलोचना है जिसमें खामियाँ थीं और इन्हीं शब्दों के माध्यम से उनका विरोध किया जा रहा है। यह माना जाता है कि यह उन ताकतों के प्रतीक हैं जो शोषक हैं और वंचितों के खिलाफ हैं। परंतु, वास्तविकता इसके उलट है। ये शब्द मूलतः समग्र हिंदू और भारतीय परंपरा के विरोध में एकतरफा स्वर मुखरित करने के लिए गढ़े गए हैं।

इसके पीछे एक खास नैरेटिव सेट किया जाता है कि एक विशिष्ट धर्म (यानी हिंदू धर्म) का नेतृत्व करने वाला वर्ग ही सारी समस्याओं की जड़ है और इसके मूल में प्राचीन ग्रंथ या मनुस्मृति है। इसे आधुनिकता और विज्ञानवाद के साथ इस तरह जोड़ दिया जाता है कि यदि आपको खुद को बुद्धिमान और प्रगतिशील साबित करना है, तो आपको अनिवार्य रूप से एकतरफा विरोध के पाले में खड़ा होना होगा और कुछ खास विचार-समूहों (टूलकिट गिरोह) की हाँ में हाँ मिलानी होगी।

दोहरे मापदंड और चयनात्मक विरोध

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में उदारवादी, आधुनिक और वैज्ञानिक सोच का है, तो वह किसी भी धर्म, मजहब या पंथ में मौजूद कुरीतियों और सामाजिक समस्याओं का समान रूप से विरोध करेगा। यदि सैद्धांतिक तौर पर ऐसा है, तो विरोध के स्वर सभी कुप्रथाओं के खिलाफ उठने चाहिए और उन्हें उसी मुखरता से उठाया जाना चाहिए—जैसे 'मुल्लावाद' या 'पादरीवाद' के खिलाफ आवाज उठाना, या घूंघट-बुर्के जैसी कुप्रथाओं से आजादी की बात करना।

परंतु, जैसे ही 'मुल्ला' या 'पादरी' जैसे शब्द चर्चा में आते हैं, वे सीधे इस्लाम और ईसाइयत से जुड़ जाते हैं। यहीं से तथाकथित टूलकिट और एनजीओ-प्रायोजित संगठनों का दोहरा चरित्र बेनकाब हो जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि 'ब्राह्मणवाद' या 'मनुवाद' के नाम पर गढ़े गए नारे उन ताकतों द्वारा गढ़े और पोषित हैं जो गुप्त या प्रत्यक्ष रूप से अन्य पंथों का विस्तार करना चाहती हैं। इस एजेंडे में हिंदुओं का धर्मांतरण एक प्रमुख बिंदु रहा है। रणनीति यह होती है कि हिंदुओं को आपस में वैचारिक रूप से विभाजित कर दिया जाए, ताकि धर्मांतरण की प्रक्रिया सहज हो सके। मानसिक गुलामी का शिकार एक बड़ा हिंदू वर्ग खुद को 'सेकुलर' और 'उदारवादी' साबित करने की होड़ में अनजाने में इन्हीं ताकतों का सबसे बड़ा समर्थक बन जाता है।

वैचारिक शून्यता और आत्ममंथन की आवश्यकता

दूसरी ओर, मुस्लिम और ईसाई संगठनों से जुड़े लोग व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर अपने वैचारिक हितों और शत्रु-बोध को लेकर पूरी तरह स्पष्ट रहते हैं। उन्हें पता होता है कि उन्हें किस वैचारिक ध्रुव पर खड़ा होना है और किसके साथ खड़े होने से क्या परिणाम मिलेंगे।

इसके विपरीत, हिंदू समाज अभी भी अंतहीन बहस, शाब्दिक जुगलबंदी और संशय में उलझा हुआ है—"इससे हमारा क्या मतलब है? रोजी-रोटी चल रही है, बहुत है। हमें क्या पड़ी है? सब मूर्ख हैं, जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Change) और धर्म की बातें नेताओं का नाटक है।" ऐसे ही कुछ घिसे-पिटे तर्कों के साथ अपनी सुख-सुविधाओं तक सीमित रहना और कायरता छिपाने के लिए 'अहिंसा परमो धर्म:' का अधूरा पाठ दोहराना आज की वास्तविकता बन गया है।

जब जातीय चेतना एकतरफा जागृत होती है, तो व्यक्ति 'ब्राह्मणवाद से आजादी' के नारों के बीच दूसरों के तय किए एजेंडे पर चल पड़ता है। इसके ऐतिहासिक परिणाम हमारे सामने हैं—विभाजन के रूप में पाकिस्तान और बांग्लादेश का निर्माण, और आज भी 'भाई-चारा कमेटी' या 'हम सब एक हैं' के खोखले नारों के नाम पर वैचारिक दिवालियापन का जारी रहना। यदि आप अपनी ऐतिहासिक भूलों से सबक नहीं लेते, तो यह वैचारिक शून्यता भविष्य में कई अन्य संकटों को जन्म देती रहेगी।

निष्पक्षता और बौद्धिक ईमानदारी की कसौटी

आज के तथाकथित सेक्युलर वर्ग की स्थिति यह है कि वे एकतरफा विलाप करने में माहिर हैं। उन्हें दूसरे मजहब या पंथ के दायरे में मौजूद कुरीतियों पर सवाल उठाने या सुधार की बात करने की कोई स्वतंत्रता नहीं होती। यदि आप 'मुल्लावाद' या 'पादरीवाद' के खिलाफ नारे नहीं लगाते, तो आपका यह विरोध पाखंडपूर्ण और एकतरफा एजेंडा मात्र बनकर रह जाता है।

लोकतंत्र में अपनी बात रखना, व्यवस्था की आलोचना करना और नए विमर्श गढ़ना नागरिक का अधिकार और एक कारगर हथियार है। लेकिन जब आप ब्राह्मणवाद या मनुवाद का मुखर विरोध करते हैं और साथ ही मुल्लावाद या पादरीवाद के खिलाफ चुप्पी साध लेते हैं, तो आपका यह दोहरा चरित्र पूरी तरह बेनकाब हो जाता है।

सच्चा उदारवाद और संविधानवाद वही है जो हर प्रकार के अंधविश्वास, कट्टरता और सामाजिक कुरीतियों पर एक समान कसौटी पर प्रहार करे। एक पंथ की रूढ़ियों को अंधविश्वास और दूसरे पंथ की समान कुरीतियों को तार्किकता का जामा पहनाना बौद्धिक बेईमानी के सिवाय कुछ नहीं है। आज समाज के पास सूचना और विश्लेषण के इतने स्रोत उपलब्ध हैं कि हर व्यक्ति इस वैचारिक एजेंडे और पाखंड को सहज ही समझ सकता है।

 ।। जय हिंद, जय भारत, वंदे मातरम् ।। 

©️ Rajhansraju

**********
👇👇👇

click Images
**********

**********
******
🌹❤️🙏🙏🌹🌹
*****************


***********
facebook profile 
************

***************
 🌹❤️🙏🙏🌹🌹

*********************
my 
Youtube channels 
**************
👇👇👇



**************************
my Bloggs
***************
👇👇👇👇👇



******************
****************

****************
***********


*************
**********



*************

Comments

  1. आइए खुद को और बेहतर ढंग से जानें

    ReplyDelete

Post a Comment

स्मृतियाँँ

anshan

cockroach

Satta Sangharsh

Sonam wangchuk

Gadha

Adambar se mukti

The Door

UGC Guideline

Kaal Chakr