गाँव छोड़कर बहुत दूर चला आया है आम का पेड़ बहुत याद आता है वह सोचता है गाँव वैसा ही होगा एक दूसरे के लिए खूब सारा वक्त होगा जबकि शहर ने कोई कसर छोड़ा नहीं है धीरे-धीरे सब कांक्रीट में बदल रहा है शहर के हाथ में गजब का जादू है जिसे छू लेता है वह पत्थर बन जाता है ए बोनसाई बन जाने में हम सबने हुनर दिखाया है अपनी ही दुनिया में अनाम होकर गमलों में न जाने क्या लगाया है
भारतबोध की यात्रा: भूगोल, दार्शनिक विरासत और औपनिवेशिक विमर्श से मुक्ति का प्रश्न लेखक: राजहंस राजू १. भारत को जानना: भूगोल और भारतवर्ष की ऐतिहासिक चेतना किसी भी राष्ट्र को उसकी ऐतिहासिक जड़ों और दार्शनिक विकास को समझे बिना जानना असंभव है। जब हम 'भारत' की बात करते हैं, तो उसका दायरा केवल वर्तमान सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह 'भारतवर्ष' की उस वृहद संकल्पना से जुड़ता है जिसे आज भारतीय उपमहाद्वीप कहा जाता है। भौगोलिक विस्तार: अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे क्षेत्र ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से इसी भूगोल की चेतना से जुड़े रहे हैं। समय की विभाजक रेखा: १५ अगस्त १९४७ और २६ जनवरी १९५० की तिथियां राजनीतिक सीमाओं के निर्धारण का प्रस्थान बिंदु हैं। १९५० से पूर्व का इतिहास मूलतः समूचे 'भारतवर्ष' का साझा सांस्कृतिक इतिहास है, जबकि उसके बाद का समय अलग-अलग संप्रभु राष्ट्रों की राजनीतिक यात्रा का कालखंड है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और राष्ट्रों की संप्रभुता का सम्मान करते हुए भी, यदि इस पूरे क्षेत्र के समाज को अपनी म...
आडंबर से मुक्ति सनातन का शाश्वत प्रवाह: काल, कर्मकांड और नव-परिष्कार भारतीय चिंतन परंपरा और सनातन समाज की सबसे विलक्षण शक्ति रही है— देश, काल और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को पुनःपरिभाषित करने की क्षमता। दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताएं और संस्कृतियां समय के थपेड़ों, आक्रांताओं के भय अथवा अपनी जड़ता के कारण इतिहास के पन्नों में सिमट गईं; किंतु हम आज भी जीवित हैं। खंडित होकर और अनेक ऐतिहासिक आघात सहकर भी यदि हमारी अस्मिता अक्षय रही, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने जड़ता के स्थान पर गतिशीलता को चुना। हमारे दार्शनिकों, ऋषियों और समाज-सुधारकों ने समय-समय पर पुरानी मान्यताओं को परिमार्जित किया और धर्म के शाश्वत तत्त्व को अक्षुण्ण रखते हुए उसकी बाहरी व्यवस्थाओं को युगीन आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला। किंतु आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ संकट केवल बाह्य नहीं, आंतरिक भी हैं। आधुनिक युग में तर्क, विज्ञान और आर्थिक व्यावहारिकताओं के धरातल पर नई पीढ़ी हर व्यवस्था का मूल्यांकन कर रही है। यदि हमने अपनी सामाजिक और धार्मिक पद्धतियों का समय रहते परिष्कार नहीं किया, तो हम अनजाने में ही अपन...
अनशन मैं सोच रहा हूंँ अब अनशन पर बैठ ही जाऊं मेरी भी कुछ मांगे हैं सरकार से नाराज बहुत हूंँ हालांकि जो Paper leak हुआ था वो फिर से अच्छे से हो गया है 🌹🌹🌹💐💐🌹🌹 एक छात्र अपने बाप से नाराज बहुत है क्यों नहीं उसके लिए अबकी Paper खरीद सका प्रोफेसर साहब जेल में हैं जिन्होंने कोचिंग से मिलकर यह काम किया था सोचने की बात बस इतनी है इसका जिम्मेदार हम कितने हैं क्योंकि हममे से ही कोई हर जगह पर है ❤️❤️💐💐❤️❤️ फिर सोचा अनशन क्यों करूं BBC CNN वाले आए नहीं हैं बस इतने से काम नहीं चलेगा ए मुद्दा पर्याप्त नहीं है और बहुत कुछ ले आओ जो जो जिसको ठीक लगे 🌹🌹🌹 ए अच्छा है ऐसे ही होता है यूपी चुनाव से पहले पिछली बार किसान आंदोलन हुआ था याद नहीं है क्या? इस बार भी चुनाव नजदीक है सारा खेल उसी का है और कुछ नहीं है Rajhans Tiwari 💐💐💐💐 आंदोलन में एक लाचार आदमी *****🌹🌹🌹🌹**** मुझे मालूम नहीं था ए खबर है क्योंकि मेरे शहर में न ज...
पागल मुझे लगा था वह मुझे देखकर ही अकारण हँसता है, मेरी ही बाट जोहता, उस मोड़ पर ठहरा हुआ है उसे भान था मेरे यहाँ से निकलने के समय का, और मुझे भी आदत हो चली थी उसकी निश्छल हँसी का परंतु यह मात्र मेरा भ्रम था, उसकी हँसी तो हर पथिक के लिए एक समान थी भाँति-भाँति के मुखौटे, विभिन्न प्रकार के लोग, कोई क्रुद्ध होता, कोई रुष्ट, कोई मौन साधे निकल जाता, और वह .. सबको देखकर अनवरत हँसता रहता संसार ने सहज ही मान लिया उसकी मानसिक दशा ठीक नहीं, तभी तो वह विक्षिप्त है, उसमें कोई विवेक नहीं किंतु ये ज्ञानी लोग भी तो एक अंतहीन होड़ में व्यस्त हैं, न जाने किस पूर्णता की खोज में युगों से त्रस्त हैं, जो न कभी प्राप्त होती है, न कभी संपूर्ण बनती है फिर एक दिन, उसे देखकर मेरे अधरों पर भी वही हास्य तैर गया, मुझे हँसते देख, एक क्षण को वह सहसा स्तब्ध रह गया उसने मेरी आँखों में झाँका, और फिर दुगुने वेग से अट्टहास कर उठा, जैसे उसने अपने...
रिसाव कहीं कुछ रिस रहा है यह पानी की लकीर बस यही तो बताती है ऐसा लगता है न जाने कब से किसी के लिए जैसे कोई रास्ता बना रहा हो कोई इन लकीरों पर भी जैसे चलता रहता है यह रिसाव धीरे-धीरे अपनी जगह बड़ी करता रहता है एक पूरा मकान धीरे-धीरे खंडहर बन गया इसकी शुरुआत इसी रिसाव से हुई थी और यह रिसता हुआ रिश्ता जो इस मकान से लोगों का था वह न जाने कहां धीरे-धीरे चला गया यह दूरी जानबूझकर किसी ने नहीं चुनी मगर जाना तो पड़ता है हर चीज की अपनी एक मियाद है इस मकान की भी है खैर अब यहां कुछ और लोग रहने लगे हैं एक छोटा सा पौधा उस कोने में जब पहली बार दिखा था उसमें कुछ फूल भी लगे थे जो लाल और पीले थे काफी अच्छा, मनमोहक था उसकी रंगत देखकर उसको उखाड़ने का मन नहीं किया उस वक्त यह महसूस हुआ कम से कम कोई तो यहां अपना रिश्ता बन रहा है खुद को जमा रहा है फिर मैं भी अनजाने सफर पर न...
कॉकरोच कॉकरोच तुम चेहरा हो कि मुखौटा किस बजबजाती नाली से निकले हो उसका नाम क्या है यह भी तो बता दो अपने बारे में समझा दो बड़े लोग अपने अनुभव से बहुत सी बात करते हैं जिसमें सब सही हो या सब गलत हो यह जरूरी तो नहीं है हमारे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने जो कुछ कहा है वह सोच समझकर ही कहा होगा हालांकि उन्हें सच बोलने से बचना था काकरोच को काकरोच नहीं कहना था पर सच में उन्होंने किस संदर्भ में क्या क्यों कहा? उनकी पूरी बात सबको सुनना चाहिए मुझे तो संदेह नहीं है उन्होंने तो सिर्फ यही कहा था कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ गंदगी करते हैं उनकी बात का मतलब यही था जिनसे जब कुछ भी बेहतर और अच्छा नहीं होता क्योंकि जहां साफ-सुथरा अच्छा कुछ हो रहा हो वह वहां नहीं रह सकते उन्हें बदबूदार गंदी नाली चाहिए क्योंकि कॉकरोच वहीं रहते हैं ऐसे में वह अपने मन माफिक हर चीज ढूंढते लेते हैं अरे भाई यह देश ...
भटकते हुए कहाँ से काहाँ आ गया
ReplyDeleteकहाँ जाना था अब तो ए याद भी नहीं