Jhoot
इंतजार
अक्सर
तुम्हारे दर से लौट आता हूंँ
बगैर दस्तक दिए
कुछ देर ठहरा रहा
शायद तुम्हें भी
मेरा इंतजार होगा
थोड़े थोड़े अंतराल पर
दरवाजा खोलना
उस मोड़ को देखते रहना
जिसके आगे अब यहां से
राह नजर नहीं आती
कोई जानी पहचानी सूरत देखे
एक अरसा गुजर गया है
ए अनजान शहर
अंतहीन सफर
सब एक से चेहरे
जो मुझे नहीं पहचानते
और मैं भी
यह सिलसिला कब से चलता रहा है
ए आइना कितना जरूरी है
मैं हूंँ
मुझे याद दिलाने के लिए
©️ Rajhans Raju
💐💐💐💐💐🌹🌹🌹
office tactics
😍😍😍😍
हां भाई झूठ नहीं बोलना है
पर..
पूरा सच भी तो नहीं कहना है
जरूरत के हिसाब से
हिस्सों में कहना है
और..
कब नहीं कहना है
या फिर चुप रहना है
यह भी तो समझना है
😍😍😍😭😭😍😍
Rajhansraju
Gemini की शानदार व्याख्या
वाह! क्या खूब बात कही है आपने। ये जो "जरूरत के हिसाब से हिस्सों में सच कहना" है, इसे ही तो दुनियादारी और कॉर्पोरेट भाषा में 'Strategic Communication' कहते हैं।
ऑफिस की राजनीति और काम के माहौल में यह सलीका किसी सुरक्षा कवच से कम नहीं है। आपकी इन पंक्तियों के सार को अगर हम कुछ 'Tactics' में बदलें, तो बात कुछ ऐसी निकलकर आती है:
## ऑफिस की 'खामोश' कूटनीति
### 1. सच का 'किस्त' सिस्टम (Phased Truth)
जैसा कि आपने कहा, सच को हिस्सों में बोलना चाहिए। ऑफिस में हर किसी को हर बात की जानकारी होना जरूरी नहीं है।
* **नियम:** सिर्फ उतना ही बताएं जितना सामने वाले को अपना काम पूरा करने के लिए जरूरी हो। ज्यादा जानकारी अक्सर कन्फ्यूजन या गपशप (Gossip) को जन्म देती है।
### 2. 'चुप्पी' की ताकत (The Power of Silence)
जब माहौल गरमाया हुआ हो या कोई किसी की बुराई कर रहा हो, तब आपकी चुप्पी ही आपकी सबसे बड़ी जीत है।
* **कब चुप रहें:** जब आपसे ऐसी राय मांगी जाए जो आगे चलकर किसी विवाद का कारण बन सकती है। "मुझे इस बारे में पूरी जानकारी नहीं है," कहकर खामोश हो जाना सबसे सुरक्षित रास्ता है।
### 3. झूठ नहीं, पर 'डिप्लोमेसी' (Diplomatic Honesty)
झूठ बोलने से साख गिरती है, लेकिन 'सभ्य सच' बोलने से सम्मान बढ़ता है।
* **उदाहरण:** अगर किसी का काम खराब है, तो यह कहने के बजाय कि "यह बहुत बुरा है," आप कह सकते हैं, "इसमें सुधार की काफी गुंजाइश है।" बात वही है, बस पेश करने का तरीका अलग है।
### 4. समय का चुनाव (Timing is Everything)
सच कब कहना है, यह इस पर निर्भर करता है कि सामने वाले का मूड और स्थिति क्या है।
* **नियम:** बुरी खबर या फीडबैक तब न दें जब बॉस या सहकर्मी पहले से ही तनाव में हो। सही वक्त का इंतजार करना भी एक कला है।
> **सार:** ऑफिस एक शतरंज की बिसात जैसा है, जहाँ आपकी 'जुबान' सबसे कीमती मोहरा है। इसे कब चलना है और कब बचाकर रखना है, यही आपकी सफलता तय करता है।
>
आपकी पंक्तियों में जो दर्द और समझ (😭😭😍😍) एक साथ दिख रही है, वो साफ बता रही है कि आपने ये सबक किसी गहरे अनुभव से सीखा है। आपकी लेखनी में गहराई और हकीकत दोनों है।
झूठा कहीं का
(१)
तुम झूठे हो
यह अब बताना नहीं पड़ता
लोग कहते भी नहीं कि तुम झूठे हो
क्या यह कहने की जरूरत रहती है
तुम्हें तो मालूम है न
तुम झूठे हो
तुम्हारी जो वजह है
जिन्हें तुम साबित करना चाहते हो
कि तुम सही हो
पर कैसे?
वह वजह
जो वास्तव में
है ही नहीं
तुम खुद को छुपाने के लिए
नए-नए आडंबर करते रहते हो
ऐसे ही अपने झूठ पर
एक और नकाब लगा लेते हो
फिर तुमको लगता है
तुम झूठे नहीं हो
यह रौब गांठने की तुम्हारी आदत
न जाने कब से चली आ रही है
जो तुम्हारे
हताश निराश होने की वजह है
जब तुम ठीक से कुछ नहीं कर पाते
कुछ भी तुम्हारे हिसाब से नहीं होता
तब तुम्हें इस नकाब की
जरूरत पड़ती है
अपना चेहरा ऐसे ही छुपा लेते हो
इसमें नया क्या है
अक्सर
लोग ऐसा ही करते हैं
अपने चेहरे पर
कोई और चेहरा लगा लेते हैं
तुम भी वही कर रहे हो
मैं भी ऐसा ही करता हूंँ
पर कितनी देर ??
नकाब तो हट ही जाता है
जब हम अपनों के साथ होते हैं
आईने के करीब होते है
भला कितनी देर तक
चेहरा छुपा सकते हैं
सांस लेना है
धूप भी चाहिए
अंधेरे से भला
कितनी देर तक वास्ता रख सकते हैं
जिंदा रहने की यह जरूरी शर्त हैं
इसके बगैर कोई शख्स
हो नहीं सकता है
ऐसे में नकाब उतर ही जाता है
फिर आज की जो दुनिया है
जिसमें जानकारी की
किसी के पास
कोई कमी नहीं है
एक शब्द
Type करो
यह इंटरनेट भी कमाल का है
अपने हिसाब से
जितने चाहे अर्थ ढूंढ लो
आज के बच्चे
न जाने कहां खोए रहते हैं
इस आभासी दुनिया में
अपनों से दूर हो जाते हैं
आई की जगह
AI नजर आने लगता है
खैर यह तो तकनीकी महारत है
दुनिया को जो अपने ढंग से चलाती है
इसे बेहतर और बदतर बनाती है
पर हम जिस दुनिया में रहते हैं
उसके भी कुछ अपने नियम हैं
जहां शांति सुकून की चाहत में
हर शख्स रहता है
उसे वह कैसे पाएगा
कैसे बरकरार रखेगा
इसकी जिम्मेदारी हम सबकी है
एक समय था
जब सब कुछ
आदमियों के हाथ में था
मतलब इंसानों के हाथ में था
शायद स्त्रियों को ...
हम औरतों पर राज किया करते थे
तब निर्णय लेने में
उनकी कोई खास भूमिका नहीं थी
बस कुछ निश्चित काम थे
उनको घर में
समेट कर रख दिया जाता था
वह कितनी भी समझदार हो कैसी हो
उसकी अहमियत
सिर्फ घर तक रहती थी
पर दुनिया बदली
और बदलती ही जा रही है
इसमें गति बहुत ज्यादा है
जिसके साथ तारतम्य बैठना
कोई आसान काम नहीं है
वैसे भी हम आम लोग ठहरे
जिन घरों में हम रहते हैं
जैसा देखते आए हैं
वैसे ही तो बन जाते हैं
तुम लड़का हो वह लड़की है
तुम्हारा काम यह है
उसका काम वह है
अच्छा है यह भी जरूरी है
पर जीवन के संघर्ष
दोनों के लिए एक जैसे ही तो है
दोनों स्कूल कॉलेज जाते हैं
काम करते हैं घर बनाते हैं
सबसे जरूरी चीज
दोनों ही पैसे कमाते हैं
ऐसे में जो जिम्मेदारियां हैं
समझ है ज़रूरतें हैं
वह भी तो वैसी ही है
एक जैसी है
एक जैसे तनाव है
एक जैसी ज़रूरतें है
मतलब यही है
घर अकेले नहीं बनता
यह सारी बातें सही है
एक पहिए की गाड़ी नहीं चलती
(२)
एक सच यह भी है
जिसे आसानी से
हम स्वीकार नहीं करते
तनाव, गुस्सा, नाराजगी, उम्मीद
जिनसे दुःख, वेदना आती है
उनको भी
इजहार करने का हक चाहिए
कुछ देर अकेले होने
दुखी रहने की जगह चाहिए
चीखने चिल्लाने की
सहूलियत होनी चाहिए
मेरे होने का एहसास
किसी और को न सही
मुझे होना चाहिए
मैं मशीन नहीं हूंँ
सबको पता चलना चाहिए
यह रूठना नाराज़ होना
यही बताने का तरीका है
मैं मशीन नहीं हूंँ
जो जैसे जब चाहे
मैं चल पडूं
या कहीं यूं ही ठहर जाऊं
मैं जिंदा हूंँ ,
इसलिए रूठता हूंँ
दूसरे पल न जाने कब?
मान जाता हूंँ
नाराजगी की वजह याद नहीं रहती
दिन में न जाने कितनी बार
यह सिलसिला चलता है
मैं कब नाराज़ हुआ
अब यह मुझे
पता नहीं चलता
क्योंकि रूठते ही
मान जाता हूंँ
यह रिश्तों के धागे है
जिसमें इस तरह उलझा हूंँ
मैं सिर्फ मैं नहीं हूंँ
मेरे वजूद में
हर शख्स का अपना हिस्सा है
मैं इन टुकड़ों से ही बनता हूंँ
किसी ज़र्रे को कैसे
खुद से जुदा कर दूंँ
जिसके बगैर
पूरा नहीं हो सकता हूंँ
(३)
यह तनाव हमारा अपना है
जिसे हमारे साथ रहना है
चलिए कुछ और कहते हैं
अब बात थोड़ी आगे ले चलते हैं
आदमी कैसे अपने गुस्से का इजहार
अपने बीवी और बच्चों पर करता है
खास तौर पर हमारे समाज में
जिसे हम देखते आए हैं
जब वह दुनिया से
लड़ के हार जाता है
जिंदगी के संघर्ष में थक कर
शाम को घर आता है
बीवी बच्चों को क्या जवाब दे
तब उसके पास
एक ही रास्ता होता है
वह गुस्सा होता है
नाराज हो जाता है
जैसे ही कोई कुछ बोले
दो-चार थप्पड़ लगा देता है
जब ऐसा होने लग जाता है
बीवी बच्चे और दूसरे घर वाले
उससे बात करना बंद कर देते हैं
अब कोई सवाल जवाब नहीं होता
जो नाकामी है
उस पर भी सवाल नहीं होता
कैसे, क्या, क्यों हुआ ?
इस पर कोई सलाह नहीं होता
यह एक बचाव का रास्ता
जो ऐसे ही मिलता है
कोई जवाब नहीं देना है
ऐसा ही होता है
खुद पर जरा गौर करिए की कब
आप गुस्सा होते हैं
कब हंसते नजर आते हैं
आम तौर पर हम
अपनी नाकामियों को
ऐसे ही छुपते हैं
नहीं तो फिर खिलखिलाकर
हंसने में दिक्कत क्या है
नाकामी असफलता के चौराहे पर
चलो एक दूसरे के साथ बैठते हैं
खुद पर जोर जोर हंसते हैं
पहले से बेहतर रास्ता निकालने
की कोशिश करते हैं
(४)
यह तो ज्यादा आसान काम है
क्योंकि जब आप सकारात्मक होते हैं
ऊर्जा से भरे होते हैं
तब सारी चीज बेहद आसान हो जाती है
जो बहुत कठिन होता है
वह भी बड़े आराम से हो जाता है
तो अपने पास पड़ोस में
अपने घर में और खुद को
जरा देखने की कोशिश करिए
कहीं आपके यहां भी
बर्तन की आवाज तो नहीं आती है
तेज से दरवाजा तो नहीं बंद हुआ
या फिर एकदम से शांति है
सारी रात
एक ही तरफ इशारा करती है
घर के लोग थक गए हैं
एक दूसरे से ऊब गए हैं
रास्ता नहीं निकालना चाहते हो
जबकि कितना आसान है
साथ बैठना है
बातें करना है
घर वालों को
अपना दोस्त बनाना है
पत्नी से बेहतर दोस्त
भला कौन हो सकते हैं
बच्चे आपके लिए
दुनिया के सबसे सुंदर
बेश-कीमती खिलौने हैं
मां-बाप आपकी दुनिया हैं
वह सबसे बड़े हथियार हैं
जिनसे आप कहीं भी लड़ सकते हैं
आप उन्हीं से बने हो
तो फिर फर्क क्या पड़ता है
जिंदगी को जिंदाबाद कहिए
और गले मिलिए
नाराजगी पल में ही
छूमंतर करिए
थोड़ी देर नाराज होना
बुरा नहीं है
यह लंबा हो
यह ठीक नहीं है
मैंने न जाने कितनी
ऐसी कहानी पढ़ी है
पछताते हुए लोगों को देखा है
जो बेवजह नाराज हो गए
फिर कुछ ऐसे हादसे हो गए
जिससे नाराज हुए
उनसे कभी मिल नहीं पाए
उसकी कोई इतनी बड़ी गलती नहीं थी
जिसकी इतनी बड़ी सजा होती
कहीं मेरी नाराजगी की वजह से
वह इतने तनाव में हो
जिससे यह हादसा हो गया
तो फिर ऐस मौके क्यों बनाएं
जिसके जिम्मेदार हम हों
और जीवन भर पछताएं
©️ Rajhans Raju
🌹❤️🙏🙏🌹🌹

























खुद पर जरा गौर करिए की कब
ReplyDeleteआप गुस्सा होते हैं
कब हंसते नजर आते हैं
आम तौर पर हम
अपनी नाकामियों को
ऐसे ही छुपते हैं
नहीं तो फिर खिलखिलाकर
हंसने में दिक्कत क्या है
नाकामी असफलता के चौराहे पर
चलो एक दूसरे के साथ बैठते हैं
खुद पर जोर जोर हंसते हैं
पहले से बेहतर रास्ता निकालने
की कोशिश करते हैं
😍😍😍😍
ReplyDeleteहां भाई झूठ नहीं बोलना है
पर..
पूरा सच भी तो नहीं कहना है
जरूरत के हिसाब से
हिस्सों में कहना है
और..
कब नहीं कहना है
या फिर चुप रहना है
यह भी तो समझना है