might is right

चिड़िया और पिंजरा 


हम आजाद हैं 

खुद को आजादी का 

हिमायती कहते हैं 

पर वह चिड़िया 

जो आसमान की सैलानी है 

उसे पिंजरे में रखना हैं 

जबकि चिड़िया को यह सजा है 

जिसे एक पंछी खूब समझता है 

ऐसे ही जब किसी की 

फितरत हो परिंदे की 

तो वह भला 

किसी भी कैद की 

हिमायत क्यों करेगा?

वह उड़ान की बात करता है 

आसमान देखता है 

यह अंतहीन सफर 

जो रास्ते छूट गये

कभी मुड़ कर 

कोई उन्हें देखता नहीं 

वापसी की गुंजाइश कहां रह गई 

अब पंख में 

वह ताकत नहीं रह गयी 

उड़ने वाले खूब ऊंचा उड़ 

पर एक बात याद रखना 

आसमान में किसी का 

घर नहीं होता 

हर शाम परिंदा लौट आता है 

किसी साख पर 

जहां एक छोटा सा घोंसला है 

लौट आने की वजह यही है 

यह उसका घर है 

यहां आकर सुकून से 

सो जाता है 

©️ Rajhans Raju 


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Gamini की व्याख्या

राजहंस जी, आपकी यह कविता स्वतंत्रता और वास्तविकता के बीच के द्वंद्व को बहुत ही गहराई से चित्रित करती है। आपने 'परिंदे' के माध्यम से मनुष्य की उस फितरत को पकड़ा है जो विस्तार तो चाहती है, पर अंततः एक आधार (घोंसले) की तलाश में रहती है।

आपकी पंक्तियों पर कुछ विचार:

विरोधाभास का सटीक चित्रण

कविता की शुरुआत में ही आपने मनुष्य के दोगलेपन पर कड़ा प्रहार किया है। हम खुद को 'आजादी का हिमायती' कहते हैं, पर अपनी खुशी के लिए दूसरों (चिड़िया) को कैद करने में संकोच नहीं करते। यह पंक्तियाँ समाज की उस मानसिकता को दर्शाती हैं जहाँ आजादी केवल 'स्वयं' तक सीमित होकर रह गई है।

उड़ान और उम्र का तकाजा

> इस उम्र में अब पंख में

> वह ताकत नहीं रह गयी

यहाँ कविता एक दार्शनिक मोड़ लेती है। यह केवल एक पक्षी की कहानी नहीं, बल्कि जीवन के उस पड़ाव की बात है जहाँ उत्साह और ऊर्जा (पंखों की ताकत) समय के साथ कम होने लगती है। यह हिस्सा कविता में एक ठहराव और परिपक्वता लेकर आता है।

घर की अनिवार्यता

कविता का सबसे सशक्त हिस्सा इसका समापन है:

> आसमान में किसी का

> घर नहीं होता

यह पंक्ति एक कड़वा लेकिन सुंदर सत्य है। अनंत आकाश (सफलता, महत्वाकांक्षा या घूमना-फिरना) कितना ही लुभावना क्यों न हो, वह स्थायी नहीं हो सकता। सुकून केवल 'शाख के घोंसले' में ही मिलता है। आपने 'आजादी' को 'जड़ों' से जोड़कर एक संतुलन पेश किया है।

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सफरनामा 

 

सफर के सिवा 

कुछ भी नहीं 

यह बात 

कहने की भी नहीं 

वह कौन है?

जिसकी तलाश में 

भटक रहा है 

क्या कहे ?

जब अपनी ही पहचान 

मुकम्मल नहीं 

©️ Rajhans Raju 

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Might is Right


जिसके पास 

might है वही तो right है 

दुनिया में हरदम 

यही होता आया है 

कहने को तुम 

कुछ भी कह सकते हो 

धरना प्रदर्शन 

मजे से कर सकते हो 

इसके लिए भी पैसा चाहिए 

जो दे रहा 

उसका करियर 

एकदम ब्राइट है 

सब कुछ एकदम 

ठीक चल रहा  

धंधा धंधे जैसा हो रहा 

कौन मरेगा कितने मरेंगे

इसका इससे वास्ता नहीं है 

इसमें नया क्या है 

यह पहली बार तो नहीं है

मशीन और बेहतर हो रही है 

जीवन का कोई मोल नहीं है 

माइट इज राइट है माइट इज राइट है 

कहलो किस्सा अपना तुम भी 

कौन सा तुम आदमी नए हो 

वही जंगली जंगल वाले हो 

गोश्त की आदत गई नहीं है 

यह जो खून रिस रहा है 

तुम्हारा है 

किसी और का नहीं है 

मरना तो एक दिन तुमको भी है 

हममें से कोई अमर नहीं है 

माइट इस राइट है माइट इज राइट है 

वह भी कहता रहता है 

न जाने क्यों  

डरता रहता है 

©️ Rajhans Raju


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Gamini की व्याख्या


राजहंस जी, आपकी यह कविता सत्ता, शक्ति और व्यवस्था के उस क्रूर यथार्थ को उधेड़ कर रख देती है जिसे अक्सर हम 'सभ्यता' के लबादे में छिपाने की कोशिश करते हैं। "माइट इज राइट" (जिसकी लाठी उसकी भैंस) का यह सिद्धांत सदियों पुराना है, लेकिन आपने इसे आज के दौर के "कॉर्पोरेट" और "मशीनी" संदर्भों से जोड़कर इसे और भी तीखा बना दिया है।

कविता की कुछ पंक्तियां विशेष रूप से प्रभावित करती हैं:

प्रमुख बिंदु और विश्लेषण

 * व्यवस्था का व्यवसायीकरण: "धंधा धंधे जैसा हो रहा है" — यह पंक्ति दर्शाती है कि आज के समय में मानवीय संवेदनाएं और यहां तक कि विरोध प्रदर्शन (धर्ना प्रदर्शन) भी एक बाजार का हिस्सा बन चुके हैं।

 * आधुनिकता बनाम आदिम स्वभाव: "वही जंगली जंगल वाले हो / गोश्त की आदत गई नहीं है" — यह एक बहुत ही गहरा कटाक्ष है। हम तकनीक और मशीनों में भले ही आगे बढ़ गए हों, लेकिन हमारा मूल स्वभाव आज भी वही हिंसक और वर्चस्ववादी है।

 * अनित्यता का बोध: कविता के अंत में "मरना तो एक दिन तुमको भी है" कहकर आपने उस 'शक्ति' को आईना दिखाया है जो खुद को अमर और अजेय मान बैठी है।

आपकी शैली पर एक टिप्पणी

आपकी लेखनी में एक दार्शनिक आक्रोश झलकता है। आप बड़े ही सरल शब्दों में जीवन की जटिल और कड़वी सच्चाइयों को पिरो लेते हैं। "खून जो रिस रहा है वह तुम्हारा है" — यह पंक्ति पाठक को आत्म-चिंतन के लिए मजबूर करती है कि इस व्यवस्था की मार से कोई अछूता नहीं है।

आपकी यह रचना वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिवेश पर एक करारा प्रहार है।

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खोज 


अरे कहां थे 

बड़े दिन बाद मिले 

तुम्हें भी फुर्सत कहां है 

आखिर मिलना भी क्यों?

ए जरूरतों का दायरा 

जो सब तय करता है 

किससे कितना मिलना है 

यह आइने में 

जाना पहचाना सा शख्स 

जब देखो 

घूरता रहता है 

©️ Rajhans Raju 



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Gamini की व्याख्या


वाह! राजहंस जी, आपकी पंक्तियों में जो तंज और गहराई है, वो सीधा दिल पर दस्तक देती है। "ज़रूरतों का दायरा" वाली बात आज के दौर की कड़वी सच्चाई को बहुत खूबसूरती से बयां कर रही है।

खासकर वो आईने वाला हिस्सा—जहाँ हम खुद को ही नहीं पहचान पा रहे या शायद खुद का ही सामना करने से कतरा रहे हैं—बेहद प्रभावशाली है। आपकी लेखनी में वो पुराना दार्शनिक अंदाज़ और समाज की परतों को उधेड़ने वाली पैनी नज़र साफ झलक रही है।

आपकी कविता के कुछ गहरे बिंदु:

 * ज़रूरत बनाम रिश्ता: आपने यह बखूबी दिखाया है कि कैसे आज के रिश्ते जज्बात से नहीं, बल्कि 'जरूरतों के गणित' से तय होते हैं।

 * आत्म-साक्षात्कार (Self-Reflection): आईने में खड़ा वो "जाना पहचाना सा शख्स" दरअसल हमारी खोई हुई मौलिकता या वो ज़मीर है, जिसे हम भागदौड़ में पीछे छोड़ आए हैं।

 * अजनबीपन: अपनों के बीच और खुद के साथ जो अजनबीपन बढ़ रहा है, उसे आपने बहुत सादगी से पिरोया है।

आपकी इस रचना ने माहौल को काफी संजीदा और विचारमग्न कर दिया है।

क्या आप चाहेंगे कि मैं इस कविता के भावों पर एक छोटी सी प्रतिक्रिया या इसकी अगली कुछ पंक्तियाँ (आपके अंदाज़ में) लिखने की कोशिश करूँ?


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वह नाहक 

शोर मचाता है 

खुद के होने का 

जैसे सबूत दिखाता है 

©️ RajhansRaju 


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Gamini की व्याख्या


यह पंक्तियाँ किसी के अस्तित्व के उस खोखलेपन को दर्शाती हैं, जहाँ इंसान अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बाहरी शोर का सहारा लेता है। आत्म-विश्वास की कमी अक्सर अति-प्रदर्शन (Over-expression) के रूप में बाहर आती है।

यहाँ इन पंक्तियों का एक संक्षिप्त विश्लेषण है:

 * नाहक शोर: यह शब्द 'व्यर्थता' को दर्शाता है। जब व्यक्ति भीतर से शांत या पूर्ण नहीं होता, तो वह बाहरी जगत में शोर मचाकर ध्यान खींचने की कोशिश करता है।

 * अस्तित्व का प्रमाण (सबूत): यह बहुत गहरा कटाक्ष है। जो वास्तव में "है", उसे अपने होने का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं होती। सूरज चमकता है, वह चिल्लाकर यह नहीं कहता कि "मैं हूँ"।

 * मनोवैज्ञानिक पहलू: यह पंक्तियाँ उस असुरक्षा (Insecurity) की ओर इशारा करती हैं, जहाँ व्यक्ति को डर है कि यदि वह चुप रहा, तो दुनिया उसे भूल जाएगी या अनदेखा कर देगी।

गहन भाव:

सच्चा अस्तित्व मौन में भी अपनी धमक रखता है। शोर केवल उस रिक्त स्थान को भरने की कोशिश है, जो व्यक्तित्व के भीतर खाली रह गया है।

आपकी इन पंक्तियों में एक दार्शनिक गहराई है जो आधुनिक समाज के 'दिखावे' की संस्कृति पर सटीक चोट करती है।

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अपना अपना सफर 


उसने अपनी 

कोई कहानी नहीं सुनाई 

बस दूसरों की सुनता रहा

हर बार ऐसा ही लगा

यह कहानी तो सभी की है 

सबकी जिंदगी में 

कुछ ऐसा ही हुआ है 

हर आदमी 

ऐसे ही दौर से गुजरा है 

कम या ज्यादा 

मगर कहानी 

सब की एक जैसी ही है 

सब ने उम्र के 

तमाम पड़ाव पार किए हैं 

जिसमें एक यात्रा है 

बस वही कुछ 

कम या फिर ज्यादा है 

लेकिन सफर 

सबने किया है 

कितने स्टेशन कौन पहुंचा 

कौन सी गाड़ी से 

कौन चला था 

इससे भी बहुत फर्क नहीं पड़ता है 

गति कितनी थी पहुंचा कहां 

पहुंच कर आखिर किया क्या 

सवाल तो यह भी है

यह सवाल ही अक्सर 

जवाब होता है 

जहां पहुंचना कहीं नहीं होता 

क्योंकि जब गौर किया तो 

कहीं पहुंचे ही नहीं थे 

बस चलते रहे 

और कहीं पहुंच गए 

ऐसा कहते रहे 

क्या जिंदगी इसी का नाम है 

जहां कहीं पहुंचने की 

बस कोशिश होती है 

जबकि कहीं पहुंच ही नहीं पाते 

दावे होते हैं बातें होती हैं 

इसमें भी सिर्फ दुहराव होता है 

पहले ही बहुत कुछ कहा गया है 

उसी में से कुछ दुहरा दिया जाता है 

मतलब कहने में भी 

अपना नया कुछ नहीं है

जिसे मैंने सीखा है जाना है 

जो मैं लोगों से कहता हूंँ 

अक्सर यही तो होता है 

फिर किसी बात को लेकर 

जो कहानी गढ़ी जाती है 

उसमें भी नया कितना होता है 

हां यह ठीक है 

वह मुझे कुछ मेरे लिए 

नया लगता है 

पर ऐसा नहीं है कि 

यह पहली बार दुनिया में 

किसी के साथ हुआ है 

हकीकत यही है  

दुहराव के सिवा 

कहीं कुछ होता नहीं है 

यह जीवन और मृत्यु भी तो 

महज दुहराव ही लगता है 

बस जब हम उससे गुजरते हैं 

जिसे अपना समझते हैं 

उससे से जो एक रिश्ता है 

उसी से सब कुछ 

मेरा अपना लगता हैं 

तब वह कहानी मुझे 

मेरी अपनी लगने लग जाती है 

पर हकीकत तो यही है 

यह कहानी 

न जाने कब से लगातार 

दुहराई जा रही है 

जो कभी अपनी 

कभी पराई लगती है 

कभी मैं इसमें कुछ कम 

कभी ज्यादा मौजूद होता हूंँ

अब कैसे तय करूं

यह कम और ज्यादा 

क्या होता है 

©️ Rajhans Raju 


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Gamini की व्याख्या


राजहंस जी, आपकी यह कविता जीवन के उस 'सार' को पकड़ती है जिसे अक्सर हम भागदौड़ में अनदेखा कर देते हैं। इसमें एक बहुत ही गहरा दार्शनिक विमर्श (Philosophical Discourse) है—मौलिकता बनाम दोहराव।

आपकी पंक्तियों पर कुछ विचार:

कविता का विश्लेषण

 * सामूहिकता का बोध: आपने बहुत खूबसूरती से लिखा है कि "यह कहानी तो सभी की है।" अक्सर हम अपने दुखों या सुखों को 'अद्वितीय' (Unique) मानते हैं, लेकिन गहराई से देखें तो मानवीय भावनाएँ और जीवन के पड़ाव सार्वभौमिक हैं।

 * यात्रा बनाम गंतव्य: "कहीं पहुंचे ही नहीं थे, बस चलते रहे"—यह पंक्ति 'शून्यवाद' और 'निरंतरता' का बड़ा सटीक मिश्रण है। हम गंतव्य के दावे तो करते हैं, लेकिन जीवन वास्तव में गंतव्य नहीं, बल्कि केवल चलते रहने की प्रक्रिया है।

 * पुनरावृत्ति (The Myth of Sisyphus): आपकी कविता अलबेयर कामू या भारतीय दर्शन के 'चक्र' (Cycle) की याद दिलाती है। जन्म-मृत्यु, सुख-दुख, सब एक 'रिपीट मोड' पर है। नया कुछ भी नहीं है, बस पात्र बदल जाते हैं।

 * अपनत्व का भ्रम: सबसे मर्मस्पर्शी हिस्सा वह है जहाँ आप कहते हैं कि जब हम उस कहानी से गुजरते हैं और उससे 'रिश्ता' जोड़ लेते हैं, तब वह अपनी लगने लगती है। यानी, वास्तविकता तटस्थ (Neutral) है, हमारी भावनाएं ही उसे 'मेरा' या 'तेरा' बनाती हैं।

मेरी पसंद की कुछ विशेष पंक्तियाँ

> "सवाल तो यह भी है और / यह सवाल ही अक्सर / जवाब होता है"

यह विरोधाभास (Paradox) बहुत गहरा है। कभी-कभी उत्तर की खोज ही सबसे बड़ा उत्तर बन जाती है।

> "मतलब कहने में भी / अपना नया कुछ नहीं है"

एक कवि के रूप में यह स्वीकारोक्ति बहुत बड़ी है। यह उस 'ईगो' को तोड़ती है जो मानती है कि हम कुछ नया रच रहे हैं। हम बस उस शाश्वत सत्य को अपने शब्दों में फिर से कह रहे हैं।

आपकी यह रचना आत्म-मंथन की एक लंबी प्रक्रिया से उपजी हुई लगती है। क्या यह विचार किसी विशेष घटना या किसी व्यक्ति के जीवन को करीब से देखने के बाद मन में आया?

क्या आप चाहेंगे कि मैं इस कविता के किसी विशिष्ट भाव (जैसे 'समय' या 'अस्तित्व') पर आपके साथ और चर्चा करूँ?


बिलकुल


राजहंस जी, आपकी कविता में 'अस्तित्व' (Existence) और 'समय' (Time) का जो मेल है, वह किसी बहती नदी जैसा है—जहाँ पानी तो बदलता रहता है, पर नदी वही रहती है।

विशेषकर 'समय' को लेकर आपका नज़रिया बहुत ही परिपक्व है। आपने समय को एक सीधी रेखा (Linear) नहीं, बल्कि एक 'वृत्त' (Circle) या 'दोहराव' की तरह देखा है।

अस्तित्व का प्रश्न: "कहीं पहुंचे ही नहीं"

जब आप कहते हैं कि "कहीं पहुंचे ही नहीं थे / बस चलते रहे", तो आप मनुष्य के सबसे बड़े भ्रम पर चोट करते हैं। हम अक्सर उपलब्धियों, डिग्रियों या पदों को 'पहुंचना' समझ लेते हैं। लेकिन:

 * क्या 'पहुंचना' वास्तव में संभव है?

 * या फिर 'चलते रहना' ही एकमात्र सत्य है?

दर्शन की भाषा में कहें तो, आपका अस्तित्व किसी मंज़िल में नहीं, बल्कि उस 'होने' (Being) की प्रक्रिया में है। आपने उस छलावे को पकड़ लिया है जहाँ इंसान कहता कुछ और है और हकीकत में बस एक चक्र का हिस्सा होता है।

दोहराव का दर्शन

आपका यह कहना कि "पहले ही बहुत कुछ कहा गया है / उसी में से कुछ दुहरा दिया जाता है", यह बताता है कि हम सब एक विशाल 'सामूहिक स्मृति' का हिस्सा हैं।

 * प्रेम, विरह, संघर्ष, और मृत्यु—हज़ारों सालों से यही चार-पाँच सुर हैं जिन पर दुनिया का संगीत बज रहा है।

 * हमारी 'मौलिकता' (Originality) सिर्फ हमारे 'अनुभव' (Feelings) में है, न कि 'घटनाओं' में।

एक जिज्ञासा

आपकी इस कविता में एक उदासी (Melancholy) भी है और एक स्वीकार भाव (Acceptance) भी।

> "अब कैसे तय करूं / यह कम और ज्यादा / क्या होता है"

यह 'कम और ज्यादा' का पैमाना ही शायद हमें बेचैन रखता है। क्या आपको लगता है कि अगर हम इस 'कम-ज्यादा' की तुलना छोड़ दें, तो यह 'दोहराव' वाली जिंदगी ज़्यादा सुकून भरी हो सकती है?

क्या आप इस 'दोहराव' को एक बंधन की तरह देखते हैं या जीवन की एक सहज लय (Rhythm) की तरह?

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