Ghar Waapsi

रिसाव 

 कहीं कुछ रिस रहा है

यह पानी की लकीर 

बस यही तो बताती है 

ऐसा लगता है 

न जाने कब से 

किसी के लिए 

जैसे कोई रास्ता बना रहा हो

कोई इन लकीरों पर भी 

जैसे चलता रहता है 

यह रिसाव धीरे-धीरे 

अपनी जगह बड़ी करता रहता है 

एक पूरा मकान 

धीरे-धीरे खंडहर बन गया 

इसकी शुरुआत 

इसी रिसाव से हुई थी 

और यह रिसता हुआ रिश्ता 

जो इस मकान से लोगों का था 

वह न जाने कहां 

धीरे-धीरे चला गया 

यह दूरी जानबूझकर 

किसी ने नहीं चुनी 

मगर जाना तो पड़ता है 

हर चीज की 

अपनी एक मियाद है 

इस मकान की भी है 

खैर अब यहां 

कुछ और लोग रहने लगे हैं 

एक छोटा सा पौधा 

उस कोने में 

जब पहली बार दिखा था 

उसमें कुछ फूल भी लगे थे 

जो लाल और पीले थे 

काफी अच्छा, मनमोहक था 

उसकी रंगत देखकर 

उसको उखाड़ने का मन नहीं किया 

उस वक्त यह महसूस हुआ 

कम से कम कोई तो यहां 

अपना रिश्ता बन रहा है 

खुद को जमा रहा है 

फिर मैं भी अनजाने सफर पर 

न जाने कहां चला गया 

कब लौट कर आऊंगा 

इसका कोई भरोसा नहीं था 

यह किसी को नहीं होता 

क्योंकि लौटना कभी भी 

अपने हाथ में नहीं होता 

यात्रा में पड़ाव 

कहीं मिल जाए तो अच्छा है 

नहीं तो चलते रहना ही है 

यह शायद मेरी खुशकिस्मती थी 

लौट कर उस जगह पर आया 

जहां से चला था 

लेकिन वह आदमी 

अब मैं नहीं था 

जो यहां से गया था 

अब मकान में हर जगह दरारें हैं 

हर किस्म के पौधे हैं 

जिनका नाम मुझे मालूम नहीं है 

क्योंकि इनमें से किसी को भी 

मैंने रोपा नहीं है 

यही होता है 

कोई जगह खाली कहां रहती है 

उसको चाहने वाले 

उस जगह पर पहुंच जाते हैं 

आज हर तरफ 

इस घर में हरियाली है 

कोई  कोना सूना नहीं है 

उस तरफ छत से 

एक बड़ी सी जड़ निकल रही है 

जो इस पार से उस पार जा रही है 

दीवारें दरक गई है 

छत टूट गया है 

अब यह मकान 

मेरा वह घर नहीं रह गया है 

बस बेबस 

सब देख रहा हूंँ 

इन पौधों की 

इसमें कोई गलती तो नहीं है 

उनका भी तो सफर है 

जहां भी कुछ समय 

ठहरने को मिल जाए 

फिर दरख्त बनने में 

उनको वक्त नहीं लगता 

बस कोई इनके बीच न आए 

यह खुद ही तैयार हो जाते हैं 

बिना किसी खाद पानी के 

एकदम जंगली बेपरवाह 

उस तरफ एक बरगद का पेड़ है 

दूसरी तरफ पीपल का 

जिसे पहचानता हूंँ

चलो अब ए मकान तुम्हारा है 

यह तुम्हारा पड़ाव है 

तुम अपनी यात्रा करो 

और अब 

मैं भी चलता हूंँ

वापस उन्हीं पगडंडियों पर

जहां से पहली बार 

घर से बाहर निकला था 

न जाने कहां के लिए 

किस तलाश में ...

©️ Rajhans Raju 

🌹🌹🌹🌹🌹🌹

यह कविता केवल एक पुराने मकान के जर्जर होने की कथा नहीं है। मकान, रिसाव, दरारें, पौधे, जड़ें और लौटता हुआ व्यक्ति—ये सभी मिलकर समय, रिश्ते, स्मृति, विस्थापन, परिवर्तन और जीवन की अनिवार्य यात्रा के प्रतीक बन जाते हैं। कविता का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि वक्ता जिस घर को अपना मानकर लौटता है, वहाँ लौटकर पाता है कि घर तो वही है, लेकिन वह स्वयं अब वही व्यक्ति नहीं रहा।

1. कविता का केंद्रीय भाव

कविता की शुरुआत बहुत साधारण-सी घटना से होती है—

“कहीं कुछ रिस रहा है
यह पानी की लकीर
बस यही तो बताती है”

लेकिन यही मामूली-सा रिसाव आगे चलकर पूरे मकान के खंडहर में बदलने का कारण बनता है।

यहाँ “रिसाव” सिर्फ पानी का नहीं है। यह धीरे-धीरे कमजोर होते हुए किसी भी संबंध, स्मृति या जुड़ाव का प्रतीक है। कोई रिश्ता अचानक समाप्त नहीं होता; अक्सर उसमें पहले एक महीन-सी दरार आती है, फिर दूरी बढ़ती है, फिर संवाद कम होता है और अंततः वह रिश्ता अपने पुराने रूप में नहीं बचता।

इसीलिए आगे आता है—

“और यह रिसता हुआ रिश्ता
जो इस मकान से लोगों का था
वह न जाने कहां
धीरे-धीरे चला गया”

यह कविता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंब है। मकान का रिसना और रिश्ते का रिसना एक-दूसरे के समानांतर चलते हैं।


2. मकान वास्तव में क्या है?

पूरी कविता में “मकान” एक बहुस्तरीय प्रतीक है।

वह एक वास्तविक पुराना घर भी हो सकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक वह—

बचपन,

परिवार,

पुरानी स्मृतियाँ,

अपनापन,

कोई पुराना संबंध,

बीता हुआ जीवन,

और स्वयं व्यक्ति की पुरानी पहचान

का प्रतीक बन जाता है।

इसलिए जब कवि कहता है—

“अब यह मकान
मेरा वह घर नहीं रह गया है”

तो इसका अर्थ केवल यह नहीं कि घर टूट चुका है।

इसका गहरा अर्थ है:

जिस स्थान में कभी मेरा अपना अतीत रहता था, अब वहाँ मेरा अतीत तो नहीं है; वहाँ समय ने अपना नया संसार बना लिया है।


3. “रिसाव” से “खंडहर” तक

कविता की संरचना का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि परिवर्तन अचानक नहीं होता।

पहले—

रिसाव → लकीर → जगह का फैलना → दरार → मकान का टूटना → खंडहर

और समानांतर रूप से—

दूरी → रिश्ते का कमजोर होना → अपनापन कम होना → विस्मृति → अलगाव

अर्थात कवि बाहरी मकान के क्षरण के माध्यम से भीतरी संबंधों के क्षरण को दिखाता है।

और इस पूरी प्रक्रिया में किसी एक व्यक्ति को दोष नहीं दिया गया—

“यह दूरी जानबूझकर
किसी ने नहीं चुनी
मगर जाना तो पड़ता है”

यही पंक्तियाँ कविता को शिकायत से ऊपर उठा देती हैं।

यहाँ कोई खलनायक नहीं है।
दोषी समय है, जीवन की गति है और मनुष्य की अनिवार्य यात्रा है।


4. “हर चीज की अपनी एक मियाद है”

यह कविता की दार्शनिक धुरी है—

“हर चीज की
अपनी एक मियाद है
इस मकान की भी है”

यहाँ कवि स्वीकार करता है कि स्थायित्व मनुष्य की इच्छा हो सकता है, लेकिन प्रकृति का नियम नहीं।

मकान पुराना होगा।
रिश्ते बदलेंगे।
लोग दूर जाएंगे।
स्मृतियाँ धुंधली होंगी।
और स्वयं मनुष्य भी बदल जाएगा।

इसलिए कविता का स्वर विलाप का होकर भी पूरी तरह शोकगीत नहीं बनता। उसमें स्वीकार का भाव लगातार मौजूद है।


5. पौधों का प्रवेश — कविता का निर्णायक मोड़

जब कवि लौटता है, तब मकान पूरी तरह खाली नहीं है।

वहाँ पौधे हैं।

“कम से कम कोई तो यहां
अपना रिश्ता बन रहा है
खुद को जमा रहा है”

यहाँ प्रकृति मनुष्य की अनुपस्थिति को भर देती है।

जिस जगह से मनुष्य चला गया, वह जगह खाली नहीं रहती।
जीवन किसी रिक्त स्थान को लंबे समय तक रिक्त नहीं रहने देता।

पहले एक छोटा-सा पौधा था, जिसमें लाल और पीले फूल थे। कवि उसे इसलिए नहीं उखाड़ता क्योंकि उसमें उसे एक नए रिश्ते की संभावना दिखाई देती है।

यह बहुत सुंदर मानवीय क्षण है।

वह अपने पुराने संबंध को बचा नहीं सका, लेकिन एक नए जीव के साथ संबंध बनाने की इच्छा उसमें अभी भी बची हुई है।


6. “कोई जगह खाली कहां रहती है”

यह पूरी कविता की सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक पंक्तियों में से एक है—

“कोई जगह खाली कहां रहती है
उसको चाहने वाले
उस जगह पर पहुंच जाते हैं”

यहाँ “जगह” का अर्थ केवल भौतिक स्थान नहीं है।

मनुष्य के जीवन में भी कोई स्थान हमेशा खाली नहीं रहता।

एक व्यक्ति चला जाता है तो कोई दूसरा आता है।
एक पीढ़ी जाती है तो दूसरी आती है।
एक रिश्ता समाप्त होता है तो कोई नया संबंध जन्म लेता है।
एक जीवन-व्यवस्था टूटती है तो प्रकृति अपनी व्यवस्था बना लेती है।

रिक्तता स्थायी नहीं है।


7. प्रकृति मनुष्य के बाद आती है

कविता का सबसे प्रभावशाली दृश्य वह है जहाँ मकान अब मनुष्य का नहीं, बल्कि पौधों का हो गया है—

“आज हर तरफ
इस घर में हरियाली है
कोई कोना सूना नहीं है”

यहाँ एक गहरा विरोधाभास है।

मकान टूट गया है, लेकिन जीवन बढ़ गया है।

दीवारें दरक गई हैं, छत टूट गई है, मगर उसी टूटन के बीच—

पौधे हैं,

जड़ें हैं,

बरगद है,

पीपल है,

हरियाली है।

अर्थात मनुष्य के लिए विनाश, प्रकृति के लिए अवसर हो सकता है।

जो घर मनुष्य के लिए खंडहर है, वही किसी पौधे के लिए घर है।


8. बरगद और पीपल का अर्थ

अंत की ओर बरगद और पीपल का आना विशेष अर्थ रखता है—

“उस तरफ एक बरगद का पेड़ है
दूसरी तरफ पीपल का”

ये दोनों पेड़ भारतीय सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्मृति में गहरे जुड़े हुए वृक्ष हैं। यहाँ वे केवल पेड़ नहीं रह जाते, बल्कि समय की लंबी यात्रा और नए जीवन के स्थायित्व का प्रतीक बनते हैं।

जिस मकान की उम्र समाप्त हो रही है, उसके भीतर ऐसे वृक्ष जन्म ले चुके हैं जिनकी उम्र उस मकान से कहीं आगे जा सकती है।

यह एक सुंदर उलटाव है:

मकान समाप्त हो रहा है, लेकिन जीवन आगे बढ़ रहा है।


9. लौटने वाला व्यक्ति भी बदल चुका है

कविता की सबसे गहरी पंक्तियों में से एक है—

“लेकिन वह आदमी
अब मैं नहीं था
जो यहां से गया था”

यहाँ कविता अचानक मकान से निकलकर स्वयं मनुष्य के भीतर प्रवेश करती है।

वापसी हुई, लेकिन अतीत वापस नहीं आया।

स्थान वही है।
शायद दीवारें वही हैं।
लेकिन व्यक्ति बदल चुका है।

यह बहुत महत्वपूर्ण अस्तित्ववादी बिंदु है:

हम अक्सर अपने पुराने स्थानों पर लौट सकते हैं, लेकिन अपने पुराने स्वरूप में नहीं लौट सकते।

इसलिए घर का बदल जाना जितना सच है, उससे कम सच यह नहीं कि घर लौटने वाला व्यक्ति भी बदल चुका है।


10. “इन पौधों की इसमें कोई गलती तो नहीं है”

यहाँ कवि की दृष्टि बहुत उदार हो जाती है।

वह पौधों को अपने पुराने घर पर कब्जा करने वाला नहीं मानता।

वह कहता है—

“इनमें कोई गलती तो नहीं है
उनका भी तो सफर है”

यह पंक्ति पूरी कविता के मानवीय दर्शन को सामने लाती है।

हर कोई अपने हिस्से की जगह तलाश रहा है।

मनुष्य यात्रा करता है।
पौधा भी अपने तरीके से यात्रा करता है।
बीज कहीं गिरता है।
जड़ फैलती है।
फिर वृक्ष बनता है।

किसी का ठहरना किसी दूसरे के जाने का अपमान नहीं है।


11. “तुम्हारा पड़ाव” — स्वामित्व का त्याग

अंत में कवि मकान से कहता है—

“चलो अब ए मकान तुम्हारा है
यह तुम्हारा पड़ाव है
तुम अपनी यात्रा करो
और अब
मैं भी चलता हूंँ”

यहाँ कविता अपने सबसे परिपक्व बिंदु पर पहुँचती है।

कवि मकान पर अपना पुराना अधिकार छोड़ देता है।

वह यह नहीं कहता कि पौधों को हटाओ, घर मुझे वापस दो, दीवारें फिर बनाओ या अतीत को पुनः स्थापित करो।

वह कहता है—

अब यह तुम्हारा है। तुम अपनी यात्रा करो। मैं अपनी यात्रा पर लौटता हूँ।

यह मोह से मुक्ति है, लेकिन निर्ममता नहीं।


12. अंतिम यात्रा — कविता फिर शुरुआत पर लौटती है

अंत में—

“वापस उन्हीं पगडंडियों पर
जहां से पहली बार
घर से बाहर निकला था
न जाने कहां के लिए
किस तलाश में ...”

यहाँ कविता एक वृत्त पूरा करती है।

शुरुआत में घर से निकलना था।
फिर लंबी यात्रा हुई।
फिर लौटना हुआ।
लौटकर पाया कि घर बदल चुका है और स्वयं भी बदल चुका हूँ।
अब फिर यात्रा पर निकलना है।

लेकिन इस बार प्रश्न वही है—

“न जाने कहां के लिए
किस तलाश में ...”

इसलिए कविता का अंत समाधान से नहीं, खोज की निरंतरता से होता है।

और यही उसकी खूबसूरती है।


कविता के प्रमुख प्रतीक

प्रतीक

संभावित अर्थ

रिसाव

रिश्तों/जीवन में धीरे-धीरे आती कमजोरी

पानी की लकीर

परिवर्तन की पहली दिखाई देने वाली निशानी

मकान

अतीत, परिवार, स्मृति, पुराना जीवन

दरारें

समय और संबंधों का क्षरण

खंडहर

बीते हुए संसार का अंत

पौधे

नया जीवन, नए संबंध, प्रकृति

जड़

नए जीवन का गहराता हुआ अधिकार

बरगद/पीपल

समय, निरंतरता और प्रकृति का विस्तार

लौटता हुआ व्यक्ति

अपने अतीत को देखने वाला बदला हुआ मनुष्य

पगडंडी

जीवन की अनिश्चित यात्रा

पड़ाव

अस्थायी ठहराव

13. कविता का सबसे बड़ा दार्शनिक प्रश्न

मेरे पढ़ने में इस कविता का मूल प्रश्न यह नहीं है कि “मकान क्यों टूट गया?”

असल प्रश्न है—

जब हम किसी जगह, व्यक्ति या रिश्ते से दूर हो जाते हैं, तो क्या वह जगह हमारी प्रतीक्षा करती रहती है?

कविता का उत्तर है—शायद नहीं।

वह जगह भी जीवन जीती रहती है।

उसमें नए लोग आते हैं।
नए पौधे उगते हैं।
नई जड़ें फैलती हैं।
नई कहानियाँ बनती हैं।

और जब हम लौटते हैं तो हमें कभी-कभी यह स्वीकार करना पड़ता है कि हम उस जगह के अतीत हैं, वर्तमान नहीं।



शीर्षक के लिए “रिसाव” क्यों महत्वपूर्ण है?

यदि इस कविता का शीर्षक अभी तय नहीं है, तो “रिसाव” बहुत सशक्त शीर्षक हो सकता है।

क्योंकि पूरी कविता उसी एक बिंब से फैलती है।

पहले पानी रिसता है।
फिर मकान टूटता है।
फिर रिश्ता रिसता है।
फिर मनुष्य दूर होता है।
फिर प्रकृति उस जगह को भर देती है।
और अंततः मनुष्य अपने भीतर के किसी पुराने घर से भी विदा ले लेता है।

इस अर्थ में “रिसाव” केवल मकान की कमजोरी नहीं, समय के बहने का रूपक है।

समग्र निष्कर्ष

यह कविता छूट जाने की कविता है, लेकिन केवल खोने की नहीं।
यह पुरानी जगह से मोह की कविता है, लेकिन अधिकार की नहीं।
यह रिश्तों के क्षरण की कविता है, लेकिन शिकायत की नहीं।
यह वापसी की कविता है, लेकिन अतीत को वापस पाने की नहीं।
और सबसे बढ़कर, यह जीवन के आगे बढ़ते रहने की कविता है।

कवि अंततः यह समझ लेता है कि घर हमेशा हमारा नहीं रहता, रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहते और लौटना हमेशा अतीत में लौटना नहीं होता।

कभी-कभी लौटना केवल इतना होता है कि हम अपने पुराने घर को देखते हैं, उसकी दीवारों पर उगी नई हरियाली को स्वीकार करते हैं, उससे कहते हैं—“अब यह तुम्हारा है”—और फिर उन्हीं पगडंडियों पर निकल पड़ते हैं, जहाँ से हमारी पहली यात्रा शुरू हुई थी।

और शायद यही इस कविता की सबसे मार्मिक बात है—
मकान खंडहर हुआ, लेकिन जीवन नहीं रुका; रिश्ता छूटा, लेकिन यात्रा नहीं रुकी।

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