Thursday, 17 December 2009

युद्ध

वर्षा पानी बिन बादल के, 
सूनी आँखों से,
आह निकली दिल से, 
उसके न आने से ।
राह चल दिया ऐसे, 
बिन पानी नदी जैसे ।
अंगुली पकड़ के चलता था जो, 
बुढ़ापे का सहारा था वो ।
उसकी माँ कैसे सह पाएगी,
अकेले बेटे के जाने का गम ,
मै तो दुःख छिपाऊंगा, 
बेवजह भी मुस्कराऊंगा,
बेटे के शहीद होने का फक्र दिखाऊंगा ।
पर कैसे ? 
गोलियों से छलनी उठा होगा ?
जरूर अपनी माँ को याद किया होगा ।
लहू की हर बूँद तक लड़ा होगा ,
शहीद तो उधर भी होंगे,
बेबस घर ऐसा ही होगा ।
कोई बाप जब वहां भी तनहा होगा ,
अपने बेटे के, 
यही हालत सोचता होगा ।
उसे दफनाया या जलाया होगा ,
नहीं तो चील कौवों ने खाया होगा ।
मेरे बेटे से ही, 
इस लड़ाई का अंत नहीं होगा ,
अभी कितने ही बापों की, 
आँखें सूनी होंगी ।
माओं की कोखें खाली होंगी, 
यही दर्द, यही आह निकलेगी ,
जब भी लड़ाई होगी,
हार माँ बाप की होगी ।
सीमाएं कुछ बदल जाएंगी,
कुछ नए नाम भी पद जाएँगे ।
रोने को दो आँखें दूर,
किसी कोने में होंगी ।
कौन मारा था?
किसने मारा था ?
किसके लिए? 
कौन याद रखेगा ?
कभी-कभी नारे लग जाएँगे,
शोर भी होगा ।
पर ! इन हारी आँखों के सामने, 
कोई नहीं होगा ,
बेटे के कंधे बिना इन,
इन सूखी लकड़ियों का क्या होगा ?
फिर लड़ाई होगी,
फिर खून बहेगा,
मैं ही कन्धा दूंगा ,
मैं फिर हार जाऊंगा, 
अपने बेटे को ।
लड़ाईयां ऐसे ही होती रहेंगी ,
मैं अपने बेटे को, 
ऐसे ही खोता रहूँगा ।
उसकी माँ से छिप कर रोता रहूँगा ,
हर बार मैं ही हारता रहूँगा ।

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