Monday, 12 December 2011

मेरा कोना

इस कोने में 'यूँ', 
चुपचाप बैठे हो, 
लगता है दुनिया से, 
चंद दिनों में, 
गुस्सा, नाराज़गी सीख ली है.
अब तुम्हारे साथ, 
ए सब बढ़ता जाएगा, 
दुनियादारी नित नए रंग ले आएगी.
कहीं यह कोना बड़ा होगा, 
कहीं नज़र नहीं आएगा, 
ऐसे ही मासूम आँखों से, 
सब पढ़ लेना, समझ लेना,
आस-पास को थोडा परख लेना, 
अंगुली थामे अभी, 
चंद दिन चलोगे, 
फिर अपनी रह बनाओगे,
हाँ कभी-कभी नाराज़ होना, 
फिर ढेरों खुशियाँ बिखेर देना, 
दुनिया के हर कोने का,  
हिस्सा बन जाना,
अपने कोने को, 
तुम इतना बड़ा कर देना.       
(मेरे भांजे सात्विक और सारांश अपने पप्पा के साथ)

Wednesday, 9 November 2011

accident

सड़क किनारे कहीं,    
जब भीड़ होती है. 
डर लगता है, 
खौफ होता है.
सहम हुए कदम लिए, 
आगे बढ़ता हूँ.
कोई अपना न हो, 
दुआ करता हूँ. 
दूर से देख के लौट आता हूँ,
अपना नहीं जानके, 
सकून पाता हूँ.
अपनी राह, 
चुपचाप चल देता हूँ.
एक दिन, 
मैं ऐसे ही पड़ा था.
भीड़ थी, 
कोई अपना नहीं था.

Wednesday, 14 September 2011

मै कहाँ हूँ?

मै याद कर रहा हूँ, 
पिछली बार,
 कब सूरज की लाली देखी? 
कब चिड़ियों का चहचहाना सुना?
कब घास पर नंगे पाँव चला? 
कब बहता पानी  हाथ से छुआ?
मै उन दरख्तों को भी याद करता हूँ, 
जिनके छांव में दिन गुज़र जाते थे.
मुझे रात का आसमान देखे, 
एक अरसा हो गया.
 एक बेरंग सी छत में,
चाँद सितारे ढूँढता हूँ. 
मै इस शहर में,
 न जाने कब खो गया,
अपनी यादों में, 
खुद को हर पल ढूँढता हूँ .... 

Saturday, 10 September 2011

a tree

एक पौधे का जन्मभूमि छोड़कर, 
दूर जाना, 
फिर किसी और खेत कि, 
मिट्टी में जम जाना.
उसकी अपनी मर्ज़ी नहीं थी, 
पर! छोड़ना पड़ता है, 
उस मिट्टी को जहाँ जन्म लिया.
तोड़ना पड़ता है, 
उसी से नाता. 
कहीं भी बो दिया जाता है, 
जड़ ज़माने को, 
खुला छोड़ दिया जाता है.
पौधे अपनी जड़,
 नई मिट्टी में भी जमा लेते हैं.
नए रिश्ते, 
वहाँ के खाद-पानी से बना लेते हैं.
खुले आकाश की तरफ,
 अपनी बाहें फैलाए, 
हर किसी को अपने पास बुलाते.
अपनी ठंडी छांव लिए, 
बिना फ़िक्र 
धूप,गर्मी,बरसात में.
हमारे लिए, 
यूँ ही, 
खड़े रहते......

Wednesday, 13 July 2011

post-mortem

गोली खाकर 
एक के मुंह से निकला- "राम".
दूसरे के मुंह से निकला- "माओ".
लेकिन तीसरे के मुंह से निकला - "आलू".
पोस्टमार्टम कि रिपोर्ट है 
कि पहले दो के पेट 
भरे हुए थे. 
(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना) 

Wednesday, 1 June 2011

आशिक

एक आशिक माशूक के गम में, 
दफ़न था. 
अब किसी को नहीं चाहेगा, 
ऐसा कसम था.
तभी एक फूल पास से गुज़रा, 
दिल झूम उठा, लगा बहार आ गई. 
कब्र छोड़ के भागा.
जैसे सालों बाद नींद से जागा, 
आदत से लाचार प्रेमी, 
हर फूल को अपना समझ लेता है.
उसके पीछे दिल का गुलदस्ता, रख देता है,  
फूल को पता ही नहीं. उसका बीमार आशिक,
कहाँ पड़ा है, 
आशिक हर मुस्कराहट पर, 
रोज़ फ़िदा होता है. 
माशूक अपनी राह चल देती है,
हँसना उसकी आदत है, 
बस हँस देती है. 
वह आशिकों को जानती है,
फूल के शिकार में बैठे है, 
खूब समझती है. 
ऐसा करते-करते आशिक न जाने कब, 
खुद शिकार हो गया, 
देवदास का दूसरा अवतार हो गया.
अपना जनाजा लिए रोज़ निकलता है,
दुःख-गम का तालाब लगता है, 
नया फूल अब नहीं खिलेगा,
यह वादा रोज़ करता है.
अब डूब जाएगा ऐसा लगता है, 
 नहीं उठ पाएगा, यह भी सोचता है.
ऐसे में अचानक दुनिया बदल गयी, 
एक खिल खिलाता फूल पास से गुज़रा,
जनाजा छोड़ के दीवाना बन गया, 
कफ़न उसका शामियाना बन गया.
हालाँकि वह मुर्दा था, 
खुद को झूठ से ढक रखा था. 
तभी न जाने कहाँ से, 
एक आइना दिखा !
अब कुछ नहीं था,
न वह था, 
न माशूक थी, 
सिर्फ आइना था.

Tuesday, 24 May 2011

खुद की खोज

वह नही मानता किसी रामायण, 
बाइबल, कुरान को,
मन्दिर या मजार को,
लगाए जाने वाले भोग,
बांटे जाने वाले प्रसाद को,
किसी का भगवान त्रिशूल लिए है,
किसी का तलवार।
भूख से मरने वालों की किसे है परवाह,
हर कोई रखता है चाहत,
ताकत, पैसे और शोहरत की,
इसके लिए कोई गुरेज नहीं,
अपने हाथों ख़ुद को बेचना,
ख़ुद की दलाली को, 
लाचारी और बेबसी कहना,
फ़िर कुछ देर पछता लेना।
ईश्वर के नाम पर जेहाद,
सब लोग डरे, सहमे,
ख़ुद की पहचान से डरते।
लिए हाथ में खंजर ख़ुद को ढूँढ़ते,
कत्ल किया ख़ुद को कितनी बार,
धर्म और मजहब के नाम।
एक और मसीहा, एक नया दौर,
डर और खून का बढ़ता व्यापार।
हर तरफ़ एक ही रंग, हरा या लाल,
पैसे के लिए खून या खून के लिए पैसा,
फर्क नहीं मालूम पड़ता।
यह दुनिया किसने क्यों बनाई,
लोंगों को एक दूसरे का खून, 
बहाना किसने सिखाया।
खुदा ने तो केवल इन्सान बनाए थे,
ये हिंदू और मुसलमान कहाँ से आए? 
साथ में रामायण और कुरान लाए,
लड़ने का सबसे अच्छा हथियार, 
धर्म की आग,
जात की तलवार।
धार्मिक होने का अर्थ क्या सिर्फ़, 
मन्दिर जाना, अजान देना,
और ख़ुद में इतना खो जाना, 
 कोई सच दिखाई न दे,
सिर्फ़ मैं के अलावा कुछ सुनाई न दे।
उसने भी सोचा ईश्वर को मंदिरों, 
मस्जिदों में ढूँढा जाए,
मौलवी की दाढ़ी, 
पंडित की चोटी खोली जाए।
उनके अन्दर के नफ़रत, 
 तिरस्कार को समझा जाए।
ऐसे खाओ, ऐसे पहनो, ऐसे बोलो,
ईश्वर को इस भाषा में बुलाना है,
वह बस इसी घर में रहता है,
यहाँ कशी है,वहां काबा है,
स्वर्ग का आरक्षण यहीं होता है,
कहाँ पे चढावा चढाना है, कहाँ हज जाना है।
यहाँ तो सभी को गारंटी चाहिए,
कायनात में अपनी सीट आरक्षित चाहिए।
इसके लिए ढेर सारे यज्ञ,
पूजा और तीरथ का व्यापार है,
धर्म का क्या यही सार है।
ईश्वर बिकता है गलियों में,
दिखता है सिक्कों पर,
अगर थैली भारी हो तो ईश्वर आएगा,
पूड़ी और पकवान खायेगा।
वैभव, ऐश्वर्य, मिथ्या से परिपूर्ण,
पंडित और पादरियों की फौज,
ईश्वर के नाम पर करते मौज,
इन दलालों ने ईश्वर का सौदा किया,
अपनी आत्मा अपने संस्कार सब बेंच दिय।
ईश्वर के नाम पर धंधे का विस्तार किया,
उसे बेचने के लिए दंगा और फसाद किया।
ईश्वर को एक उत्पाद बनाया,
अपने नाम पेटेंट कराया।
उससे मिलाने का काम इनके बिना नहीं होगा,
बिना चढावा कुछ नहीं होगा।
पर यह क्या?

वह तो रस्ते में तड़पता मिला,
जो अस्पताल जाना चाहता था,
यह वही था जो लाठियों से पिटा था,
कई दिनों से भूखा था,
जो मन्दिर की सीढियों पर पड़ा था,
उसका हाथ सबके सामने उठा था,
वह जहाँ भी दिखा बेबस था, कमजोर था,
कुछ कहना चाहता था? 
पर चुप था।
उसका मजहब- रोटी, उसकी जात- पानी,
उसका सपना- पेट भरना,
उसकी उपलब्द्धियां- जिन्दा रहना,
गलियों में रहना, गलियों में चलना,
अचानक बिना किसी बात के फ़िर दंगे हुए,
किसी ने उसे अपने धर्म,
जात का नहीं माना।
उसे अपनी ताकत का एहसास कराया, 
इस बेघर को लूटा,
उसकी गलियों को आग लगाया,
उसका तो हर घर अपना था,
जहाँ से उसे, 
बचा-खुचा मिल जाता था,
यही घर उसके मन्दिर थे।
वह राम का है या रहमान का,
 उसे नहीं मालूम,
अजानों, घंटियों में क्या गूंजता है?
नहीं समझ पाया,
मंदिर और मजार में कौन रहता है?
 नहीं देख पाया।
उसने तो सिर्फ़ रोटी पहचानी,
जो गोल होती है,
सौंधी लगाती है,
वह सोचता है?  
ताज़ी कैसी लगाती होगी?
उसे इन मजहबों से क्या लेना,
कुरान ने क्या कहा है, 
रामायण में क्या छुपा है,
राम क्यों वनवास गए, 
उसे नहीं मालूम
उसे तो भूख लगती है,
प्यास लगती है,
उसकी रोटी ही उसका राम है,
जो उसे जिन्दा रखती है,
उसे पाना उसकी जरूरत है।
सुबह सूरज जरूर उगता,
पर भूख उसे जगाती है,
यह रोटी उसे सुलाती है,
वह कोई भाषा नहीं जानता, 
जिसमे उसे बुलाना है,
उसका राम हर भाषा समझता है,
हर आंसू देखता है,
सड़क पर तडपता है और मरता है,
वह हमेशा उसके साथ होता है,
वह चाहे या न चाहे,
माने या न माने,
उसकी हर साँस,
उसकी हर आह, उसी की है।
उसे मन्दिर या मजार नहीं चाहिए।
उसे जब भूख लगे रोटी चाहिए,
प्यास लगे पानी चाहिए,
वह कहाँ से आया क्या फर्क पड़ता है।
ईश्वर कहाँ रहता है? 
अब तक क्या कोई जान पाया,
या यह शब्द, सिर्फ़ एक शब्द है,
जो हर वक्त कहीं अन्तः में गूंजता रहता है।
जो किसी मन्दिर या मस्जिद में नहीं होता,
एक छोटी सी हँसी, 
एक छोटी सी खुशी बिना रंग,
बिना जात के, हर किसी के साथ,
बस एहसास कराने की बात।
बिना किसी नाम,
बिना किसी पहचान के।

Wednesday, 6 April 2011

gandhi-गाँधी

गाँधी एक बार फिर किसी चौक पर दिखे, 
चुप-चाप, अडिग अपनी आत्म शक्ति के साथ, 
मै हारूँगा नहीं, लडूंगा, पीछे नहीं हटूंगा,

मै कभी अकेला नहीं होता, 
हजारों हाथ मेरे हैं, हजारों का बल मुझ में है. 
सारे निर्बल जब एक हो जाते हैं, 
बड़ी ताकत बन जाते हैं.
वह यही कह रह थे, 
खुद पर भरोसा रखो. 
तुम्हारा दुश्मन खुद हार जाएगा, 
उसके सामने सीना तान के खड़े रहो.
कोई हथियार नहीं चाहिए, 
वह तुम्हारे सच होने की ताकत से, 
कुछ देर में टूट जाएगा. 
थोडा परेशान होगा, चीखेगा, चिल्लाएगा,
कुछ देर डराएगा. 
लेकिन तुम्हारी निर्भीकता से लड़ नहीं पाएगा.
गांधी हर चौक, चौराहे पर मौन, 
अपनी सहनशक्ति, निर्भीकता पर अडिग हैं.
हथियारों का मुकाबला, हथियारों से कब तक होगा ? 
रोज़ नए बनाने होंगे, 
अविश्वास, धोका हर वक़्त होगा, 
मरने-मारने से किसी समस्या का अंत नहीं होगा. 
यह नए रूप में आएगी, भयानक परिणाम दिखाएगी.
गाँधी अब भी मौन अपने पथ पर, 
हमारा इंतजार कर रहें हैं, 
आओ मेरे काफिले में शामिल हो जाओ,
निर्बल की ताकत देखो, 
कैसे एक साथ मिलकर, पूरी दुनिया बदल देते हैं.
तुम अपना हाथ बढ़ाकर देखो,
 तुम्हारा एक हाथ, कितने हाथ बन जाता है, 
अब तो शिकवा-शिकायत भी अपनों से है.
किसका? कौन? कितने दिन खून बहाएगा? 
जब हर बार खुद ही मरना है,
तो इस खून खराबे से क्या पाएगा?
आओ मिलके, गाँधी के साथ, 
गाँधी की राह चलते हैं, 
एक छोटी सी शुरुआत ,
खुद से करते हैं.
                                       

Wednesday, 16 March 2011

magic

पूरी दुनिया जादू से भरी है, 
पत्तों का रंग, फूलों की खुशबू, 
सब अजूबा है,
मकड़ी का जाला बुनना,
उसमे कीड़े का फंस जाना,
लाख कोशिशों का बावजूद, 
छोटी मकड़ी से हार जाना. 
तितली का फूलों से रंग लेना,
मधुमक्खी का रस चुराना. 
किसी जादूगर की ही कल्पना हैं,
जो ढेर सारे रंग भरता है,
अपने हाथों नई-नई रचनाएँ करता है, 
कभी किसी पर्वत से, 
नदी बह पड़ती है,
खेलते कूदते समुन्दर तक पहुँच जाती है. 
थोड़ी गर्माहट और ठण्ड हो,
इसके लिए ढेर सारी बर्फ और रेत है. 
धरती को हर रंग से भर दिया.
ढेर सारा पानी, पेड़-पौधे, और ज़मीन दिया, 
हर कोने को अलग पहचान दी.
इसके लिए रंग बिरंगे जीवों की पूरी सौगात दी, 
वह अपनी कल्पना के रंग भरता रहा.
जीवों और पौधों को उन्नत करता गया, 
अपनी शानदार रचना देखकर खुश होता रहा;
इस ख़ुशी में एक भूल कर गया, 
न जाने क्यों?
 इन्सान को अक्ल दे दिया.        
          

Friday, 4 March 2011

समय चक्र

अतीत, वर्तमान को देखकर दुखी है, 
वह क्यों भविष्य के सपनों  में खोया है .
वक्त के हर लम्हे की यही कहानी है, 
वह आज से खुश नहीं,
उसके यादों और सपनों में,
कल से कल तक की दूरी समाई है. 
आज हर पल साथ होता है, 
अतीत और आगे की सिर्फ बातें हैं ,
वक्त फासलों को, 
लम्हों में तय करता है,
धीरे-धीरे सब बदल जाता है, 
हम कुछ नहीं समझ पाते.
यह आज जो कभी कल था,
बीता हुआ कल बन जाता है, 
कहने सुनाने की बातें हैं,
यादों में रह जायेंगी. 
कल, आज, कल में जो होना है, 
एक पल में हो जाता है ,
आदमी अफ़सोस करता, 
सोचता रह जाता है. 
वक्त शदियों का फासला  ,
पल-पल में तय कर जाता है .. 

Friday, 25 February 2011

black hole

चाहता था कहूं रुक जाओ, 
पर कहा नहीं .
छूने को अक्सर सोचता था,
पर छुआ नहीं. 
धरती से आसमान को देखता था ,
वह नीला, काला, खामोश था. 
धरती अपनी जगह थी, आसमान भी ऐसा ही था .
न एक दूसरे को छुआ, न कुछ कहा, 
धरती आसमान की गोद में घूमती रही .
सूरज का चक्कर लगाती रही, 
आसमान यूँ ही देखता रहा .
अनंत काल से, 
धरतियों को सूरज की परिक्रमा करते हुए .
सदियाँ पता नहीं कब बीत जाती हैं, 
देश काल की अनंत यात्रा में .
सब कुछ शून्य ही रह जाता है,
जहाँ से शुरू हुआ था, आज भी सब वहीँ हैं.
आसमान साक्षी है, 
हजारों सितारों का. 
शून्य से उत्पन्न होकर, 
उसी में खो जाने का .
ब्लैक होल में विलीन हो जाना, 
सितारों की यात्रा है .
मनुष्य जैसी रिक्तता, 
आसमान में भी है . 
सब पूरा करने, पाने की कोशिश में, 
हरदम कुछ रह जाता है ,
यही रिक्तता, 
मानव का दुःख, 
आसमान का ब्लैक होल बन जाता है...  

  

Tuesday, 22 February 2011

सक्षम

सक्षम बड़ा सच्चा है ,
नटखट छोटा बच्चा है .
झटपट करता रहता है,
सरपट चलता रहता है .
खटपट थोड़ी हो गयी है,
समझो गड़बड़ हो गयी है .
देखो, पकड़ो, जल्दी इसको, 
भागम भाग मचाया है .
उथल पुथल  सब हो गया है, 
सक्षम जब से आया है . 
=


चिड़िया 




देखो चिड़िया रानी को,
बड़ी सयानी नानी को.
तितली फूल पे बैठी है,
रंग बिरंगी लगाती है.
दूध में मलाई है ,
बिल्ली घर में आई है.
चूहा अभी जागा है,
बिल्ली देख के भगा है.
पापा जल्दी आए हैं,
लड्डू-पेडा लाए हैं.
अब जल्दी जाता हूँ,
एक मिठाई खाता हूँ.
मत पीना चाय-वाय,
नमस्ते, टाटा, बाय-बाय.
=
   
गुड़िया




सुबह-सुबह चिड़िया बोली,
उठ जा प्यारी गुड़िया बोली.
जल्दी-जल्दी तुम उठ जाना,
अच्छे से फिर खाना खाना,
मन लगाके करो पढाई,
ना किसी से करो लड़ाई.
सच्ची बात हरदम करना,
अच्छा सच्चा तुमको बनना.
=    

Monday, 3 January 2011

पतंग

पतंग डोर से कट के दूर चली जाती है, 
उसे लगता है, 
वह आसमान की ऊँचाइयाँ छू लेगी.
हवा के झोंके दूर- दूर ले जाते हैं,
कहाँ फसेगी, कहाँ गिरेगी, 
कोई भरोसा नहीं होता.
हवाओं का रुख, 
हमेशा एक सा नहीं होता, 
बिना डोर पतंग कहीं भी गिर सकती है.
जब तक डोर ने थामा है, 
हवा के सामने डटी, खूब ऊपर उठी है.
डोर ने उसे आसमान की छत पर बिठाया, 
पतंग ने ऊपर से दुनिया देखी,
सब छोटा और खोटा नज़र आया, 
डोर की पकड़ का एहसास कम हो गया,
और ऊपर उठने, दूर जाने कि कोशिश में, 
डोर छूट गयी. 
पतंग अकेली आसमान की हो गयी.
हवाओं के साथ खेलती, उड़ती रही, 
कुछ देर में ही हवाओं ने रुख बदल लिया,
पतंग को डोर  कि याद आने लगी, 
अब वापसी का कोई तरीका नहीं था.
काफी देर तन्हा भटकती रही, 
आखिर थक गयी, 
किसी अनजानी जगह बैठ गयी,
डोर का इंतजार करने लगी  ..