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Showing posts from June, 2016

तन्हा पहाड़

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आज़ पहाड़ को देखा, तन्हा उदास था, मैने पूँछा “क्या हुआ?” उसने बेदरख्त सूखे चेहरे पर, थोडी मुस्कराहट लाने की,  नाकाम कोशिश की, उसकी बदरंग झुर्रियाँ, हरे पेडों को, न जाने कहाँ छोड़ आयी थी, वो मासूम पौधे जिनमें लगे फूल, उसमें रंग भरते थे, वो भी तो नहीं दिखते दूर से टेढी-मेढी लकीरों जैसी, दिखने वाली नदी, जो हर वक़्त गुनगुनाती, और पहाड़ किसी बूढे‌ बाप की तरह, खिलखिला उठता, अब खामोश है, वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आती, उसका बस मेरी तरफ यूँ देखते रहना? मुझे सवालों के घेरे में लाता रहा, मै उसे कहाँ कोई जवाब दे पाया?

चूहों की लडाई

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आओ मिलके कहें कहानी, नहीं करेंगे हम शैतानी, देखो चूहा घर में आया, हमसे कहने है कुछ आया, अब बिल्ली की नहीं चलेगी, सब चूहों ने है ठानी, दूध मलायी खाना है, बिल्ली को भगाना है, कोई चूहा नहीं ड‌रेगा, अपना सब पर राज़ चलेगा, चूहा अकड‌ के आया अंदर, जैसे हो वही सिकंदर, अब अपना नारा होगा, कोई चूहा राजा होगा, उसके पीछे दो तगड़े चूहे, आगे पीछे चूहे-चूहे,      लड़ने कि तैयारी शुरू हुई, सेना आके खड़ी हुई, तभी एक बूढ़ा चूहा आया, ज़ोर-ज़ोर वह चिल्लाया, बिल्ली आयी..बिल्ली आयी, दुम दबाके भागे सारे,  बूढा चूहा बोला हँसके, बिल्ली से क्या खाक लडेंगे,      ए तो हैं पक्के चूहे.. 

"monoplay"