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कुछ छूट गया

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आज बरिश ने कुछ यूँ  धुल दिया, चारों तरफ सब उजला हो गया, खुद की क़ैद में न जाने कब से था, लगा दुनिया बदल चुकी है,  सब पीछे छूट गया, अज़ीब हल्ला था, मेरे लिए, सब नया था, शायद! मै ही अजीब लग रहा था, अरे नही सब वही है, यह तो सुबह की खुमारी है, यह शोर भी मेरा, और खामोशी भी, जो छूट गया, जो टूट गया, वह मै ही था, फिर याद आया, पिछली रात, जल्दी सो गया था, उफ्फ! न जाने कब तक ? सोता रहा था? आज़ जैसे उसी बचपन में, लौट जाना चाहता था, फिर उस नीम के पेड़ की, बड़ी याद आयी, जहाँ पूरी दुपहरिया गुज़र जाती थी, सोचता हूँ? ख़ुद को रिहा कर पाऊँगा? या फिर, इस शहर से,       हार जाऊँगा?? ?