Wednesday, 22 October 2014

दिवाली

न जाने कितने बरस बीत गए,
वह अपनी जद्दो-जहद में उलझा रहा,
खाने-कमाने का, 
न खत्म होने वाला सिलसिला,
कुछ,
फिर और पाने कि इच्छा,
यूँ ही वक्त का बीतते जाना,
और कुछ भी न समेट पाना,
थककर कहीं गुम हो जाना,
अनायास ही,
अतीत की पगड़ंड़ी की तरफ,
लौट जाने की,
नाकाम कोशिश,
न जाने कब खत्म हो यह वनवास?
वह तो चौदह वर्ष में ही लौट आए थे,
पर! क्यों नहीं खत्म होता,
ईंट-पत्थरों में फंसे,
अनगिनत लोगों की यात्रा,
शायद! आज़ की रात,
कोई दिया जलता होगा,
घर से दूर गए, 
उन मुसाफिरों के लिए,
जिन्हें लौट के आना था,
अपने घर,
जो न जाने कहाँ खो गए,
खुद की तलाश में।
शायद! याद आ जाए,
यह सोच कर,
एक दिया कहीं भी,
यूँ ही रख दें,
जो किसी के,
घर लौटने का.... 

Tuesday, 21 October 2014

परदा

 कोई परदा? 
कब तक बनेगा चेहरा?
जब रोशनी दूर हो आँखो से,
क्या करेगा परदा।
फिर तन्हा, मकानों मे,
खुद को पाता है,
ड़र-ड़र के, 
न जाने किससे,
चेहरा छुपाता है।
आइने के सामने,
परदा लेकर जाता है,
कुछ नज़र आए,
इससे पहले,
आइना ढ़क देता है..