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Showing posts from November, 2010

मै ही हूँ

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जब कभी,
कहीं तुम अकेले होना, खुद में मुझे महसूस करना. रोने का मन करे, 
उदास होना अच्छा लगे,  अपनी सिसकियों में मुझे ढूँढना,  जब अँधेरे के सिवा कुछ नहीं होगा,  एक दीपक तुम्हें मिलेगा. मेरी लौ होगी उसमे, मै तुम्हारे लिए जलूँगा . तुम्हारे हर एहसास कि,  छोड़ी हुई परछाइयाँ मेरी हैं. तुम्हारा यह अकेलापन भी,  मैं ही हूँ,  तुम कहाँ,तन्हा, कभी रह सके,  तुम्हारा वजूद,  मेरे होने कि पहचान है. तुम्हारी हर बात मेरे साथ है ,  यह सांस मेरी ही सांस है.  तुम मुझे कैसे ढूंढोगे ? जब मै तुम्ही में रहता हूँ,  तुम्हीं में बसता हूँ. भूलाने परेशान होने कि आदत !  पुरानी है, वैसे हम तुम जुदा ही कब थे ?.... 

माँ पुरानी है

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उसने हर किसी से ,  अपने बेटे को पूँछा ,  कोई तो उसे जानता होगा , वह इतना बड़ा आदमी है ,  बड़े मकान में रहता है, बेटे का रंग-रूप, घर के पास कि निशानियाँ भी बताई, जिसमे एक पुराना पेड़, छोटी दुकान थी .  वह जिन चीज़ों को जानती थी,  सबका जिक्र किया , कुछ पता नहीं चला , क्योंकि ऐसा तो हर शहर में होता है , कोई किसी को नहीं जानता। वह पढ़ना-लिखना नहीं जानती ,  दुनिया कि चालाकी नहीं समझती . बेटे के प्यार में शहर आई थी, लाडले ने खूब फुसलाया था, गाँव में जो भी बचा था, उसे बेचना था। जल्द ही बोझ बन गयी, बुढ़ापे का भार उठाना मुश्किल हो गया, बेटे को पढ़ाने लिखाने में क्या-क्या सहा था, कितने दिन भूखे रहकर, उसे खिलाया था। आज मुन्ना बड़ा आदमी बन गया, वह सब कुछ देखता है, बस माँ नज़र नहीं आती। शायद! कमज़ोर बूढी "माँ" अच्छी नहीं लगती,  ऊंची सोसाइटी के  फैशन में नहीं जँचती। आखिर उसकी भी तो कोई इज्ज़त है, लोग क्या कहेंगे? अरे! यही साहब की माँ है? बेटे को इज्ज़त प्यारी है, उसे माँ की ज़रुरत ही कहाँ है? वह तो सबसे बेकार,
पड़े फर्नीचर से भी पुरानी है, बेटे ने एक अच्छी तरकीब निकाली, माँ को थोडा सा फुसलाया, कहीं घूमने के लिए मनाया, थोड़ी द…

दो दूनी ?

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दो का चार तो हो जाता, पर किसी का हक, मारा जाता है .  चोरी करना क़ाबलियत बन गयी , मज़हब दलालों का अखाडा बन गया,  पैसे का ही सब तमाशा हो गया.  उसे कैसे भी पाना इमान है , बेइमानी भी आज भगवान है , यह नया दौर आया है,  व्यापारियों को खूब भाया है . "डर" का कारोबार बढाया है,  इंसानों को बेचकर, खूब माल कमाया है, ऐसे में , रोज़ जीने वालों का क्या होगा ?  जब घर से निकलना ही मुश्किल होगा ! जानें कहाँ कब धमाका हो जाए, इंतजार में बच्चे ,बिना खाए सो जाएँ . कोई पिता सड़क पर बिखरा होगा,  घर में खाने को कुछ नहीं होगा , मातम भी कैसे मनाएगे, जो बिखरा है,  उसका पता कौन बताएगा ? फिर दो का चार करने में , कितनों का हक मारा जाएगा , एक दिन खुद बिखर जाएँगे तो , कोई नहीं उठाएगा.       

अक्स

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कुछ कहूं अपनी, कुछ सुनूं आपकी, यही सोच कर मैं यहाँ पर हूँ . पर! क्या कहूं, क्या सुनूं, कुछ नया नहीं है . सबकी एक ही दासता, जो मैंने महसूस की, 
वही सबने की है , कुछ शब्द बदल जाते हैं, बात वही रह जाती है . मैंने भी सोचा, किसी चहरे को, नजदीक से पढ़ा जाए, कुछ दिल की बात की जाए , वह चेहरा जो दूर से, काफी अच्छा लग रह था. नजदीक गया तो, मेरे जैसा ही था. थोड़ी रोशनी हुई तो , पता चला ,
मेरा ही अक्स था.  

दीपावली

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हर अँधेरी राह में, 
एक छोटा सा दीप जलाएँगे,
प्यार की तेल बाती से,
 एक नया सूरज उगाएँगे.
वह सबके हिस्से आएगा , 
अपनी रोशनी घर-घर ले जाएगा .
जब दीप से दीप मिल जाएँगे , 
यह सूरज थोडा बड़ा हो जाएगा .
आज अमावास की बेला में ,
सबको यह जगाएगा.
उमंगों और खुशियों को लपेटे ,
बड़ी सुबह उठ जाएगा .
हम सब की आँखों में ,
गुनगुनाता, हँसता ,
एक नया सवेरा ,
बस जाएगा .. 

गिरगिट

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एक ही ड़ाल पर बैठे,  कई दिन बीत गए थे.  सोचा ! इस आलस को छोड़ा जाए, कुछ नए फूल और पत्तों को परखा जाए , कुछ नहीं तो,  एक डाल से ,दूसरी पर ही जाया जाए.  अपना रंग भी बदला जाए,
काफी दिन हो गए, एक डाल ही पर, एक पत्ते के साथ रहते . उनमे ही खो गया था ,उन जैसा हो गया था , इस आलस ने रंग कुछ ,पक्का कर दिया.  लगता है, एक रिश्ता बन गया . पर रंग तो बदलना होगा , जिन्दा रहने को,  नए डाल, नए पत्तों पर जाना होगा . उन्ही के रंग में रंगना होगा . यहाँ तो रोज़ पुराने पत्ते गिरते हैं , नए लगते हैं. 
उसे भी रोज़ बदलना होगा , जो उसकी पहचान है , सबकी रंग में रंग जाना , हर फूल-पत्ती में मिल जाना , उनके जैसा हो जाना . जिससे वह खुद को ढूंढ न पाए, कोई उसे देख न पाए . वैसे भी, 
गिरगिट का तो स्वभाव ही है,  रंग बदलना.......