खोटे सिक्के- बाजार में

(Plastic  के फूल)
मेरी जरूरत का हर सामान
बाजार में मिलता है,
दुकानों में क्या कुछ नहीं है,
इंसानी शक्लों की पूरी तह लगी है,
खरीदने, बेचने और बिकने वाले,
हर जगह,
जैसे एक ही आदमी हो,
कौन, किस तरफ, क्या है?
कुछ भी समझना,
बहुत मुश्किल है।
तभी अलग शक्ल लिए,
कुछ लोग,
दुकान की चौखट पर आए,
अपने खास होने का,
एक अजीब सा उलझा हुआ,
कुछ? 
यकीन जैसा लगा?
जैसे खुद को
थोड़ा बहुत पहचानते हों,
पर यह क्या?
दुकान का दरवाजा खुलते ही,
उसकी चमक ने सबको,
अपनी आगोश में ले लिया,
ऐसे ही, जो भी यहाँ आया,
अपनी सूरत खोता रहा,
जिसकी पहली शर्त यह है,
इसकी कीमत,
उसे खुद ही चुकाना है,
असली काम? 
जिनके जेब में सिक्के है,
उन्हें दुकान तक लाना है।
जबकि,
अब भी उसे अपनी जरूरत का,
ठीक से अंदाजा नही है,
बस वह खरीद सकता है,
इसलिए खरीदता रहता है।
ऐसे में कभी-कभी लगता है,
शायद! 
वो ज्यादा खुश नसीब हैं,
जो बाजार से,
अक्सर?
खाली हाथ लौट आते हैं,
या तो उनको ए बाजार
समझ नहीं आता,
या फिर एकदम कड़के हैं,
मतलब इनकी जेबें खाली हैं,
जिसमें शायद!
इनकी पूरी मर्जी नहीं है,
पर ऐसे ही,
कुछ अपनी सूरत के साथ,
बचे रह जाते हैं।
शायद! थोड़े जिद्दी हैं, 
या फिर एकदम खोटे,
जो ना तो बिकते हैं,
और ना ही कुछ, खरीद पाते हैं।
ए भी सच है, 
दुनिया बड़ी अजीब है,
इन सब के बाद भी,
ए रहते हैं, बीच बाजार में,
कोई मोल नहीं है इनका,
पर! जाने क्या है इनमें?
जो भरपूर खनकते रहते है,
एक जैसे, बेचेहरों को,
देखकर! बस!
ए हँसी ठिठोली, 
करते रहते हैं।
rajhansraju 

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