वो??


उसके मरने से पहले,
ए तसल्ली जरूरी थी,
मरने वाले का मजहब क्या है?
क्यों कि तमाम लोग आज भी,
इंसानियत पर भरोसा करते हैं,
कभी-कभी ऐसे लोगों की,
शक्ल, पोशाक और नाम,
मजहबी खाँचो से मैच नहीं करती।
ऐसे में हत्यारों को बड़ी दिक्कत होती है,
मरने वाला कहीं,
अपनी मजहब का न हो?
फिर जो इनसे पिट रहा,
वह भी,
बड़ा ही जिद्दी है,
वह किस जाति का है,
इसके बारे में कुछ नहीं कह रहा।
इस दरमियान भी,
वह लोगों पर हँस रहा,
वैसे कहता भी क्या?
राम, बुद्ध, ईसा और मूसा,
जब सब वही है,
तब अपना मजहब,
किसको क्या बताए?
ऐसे में यूँ ही चुपचाप,
मर जाना ही सही है।
वैसे भी बंदो को ए पता नहीं है,
उनके हाथों किसका कत्ल हो रहा?
खंजर पर जो लहू लगा है,
किसके बदन से रिस रहा?
जबकि,
सामने कोई और नहीं है,
शक्ल से धोखा खा गया,
गौर से देख तड़प तेरी है,
आँसू और आह में क्या फर्क है?
अब तेरी आँख बंद क्यों है?
खुद को देखना अच्छा नहीं लगता?
क्या अब भी तुझको पता नहीं है,
धीरे-धीरे जो मर रहा है,
वो तूँ है,
कोई और नहीं है।
rajhansraju

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