कुछ बात तो है


मै यूँ ही नहीं हूँ, 
जो हर बार उठ खड़ा होता हूँ
कुछ बात हममें जरूर है,
जो बढ़के एक दूसरे को थाम लेता हूँ।
जब आग लगती है बस्ती में,
तो मै भी डरता हूँ,
अपनों की फिक्र में,
हर वक्त रहता हूँ,
ऐसे में सिर्फ,
घर की छप्प़र नजर आती है
दूर उठती चिंगारी,
एक दूसरे के भरोसे को
अजमती है,
कभी-कभी य़कीं करने पर
डर भी लगता है,
मगर वह शख्स,
"हूबहू"
मेरे जैसा है।
वैसे हमारे पास वो ताकत नहीं है,
कि हम हवाओं का रुख बदल दें,
और गंगा यहीं से बहने लगे,
बस इतना जानता हूँ,
हार नहीं मानता हूँ,
घास फूस की एक छत फिर ड़ालूँगा,
क्यों कि मेरे जैसों की तादात कम नहीं है,
और चिंगारियों से उनका वास्ता भी नहीं है,
हाँ! ए सच है,
आग से लड़ना हमें नहीं आता,
पर! शायद! 
उन लोगों को पता नहीं है,
हमें बुझाने की तरकीब मालुम है,
बस एक दूसरे के साथ खड़े है,
और छोटे-छोटे बरतनों में
कुछ भर रखा है।
हमारे सभी घर एक जैसे हैं,
और पानी में फर्क नहीं है।
जब सभी घरों से,
ए बूँद-बूँद कर रिसती है,
तब दरिया बनने में, देर कहाँ लगती है,
फिर उठता हूँ, जुड़ जाता हूँ
नए पत्तों के साथ, हरा-भरा हो जाता हूँ,
मै कटता हूँ, मै जलता हूँ
हाँ! ए सच है ??
न जाने कितनी बार मरता हूँ,
पर हर बार ए रिसता पानी,
मुझको मिल जाता है,
जो अमृत बनकर आता है,
उसकी कुछ बूँदो से,
फिर जिंदा हो जाता हूँ।
हर बार ऐसे ही,
"मै"
एक नया पेड़ बन जाता हूँ।
Rajhansraju

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