एक माँ एक बेटा


यह एक प्यारे से बच्चे की कहानी है
शायद उसे डाट कम पड़ी
या प्यार बहुत मिला
जिसकी वजह से उसमें
एक ऐब आ गया।
वह पानी किसी और चीज को
समझने लग गया।
माँ जिसे वह बुढ़िया कहता है
वह भी बेटे पर हद से
ज्यादा यकीन करती है।
बेटे को भी अपना रोग मालूम है,
ऐसे में वह भी न जाने खुद को
कहाँ-कहाँ ढूँढता रहता है।
जब फुर्सत से किसी आइने में
खुद को देखता है
तो हर बार उसका अक्श
यही जवाब देता है- 
तूँ पूरा है इसका यकीन कर,
खुद की तलाश में,
कुछ और हो जाना,
क्या ठीक है?
कौन किसको पी रहा,
ए कहाँ पता चलता है?
सच कहूँ तेरा हारना
एक जाम से
अच्छा नहीं लगता।
तेरे पास तो वो
चाँद वाली बुढ़िया भी है,
जो अब भी तेरे पास रहती है
तुझमे भी तो जिंदगी का
भरपूर नशा है,
फिर तुझे
इन मामुली चीजों की जरूरत
क्यों पड़ती है?
अच्छा है!
तुझे मालूम है
तूँ जिंदा है
जानते हो क्यों?
किसी की उम्मीद हो,
नाज  हो तुम,
अरे! लगता है ..
अपनी बुढ़िया के
आसपास
हो तुम।
बस उसकी सूरत देखकर
खुद से पूँछो
कौन किसको देखकर
जिंदा है अब?
क्या कहूँ देखकर इनको,
अब भी यही लगता है
सबसे मुश्किल काम है,
माँ-बाप होना।
rajhansraju

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