शहर जिंदा है


सड़क पर आते जाते,
कुछ यूँ  हुआ कि,
आमने सामने आ गए,
दोनों जल्दी में थे।
एक का रास्ता गलत था,
पहला नाराज हुआ,
उसके गलत होने की शिकायत की,
दूसरा शरीर से मजबूत था,
भड़क गया गाली देने लगा,
जाति धरम की बात आने लगी।
तभी लगा कोई चिंगारी कैसे?
शोलों में बदलती है,
फिर हवा चलती है,
और एक पूरे शहर पर,
बदनुमा दाग लग जाता है।
अच्छा हुआ शहर वाले,
समझदार निकले
दोनों को फटकार लगायी।
ताकत का फैसला करना है,
चलो किसी अखाड़े में कर लो,
कमबख्ततों!
जो हरदम रिसता हो,
शहर को,
वो घाव मत दो,
उसे तकलीफ होती है,
क्यों कि यह शहर,
जिसमें हम रहते है,
जिंदा है।
rajhansraju

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