नजरिया

फर्क नजरिए का है,
देखना नहीं आता,
वैसे भी हमारे बीच कितने शायर,
कितने मकबूल रहते हैं,
जिसने सीता-राम को अपने,
रग रंग में बसा रखा था,
उसका मजहब अब भी पूँछते हो?
हम ही फैसला करें,
हमने क्या दिया?क्या लिया?
अपनी हुनरमंदी से,
जिसने दिया, उसे जहर दिया,
लोग उस पर हॅसते रहे,
कहाँ समझ पाए अब तक,
तुलसी, कबीर को..

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