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Showing posts from May, 2016

नीली नदी

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वह नीली नदी अब नहीं मिलती, उसे बेपानी हुए अर्सा हो गया, उसकी चाहत में दबे पाँव, रात में निकल पडता हूँ, अंधेरा और पानी दोनों, एक जैसे ही दिखते हैं, जैसे नदी खामोशी ओढे‌, चुप-चाप बैठी हो, मै उसका किनारा थामे, वहीं उसके पास, ठहर जाता हूँ..

मेरी गंगा

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काफी दिनों बाद सोचा! चलो संगम हो आता हूँ, अरे यह क्या? तुम कहाँ हो? कहाँ गयी? अपनी बहन यमुना से मिलकर, कितना खिल जाती थी, पर आज़ ? तुम्हारे साथ ऐसा नहीं हो सकता? वह तो अरैल किनारे डरी, सहमी, एक दम से सिमटी दुबकी, तुम्हे...ऐसे......देखकर....क्या कहूँ? ज़ोर-ज़ोर से रोने का मन कर रहा था, ए हमने क्या किया? जब तुम्हारा ए हाल है तो बाकी का क्या होगा? भगीरथ की संतानों... गंगा को मनालो, उसको उसका हक़, उसका पानी, उसकी ज़मीन लौटा दो तुम्हे सिर्फ अपने हिस्से का लेना है, गंगा का परिवार बहुत बडा‌ है, उसको तो सबके लिए जीना है जिसमे निर्झर जीवन बहता हो, उसको खुलकार जीने दो, हाँ! माँ कह देने से मन तो भर जाता है, पर! अरे! अभागे, निष्ठुर, निर्दय, कब तक हाथ पसारोगे, जब खुद वह भूखी प्यासी हो, कब तक प्यास बुझाएगी, अंतहीन लालच तेरी, उसकी...ज़ान... ,