जिद्दी बच्चे

जब गाँव, गलियों में,
आइसक्रीम वाले की आवाज़ सुनकर, 
बच्चे झूम उठते, कम से कम एक तो लेनी है,
इसकी ज़िद और लडा‌ई शुरू हो जाती, 
अंत में माँ-बाप हार जाते, 
उस सस्ते मीठे बर्फ के टुकडे से,
बच्चों को खुशियों के पर लग जाते, 
न अब वो ठेले दिखते हैं न वह साइकिल,
जिसका इंतज़ार सुबह होते ही शुरू हो जाता, 
अब तो सब कुछ साफ-सुथरा हाईजीनिक हो गया,
फिर वह सब कुछ कहीं छूट गया,
अब घरों के काँच भी कम टूटते हैं, 
वैसे भी मकान बहुत ऊँचे होने लगे,  
और गलियों में बच्चे भी नहीं दिखते, 
सबको दौड़ में आगे रहना है,
वह छुपके घर आना, फिर जमके पिटाई, 
चुपके से माँ का खिलाना,
तुरंत सब भूल जाना, 
अरे आज़ मार नहीं पडी‌, कुछ गडबड है?
कोई भी घर ऐसा नहीं, 
जहाँ बच्चों के झगडने का शोर न हो, 
हर घर में रौनक बनी रहती,
न जाने क्यों सब समझदार हो गए, 
अब कोई शोर नहीं होता, 
कोई लडता नहीं, कोई बहस नहीं होती,
कोई गलत साबित नहीं होता, तो कोई सही भी नहीं,
वो जिद करने वाले टोकने वाले बच्चे कहाँ है? 
जो हर बात पर लडते,
जिन्हे ठेले वाले देखकर हंस देते, 
चलो अब कुछ बिक जाएगा,
सब कुछ डिसप्लीन में, पढना, हँसना, बोलना,
डिस्प्लीन में......कोई बचपन होता है क्या??
बच्चे जब ज़िद नहीं करते, 
अच्छा नहीं लगता, 
वह लडना जोर-जोर चिल्लाना,
घंटो रोना, रूठ जाना, 
किचन से आवाज़ आयी, 
तुम्हें खाना है कि तुम्हारा भी खा लूँ,
फिर जैसे कुछ हुआ ही न हो, 
और खाने पर टूट पडना,
अब तो कम्प्यूटर, मोबाइल पर, 
घंटो आँखे गडाए रहते हैं,
कहीं किसी से कोई जान पहचान नहीं,
गोलू की जगह, पडोस में मोनू रहने लगा,
पता ही ना चला, 
मोबाइल पर तो सब वैसे ही है,
चलो अच्छा है, 
अब गेंद नही खोती, 
कोई काँच नहीं टूटता,
वह, मोटा चश्मा लगाए, 
टीवी के सामने बैठा है.

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