दशहरा

रावण का पुतला हर साल जलाते रहे, 
पिछली बार से और बडा‌ बनाते रहे,
अब तो चारों तरफ उसकी फौज दिखती है, 
उसे ही देखने को भीड़ जुटती है,
उसी की वैल्यू है, वह अनोखा है, 
सोचो किसी और के दस सीस देखा है,
आज़ का सबसे बिकाऊ, कमाऊ, होनहार है, 
वही आदर्श है, उसी का सम्मान है,
न मर्यादा चाहिए, न पुरूषोत्तम, 
यहाँ तो सभी को सोने के लंका की दरकार है,
अब तो वह सदा वन में रहेंगे, 
रावण की जय-जयकार करेंगे,
उसी का क्रोध है, उसी का अहंकार है, 
सब हडप लेने वाला, वही विचार है,
उसकी एक देह मे दस सीस थे, 
अब यहाँ लाखो देह है,
हर देह में न जाने कितने सीस हैं,
उसकी सेना का सेनापति, अब हर घर में रहता है,
अपनेपन वाला वह रिश्ता, न जाने कहाँ रहता है?
लखनजी का तो नाम सुने एक अर्सा हो गया,
क्या वह अब भी साथ में रहते हैं? 
या फिर कहीं और शिफ्ट हो गए,
वैसे भी भाइयों की अब बनती कहाँ है, 
जब से सब आन लाइन हो गया,
रिश्तों की गरमाहट भी,
लाइक,शेयर में पोस्ट हो गया,
घर वालों की अब जरूरत नहीं पड़ती    
सारा काम आउट्सोर्स हो गया।
वैसे तुम यूँ दूर-दूर कब तक रहोगे?
अपनी जिम्मेदारी से कब तक बचोगे,   
चलो बहुत हुई बेरुखी, 
अब आओ अपनी अयोध्या सँभालो,
बस थोडी तकनीक और तरीके बदल चुके हैं,
तुम्हे न देखकर रावण-रावण करने लगे हैं,
तुम्हारी एक दस्तक ही बहुत है, 
तमाम दरवाज़े खोलने को,
तुम साथ हो यह भरोसा, 
आज़ भी चाहिए,
कोई भी लडाई, 
खुद से लडने को। 

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