फिर वही हुआ

मै हैरान हूँ, परेशान हूँ, 
उससे ज्यादा शर्मसार हूँ,
क्या अब भी इंसान हूँ?
जब कत्ल होना, करना, काम हो गया,
ऐसे बेअक्ल की, जानवर भी हैरान हो गए,
बिना सबूत, जज और जल्लाद हो गए,
इंसानियत जलाने चल दिए,
मंदिर-मस्जिद की आड़ में,
न जाने कब? खुदा और भगवान हो गए,
कहीं जमीन का धंधा है, कहीं किसी का व्यापार है,
बिका है, झुका है, इमान इस तरह,
गुलाम बन गया है, वज़ूद किस तरह?
किस गंगा में नहाएगा?
बता वज़ू करने कहाँ जाएगा?
जब रिसता हो खून, तेरे ही जिस्म से,
और कितने दिन जिंदा रह पाएगा,
जिनको तूने यतीम किया है,
उनकी बेवा माँ, तुम्हारे ही घर पर मिलेगी,
तुम्हारी माँ, बहन, बीबी की शक्लों में तुम्हारे साथ रहेगी,
तेरे बच्चे तुझे कातिल नहीं तो और क्या कहेंगे?
तुझे गीता-कुरान से क्या मिलेगा?
जब कोई पत्ता उसकी मर्ज़ी के बगैर नहीं हिलता,
फिर तूँ किसके लिए, बेवज़ह लड़ता है?
अपने ही बच्चे के पास कुछ देर बैठ तो सही,
उसकी फटी किताब,
जो किसी मज़हब की दुकान पर नहीं मिलती,
उसके किस्मत कि लकीरें, यहीं से बनती हैं,
ऊपर वाला उसी के साथ, उसी में चुपचाप बैठा है,
चलो अच्छा है,
तेरे मज़हब वालों को यह पता नहीं है,
 और जब तुम कहते हो,
नई किताब, नई जिल्द लाओगे,
उसे उस हसीन कल की उम्मीद वही देता है,
और वह रोज़ तुम पर यकीन कर लेता है
हाँ! तुमसे एक गुज़ारिस है,
जब कभी उसे नई जिल्द लाकर देना,
उसका रंग .. या .. न हो..

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