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Showing posts from September, 2015

फिर वही हुआ

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मै हैरान हूँ, परेशान हूँ, उससे ज्यादा शर्मसार हूँ, क्या अब भी इंसान हूँ? जब कत्ल होना, करना, काम हो गया, ऐसे बेअक्ल की, जानवर भी हैरान हो गए, बिना सबूत, जज और जल्लाद हो गए, इंसानियत जलाने चल दिए, मंदिर-मस्जिद की आड़ में, न जाने कब? खुदा और भगवान हो गए, कहीं जमीन का धंधा है, कहीं किसी का व्यापार है, बिका है, झुका है, इमान इस तरह,

मिट्टी का

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मै खाली हूँ, बेज़ान हूँ,  मिट्टी का हूँ तो क्या हुआ, जिंदगी की धूप सही है,
जिसने रंग बदल दिया,
आग में तप कर पक्का हो गया,
मुझमें कुछ भर सके इसलिए
खुद को सदा खाली रखा,
दुनिया की ठोकरों से, अब भी चटकता हूँ,
जैसे कभी था ही नहीं,
कुछ इस तरह, मिट्टी में वापस मिल जाता हूँ,
कुम्हार की चाक पर, उसकी उंगलियों में नाच जाता हूँ,
मै फिर वही रिक्तता लिए, नए आकार में ढल जाता हूँ

हमारे शहर में

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पिछले दिनों एक क़त्ल हुआ था  हाँ ! वह लड़की थी,  ढेरों सवाल इसलिए भी उठे थे,  उसके सही गलत होने कि,  ठंडी जिस्मों ने खूब चर्चा की, सुनने में आया है,  पुलिस ने जाँच पूरी कर ली है, कोई कातिल अब तक सामने नहीं आया, जिन पर शक था, सब बरी हो गए, सभी ने एक दूसरे को शुक्रिया कहा।  लड़की के घर वालो के पास, कोई जवाब नहीं है, सिवाय बेबसी के, अब भी उसका, वैसे ही इंतज़ार, इतना बज़ गया,  आने वाली होगी, क्यों नहीं आयी ? माँ दरवाज़े से लौट आती है, अपने में ही खोयी सी, उसकी तलाश में,  न जाने कहाँ खो जाती है? अखबारों के लिए, "वह" अब खबर न रही, कल शाम ही तो नई वारदात हुई है, इस बार कोई बच्चा था, पहचानना मुश्किल था , शायद ! लड़का है??

मै चुप हूँ

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कोई लडता है,कोई मरता है, तो मेरा क्या जाता है? वह सच सिर्फ उसका था, बेवज़ह था, शोर था, सारे समझदार चुप थे, अब भी वही खामोशी कायम है, चुपचाप हादसों के पास से गुज़रते है, दूर से ही देखने की आदत, वैसे भी न कुछ सुनता है, न देख पाता है, चलो इस बार भी मै बच गया, खामोशी ओढ़कर फिर आगे बढ गया, क्या हुआ? कुछ भी नहीं, वह सिर्फ हमारे लिए, लड़ते-लडते मर गया।