अंतराल


   
पूरे बीस साल बीत गए,
कोई खबर नहीं ली,
पता नहीं वो लोग कैसे होंगे?
सब कुछ कैसे चल रहा होगा?
इच्छा तो कई बार हुई, जाऊँ मिल आऊँ,
अपनी जिद थोडा‌ परे रख दूँ,
थोडी‌ देर के लिए मै ही गलत हो जाऊँ,
हर वक़्त सही होने की आदत,
आखिर क्या मिला? एकदम अकेला ही तो हूँ,
कोई आगे-पीछे नहीं, न कोई कहने सुनने वाला,
तभी खाना बनाने वाला, एक कार्ड़ लेकर आता है,
कमरे की खमोशी टूटती है,
वह बताता है- एक महिला अपनी लड़की के साथ आयी है,
बाहर बरांदे मे चुपचाप बैठी है,
वह खमोशी से कार्ड‌ पढ़ता है,
लड़की का पिता... अपना नाम पढ़ता है!
अरे ए तो मीनू है इतनी बडी‌ हो गयी?
जी चाहता था.. खूब रोए, उससे ए क्या हो गया?
पर उसने कुछ नहीं किया,
बाहर आया पत्नी के सफेद बालों की तरफ देखा,
बेटी भी कुछ बोल नहीं रही थी,
सिर्फ आँसू गिरे जा रहे थे,
बाप आँसू के बूंदों में चुभते सवाल.
समझ रहा था,
पापा “हमे क्यों? खुद से दूर रखा”?
हमारी क्या गलती थी?
शायद यह सवाल पूँछना चहती थी,
पर सवाल जवाब के सारे मायने खत्म होते जा रहे थे,
उसने खुद पर थोडा‌‌ काबू पाया,
पूँछा-कुछ खाया कि नहीं, चलो अंदर, बता नहीं सकती थी आ रही हो,
वैसी ही नारज़गी?
लड़का क्या करता है? क्या-क्या रह गया?
पत्नी पहले कि तरह चुप थी,
काश वह उसी दिन लौट आती,
या फिर न जाती घर छोड़कर, लड़ती, थोडा‌ हक़ जताती,
खैर बीस साल बीत गए,
एक छोटी सी दूरी तय करने में,
क्यों और कैसे खत्म होने में,
कभी-कभी जवाब न देना,
जवाब न ढूँढ़ना भी अच्छा होता है...

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