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आधा-अधूरा

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आधा छूटता नहीं,  पूरा होता नहीं,  कम्बख्त,  वह भी पौना छोड़े जाता है।  अजीब तरह से सब होता है,  आधा-अधूरे को ही,  पूरा समझा जाता है, ऐसे ही हरदम,  कुछ बचा रह जाता है। चलते-चलते, तमाम रस्ते गुज़र जाते हैं,  पर! यह दूरी क्यों ? उतनी ही रह जाती है ? फिर अधूरा ही रह जाता,  एक बनने की कोशिश में...