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वह नहीं रुका

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कब से राह तकता रहा, 
इसी तरफ से गया था,  दरवाजे पर ठहरा उसे,  जाते हुए देखता रहा, शायद ! वह पलट कर देखे,  या फिर लौट आए,  इसी ख्वाइश में, उसे देखता रहा।  वह नहीं मुड़ा,  तेज़ कदमों से दूर जाता रहा,  उसे मालूम था,  मैं उसकी उम्मीद में,  दरवाज़े पर रुका हूँ, शायद!  यही सोचकर उसने मुड़कर नहीं देखा,  या फिर,   अपना दुखी चेहरा, मुझसे छुपाता रहा,  वह नहीं मुड़ा। मै उसके जाने के बाद,  काफी देर तक,   वहीँ ठहरा रहा,  दरवाज़ा अब भी खुला है, कैसे बंद कर दूँ ? अभी-अभी तो गया है,                पता नहीं कब.....