नाम?


पुरोहित ने कहा- 
माताजी से गऊदान करादें  जजमान,
इस उम्र में गंगा स्नान के बाद यह जरूरी है,
हो सकता है अब आना न हो पाए,
माताजी की उम्र काफी हो गई है,
पुत्र ने सोचा-विचारा,
पत्नी की तरफ देखा, 
सहमति  ही थी, 
माताजी को कुश की पाँती थमाई, 
पुरोहित ने न समझ आने वाले मन्त्र पढ़े, 
माताजी से खुद का नाम लेने को कहा, 
वह सोचने लगी! 
विवाह के बाद तो किसी ने नाम से बुलाया ही नहीं, 
अचानक नाम की जरूरत कहाँ से आ पड़ी?
बड़ी मुश्किल से अपना नाम लिया, 
जैसे किसी भूली चीज़ को याद किया।
पुरोहित फिर बुदबुदाया, 
गोत्र का नाम लेने को कहा, 
यह याद करना तो और कठिन था,
जिस घर में जन्म लिया, 
जहाँ बेटी बहन थी, 
वहां से तो अब सम्बन्ध ही न रहा,
फिर पत्नी, माँ बनी, 
सारे पहचान रिश्तों से ही थे, 
खुद तो कुछ थी ही नहीं,
वह सोचती रही,
स्त्री का नाम, गोत्र ?
होता है क्या ? 

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