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Showing posts from September, 2011

मै कहाँ हूँ?

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मै याद कर रहा हूँ,  पिछली बार,  कब सूरज की लाली देखी?  कब चिड़ियों का चहचहाना सुना? कब घास पर नंगे पाँव चला?  कब बहता पानी  हाथ से छुआ? मै उन दरख्तों को भी याद करता हूँ,  जिनके छांव में दिन गुज़र जाते थे. मुझे रात का आसमान देखे,  एक अरसा हो गया.  एक बेरंग सी छत में, चाँद सितारे ढूँढता हूँ.  मै इस शहर में,  न जाने कब खो गया, अपनी यादों में,  खुद को हर पल ढूँढता हूँ .... 

a tree

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एक पौधे का जन्मभूमि छोड़कर,  दूर जाना,  फिर किसी और खेत कि,  मिट्टी में जम जाना. उसकी अपनी मर्ज़ी नहीं थी,  पर! छोड़ना पड़ता है,  उस मिट्टी को जहाँ जन्म लिया. तोड़ना पड़ता है,  उसी से नाता.  कहीं भी बो दिया जाता है,  जड़ ज़माने को,  खुला छोड़ दिया जाता है. पौधे अपनी जड़,  नई मिट्टी में भी जमा लेते हैं. नए रिश्ते,  वहाँ के खाद-पानी से बना लेते हैं. खुले आकाश की तरफ,  अपनी बाहें फैलाए,  हर किसी को अपने पास बुलाते. अपनी ठंडी छांव लिए,  बिना फ़िक्र  धूप,गर्मी,बरसात में. हमारे लिए,  यूँ ही,  खड़े रहते......